देशभक्ति कविताओं का संग्रह - Deshbhakti Kavita Sangrah

 राष्ट्र के शृंगार/देश-भक्ति कविता 


राष्ट्र के शृंगार! मेरे देश के साकार सपनों!

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।

जिन शहीदों के लहू से लहलहाया चमन अपना

उन वतन के लाड़लों की

याद मुर्झाने न देना।

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।


तुम न समझो, देश की स्वाधीनता यों ही मिली है,

हर कली इस बाग़ की, कुछ खून पीकर ही खिली है।

मस्त सौरभ, रूप या जो रंग फूलों को मिला है,

यह शहीदों के उबलते खून का ही सिलसिला है।

बिछ गए वे नींव में, दीवार के नीचे गड़े हैं,

महल अपने, शहीदों की छातियों पर ही खड़े हैं।

नींव के पत्थर तुम्हें सौगंध अपनी दे रहे हैं

जो धरोहर दी तुम्हें,

वह हाथ से जाने न देना।

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।।


देश के भूगोल पर जब भेड़िये ललचा रहें हो

देश के इतिहास को जब देशद्रोही खा रहे हों

देश का कल्याण गहरी सिसकियाँ जब भर रहा हो

आग-यौवन के धनी! तुम खिड़कियाँ शीशे न तोड़ो,

भेड़ियों के दाँत तोड़ो, गरदनें उनकी मरोड़ो।

जो विरासत में मिला वह, खून तुमसे कह रहा है-

सिंह की खेती

किसी भी स्यार को खाने न देना।

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।।


तुम युवक हो, काल को भी काल से दिखते रहे हो,

देश का सौभाग्य अपने खून से लिखते रहे हो।

ज्वाल की, भूचाल की साकार परिभाषा तुम्हीं हो,

देश की समृद्धि की सबसे बड़ी आशा तुम्हीं हो।

ठान लोगे तुम अगर, युग को नई तस्वीर दोगे,

गर्जना से शत्रुओं के तुम कलेजे चीर दोगे।

दाँव पर गौरव लगे तो शीश दे देना विहँस कर,

देश के सम्मान पर

काली घटा छाने न देना।

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।


वह जवानी, जो कि जीना और मरना जानती है,

गर्भ में ज्वालामुखी के जो उतरना जानती है।

बाहुओं के ज़ोर से पर्वत जवानी ठेलती है,

मौत के हैं खेल जितने भी, जवानी खेलती है।

नाश को निर्माण के पथ पर जवानी मोड़ती है,

वह समय की हर शिला पर चिह्न अपने छोड़ती है।

देश का उत्थान तुमसे माँगता है नौजवानों!

दहकते बलिदान के अंगार

कजलाने न देना।

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।।


- श्रीकृष्ण सरल




ये देश हमारा/देश-भक्ति कविता 


यह देश हमारा

इस विश्व के गगन के सितारों का सितारा

ये देश हमारा

ये विंध्य ये हिमालय

गंगोजमन कहाँ

ऐसी धरा कहाँ है

ऐसा गगन कहाँ

कुदरत ने जैसे धरती पर स्वर्ग उतारा

ये देश हमारा


सोने के दिन हैं इसके

चाँदी की रात है

हीरों की फ़सल होती

इसकी क्या बात है

इस देश में ही पाएँ हम जन्म दोबारा

ये देश हमारा


दुनिया के अंधेरों को

यहीं पर किरण मिली

घायल मनुष्यता को

यहीं पर शरण मिली

ये शांति प्रेम उन्नति की मुक्त त्रिधारा

ये देश हमारा


चंद्रसेन विराट




हिंदू, हिंदी, हिंदोस्तान/देश-भक्ति कविता 


अपने धर्म, देश, भाषा की, जो इज़्ज़त करते हैं,
धर्म, देश और भाषा प्रेमी, सब उनको कहते हैं।

हिंदू, हिंदी, हिंदोस्तान, ये पहचान हैं मेरी,
तीनों ही मुझमें रहते हैं, तीनों जान हैं मेरी,
जहाँ भी रहता हूँ ये मेरे, साथ-साथ रहते हैं।

