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Saturday, March 14, 2026
ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित विजेताओं को सूची
रुहेलखंडी लोकगीत हिंदी में | Ruhelkhandi Lok Geet
होली के गीत
त्योहारों को आधार बनाकर गीत लिखने की परम्परा हमारे देश में अत्यन्त प्राचीन है। भारतवर्ष के प्रत्येक हिस्से में प्रारम्भ से ऐसे गीतों की रचना की गयी जो विभिन्न त्योहारों के अवसर पर गाये जाते थे। रुहेलखण्ड क्षेत्र में ऐसे अनेक गीतों की रचना की गई, जिन्हें त्यौहारों के मौके पर गाया जाता है। होली के अवसर पर गाऐ जाने वाले गीतों की अपनी पृथक पहचान हैं। इन गीतों में कुछ इस प्रकार हैं--
होली गीत
सं०- (i )
कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई
आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ
कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई
एजी अपनी जली कुछ कह बैठूँगी,
सास सुनेगी रिसाई हमें नींद न आई।
एजी तुमरी तो रैन -रैन से गुजरी,
कुवजा से आँख लगाई हमें रात नींद न आई।
एजी चोया चंदन और आरती,
मोति न मांग भराई हमें रात नींद न आई।
कल थे कहाँ कन्हाई हमें रात नींद न आई,
आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ,
कल थे कहाँ कन्हाई हमें रात नींद न आई,।
होली गीत
सं०- (ii )
र्तृया होली में ला दो गुलाल मेरा जिया न माने रे,
खाने को ला दो पूरी कचौरी चखने को लादो कवाब,
मेरा जिया न माने रे।
पीने को लादो लैमन बोतल चखने को लादो शराब
मेरा जिया न माने रे।
बजानो को लादो तबला सारंगी गढ़ने को लादो किताब,
मेरा जिया न माने रे।
बैठने को लादो चौकी कुर्सी लिखने को लादो किताब,
मेरा जिया न माने रे।
रंगने को लादो पुड़िया बसंती मलने को ला दो गुलाल,
मेरा जिया न माने रे।
होली गीत
सं०- (iii )
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
बाके कमर में बंसी लटक रही
और मोर मुकुटिया चमक रही
संग लायो ढेर गुलाल,
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
इक हाथ पकड़ लई पिचकारी
सूरत कर लै पियरी कारी
इक हाथ में अबीर गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
भर भर मारैगो रंग पिचकारी
चून कारैगो अगिया कारी
गोरे गालन मलैगो गुलाल
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
यह पल आई मोहन टोरी
और घेर लई राधा गोरी
होरी खेलै करैं छेड़ छाड़
अरी भागो री भागो री गोरी भागो,
रंग लायो नन्द को लाल।
होली की चौपाइयाँ
रुहेलखण्ड के गाँवों में होली के उपरान्त लोग होली मिलन हतु सामूहिक स्थल पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर लोग गोलाकार श्रृँखला बनाकर नृत्य करते हैं और विभिन्न प्रकार की चौपाइयाँ गाते हैं। यह चौपाई परम्परागत है । ढोल की संगत पर गाई जाने वाली इन चौपाइयों में गाँव के समस्त लोग हिस्सा लेते हैं।
इन चौपाइयों में से कुछ इस प्रकार हैं --
चौपाई
सं० - (i )
चौपाई का विषय -- रामचन्द्र जी की वन यात्रा
वन को चले दो भाई री माई इन्हें समझावो न कोई,
आगे -आगे राम चलत हैं,पीछे से लक्ष्मण भाई री माई,
इन्हें समझावो न कोई ।
ताके पीछे चलैं जानकी शोभा बखानी न जाए री माई
इन्हें समझावो न कोई ।
राम बिना मेरी सूनी आयोध्या, लक्ष्मण बिना ठकुराई,
सीता बिना मेरी सूनी रसुइया ,जे दुख सहे न जाये री,
इन्हें समझावो न कोई ।
अरे भादों की रैन अन्धेरी पवन चलैं पुरवाई,
इन्हें समझावो न कोई ।
वन को चले दो भाई री माई इन्हें समझावो न कोई,
आगे -आगे राम चलत हैं,पीछे से लक्ष्मण भाई री माई,
इन्हें समझावो न कोई ।
चौपाई
सं० - (ii )
चौपाई का विषय -- मन्दोदरी द्वारा रावण को यह समझाना कि वह सीता राम को लौटा दें।
उठ देखो समुद्र जी के तीर रे बलम
जनक सिया जी के पति आए
पड़े -पड़े दिन बहुतक हुए गए
समुद्र बधतु है नाए रे बालम
जनक सिया जी के पति आए
सिला काट हनुमत लै आए
उसई से सेतु बधो रे बालम
जनक सिया जी के पति आए रे
चन्दन कटवावो रथ बनवावो
सिये लैओ बैठाए रे बालम
जनक सिया जी के पति आए
क्यों मन डरपे चतुर कामिनी
क्यों मन शंका खाए रे बालम
जनक सिया जी के पति आए
महादेव शिव शंकर वश में
काल बँधो पाटी से हमारे
जनक सिया जी के पति आए
उठ देखो समुद्र जी के तीर रे बलम
जनक सिया जी के पति आए।
चौपाई
सं० - (iii )
चौपाई का विषय -- राम के बनवास के दौरान की घटनाओं का संक्षिप्त विवरण
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
पहले राम तपे वन में तपसी दोनों वीर
पंचवेदिका तापे रे सरजू के तीर
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
दूजे मया मृग मारन को निकले दोनों वीर
बिना मारे मृग को रे अचबए को नीर
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
तीजै रौजा छल कीनो सीता जी के साथ
सिया हरी बन में से रे माता भिक्षा डार
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
चौथो सोंच जटायु को दशरथ जी को सोंच
सिया हरि बन में से तिनहु को सोंच
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
पंचाए तस्सुरा मारन को खरदूषण मार
नार ताडुका मारी से नक लीनी काट
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
छठे वाण छल से मारो प्रभु एकहे वाण
राज दियो सुग्रीवो रे अंगद जुवराज
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
सातवें सायथ शादी रे अंजन के लाल
जाए समुद्र में छाए रे दल उल्ले पार
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
आठमे पद में आठासी से लौके भगवान
सेतु बाँध दल उतरे रे दल पल्ले पार
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
नवें वाण झर लागो रे धरती धर्म द्वार
हर की शरणा लागी रे उभरें रे प्राण
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
दसए रावण हाँसो रे जुद खेलो अथाय
सीधो चलो बैकुंठो रे रघुवर के हाथ
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
एकादशी गड़ तोरो रे सिया लाए लिवाए
जाए अवधपुर छाए रे घर मंगल चार
राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर
चौपाई
सं० - (iv )
नीम पेठ आ गईं नींव निवौरी
आम पे आ गए अम्बा
होली पे आ गए पान फूल
पनिहारी पे जोवन धल्ला
तेरी कौन जात परिहार ठाड़ी होई जा री।
विवाह के गीत
विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीत
शादी विवाह के अवसर पर गीत गाने की परम्परा हमारे देश की संस