अपनी सभ्यता, संस्कृति से, मैंने वो पाया है,
इस धरती से, उस अंबर तक, जो सबसे प्यारा है,
जिसको पाने की कोशिश में, सारे ही मरते हैं।

भारत कह लो, इंडिया कह लो, या फिर हिंदोस्तान,
मेरी आँखें उसी तरफ़ हैं, उसी तरफ़ है ध्यान,
तन से रूह, उसके गुण गाते, उसमें ही बसते हैं।

अशोक कुमार वशिष्ठ



हम होंगे कामयाब/देश-भक्ति कविता 


होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन।

हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ, एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन।

होगी शांति चारों ओर
होगी शांति चारों ओर, एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होगी शांति चारों ओर एक दिन।

नहीं डर किसी का आज
नहीं डर किसी का आज एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज एक दिन।

- गिरिजा कुमार माथुर



सारा देश हमारा/देश-भक्ति कविता 


केरल से करगिल घाटी तक
गौहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा

जीना हो तो मरना सीखो
गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

लगता है ताज़े लोहू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
काई चीरो ओ रणधीरों!
ओ जननी की भाग्य लकीरों
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफ़ानों में नैया और खिवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफ़ानों की चाल बदल दो
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,

कहीं तुम्हें परबत लड़वा दे, कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गुप्त है, मन की मीठी बानी
आग लगा दो इन नारों में
इज़्ज़त आ गई बाज़ारों में
कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा

जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा

संकट अपना बाल सखा है, इसको कठ लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिल कर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है?
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुँकारा

जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा

- बालकवि बैरागी



विजय मिली विश्राम न समझो/देश-भक्ति कविता 


ओ विप्लव के थके साथियों
विजय मिली विश्राम न समझो
उदित प्रभात हुआ फिर भी छाई चारों ओर उदासी
ऊपर मेघ भरे बैठे हैं किंतु धरा प्यासी की प्यासी
जब तक सुख के स्वप्न अधूरे
पूरा अपना काम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो

पद-लोलुपता और त्याग का एकाकार नहीं होने का
दो नावों पर पग धरने से सागर पार नहीं होने का
युगारंभ के प्रथम चरण की
गतिविधि को परिणाम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो

तुमने वज्र प्रहार किया था पराधीनता की छाती पर
देखो आँच न आने पाए जन जन की सौंपी थाती पर
समर शेष है सजग देश है
सचमुच युद्ध विराम न समझो
विजय मिली विश्राम न समझो

बलवीर सिंह रंग



वह देश कौन-सा है/देश-भक्ति कविता 


मन मोहनी प्रकृति की गोद में जो बसा है।
सुख स्वर्ग-सा जहाँ है वह देश कौन-सा है।।

जिसका चरण निरंतर रतनेश धो रहा है।
जिसका मुकुट हिमालय वह देश कौन-सा है।।

नदियाँ जहाँ सुधा की धारा बहा रही हैं।
सींचा हुआ सलोना वह देश कौन-सा है।।

जिसके बड़े रसीले फल कंद नाज मेवे।
सब अंग में सजे हैं वह देश कौन-सा है।।

जिसमें सुगंध वाले सुंदर प्रसून प्यारे।
दिन रात हँस रहे है वह देश कौन-सा है।।

मैदान गिरि वनों में हरियालियाँ लहकती।
आनंदमय जहाँ है वह देश कौन-सा है।।

जिसके अनंत धन से धरती भरी पड़ी है।
संसार का शिरोमणि वह देश कौन-सा है।।

- रामनरेश त्रिपाठी



वह आग न जलने देना/देश-भक्ति कविता 


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो संन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे पहले भारतवासी।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई।

जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई।

जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गांधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी।

भारत का भाल दिनोंदिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सचाई।

जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई।
जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई।

- रमानाथ अवस्थी



वंदे मातरम/देश-भक्ति कविता 


वंदे मातरम,
वंदे मातरम
सुजला सुफला मलयज-शीतलाम
शश्य-शामलाम मातरम
वंदे मातरम

शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनी
फुललकुसुमित-द्रुमदल शोभिनी
सुहासिनीं सुमधुर भाषिनीं
सुखदां वरदां मातरम
वंदे मातरम

- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय



वंदन मेरे देश/देश-भक्ति कविता 


वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश
पूजन अर्चन आराधन अभिनंदन मेरे देश

तुझसे पाई माँ की ममता
और पिता का प्यार
तेरे अन्न हवा पानी से
देह हुई तैयार
तेरी मिट्टी-मिट्टी कब है चंदन मेरे देश
वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश

भिन्न भिन्न भाषाएँ भूषा
यद्यपि धर्म अनेक
किंतु सभी भारतवासी हैं
सच्चे दिल से एक
तुझ पर बलि है हृदय-हृदय स्पंदन मेरे देश
वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश

पर्वत सागर नदियाँ
ऐसे दृश्य कहाँ
स्वर्ग अगर है कहीं धरा पर
तो है सिर्फ़ यहाँ
तू ही दुनिया की धरती का नंदन मेरे देश
वंदन मेरे देश-तेरा वंदन मेरे देश

-चंद्रसेन विराट



राष्ट्रीय पताका नमो नमो/देश-भक्ति कविता 


राष्ट्र गगन की दिव्य ज्योति राष्ट्रीय पताका नमो नमो।
भारत जननी के गौरव की अविचल शाका नमो नमो।

कर में लेकर इसे सूरमा, कोटि-कोटि भारत संतान।
हँसते-हँसते मातृभूमि के चरणों पर होंगे बलिदान।
हो घोषित निर्भीक विश्व में तरल तिरंगा नवल निशान।
वीर हृदय हिल उठे मार लें भारतीय क्षण में मैदान।

हो नस-नस में व्याप्त चरित्र, सूरमा शिवा का नमो-नमो।
राष्ट्र गगन की दिव्य-ज्योति राष्ट्रीय पताका नमो-नमो।।

उच्च हिमालय की चोटी पर जाकर इसे उड़ाएँगे।
विश्व-विजयिनी राष्ट्र-पताका, का गौरव फहराएँगे।
समरांगण में लाल लाड़ले लाखों बलि-बलि जाएँगे।
सबसे ऊँचा रहे, न इसको नीचे कभी झुकाएँगे।।

गूँजे स्वर संसार सिंधु में स्वतंत्रता का नमो-नमो।
भारत जननी के गौरव की अविचल शाका नमो-नमो।

- श्यामलाल गुप्त पार्षद





राष्ट्र देवता/देश-भक्ति कविता 


तुझ पर निछावर फूल
केसरिया शीश फूल
ओ देवता! देश के देवता!!

तेरी हथेली उठी,
किरणें उगने लगीं,
ऋतु हो गई चंपई
दिन की साँसें जगीं,
तू ने दिया रात को
गुलाबी सुबह का पता।
ओ देवता! देश के देवता!!

फलने लगा फौलाद
मेहनत की बाँह में,
उठते हुए तूफ़ान
तेरे द्वारे थमें,
संघर्ष की गोद में
सदा से सृजन खेलता।
ओ देवता! देश के देवता!!

काल का वसंती मंत्र
पढ़ती हैं पीढ़ियाँ,
सपने सयाने हुए,
चढ़ते हैं सीढ़ियाँ
संसार बढ़ते हुए
तेरे चरण देखता।

- सोम ठाकुर




राष्ट्रगान/देश-भक्ति कविता 


जन गण मन अधि नायक जय हे!
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिंध गुजरात मराठा,
द्राविण उत्कल बंग।

विंध्य हिमाचल यमुना गंगा,
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जय-गाथा।

जन-गण-मंगलदायक जय हे!
भारत भाग्य विधाता।
जय हे! जय हे! जय हे!
जय जय जय जय हे!

- रवींद्र नाथ ठाकुर



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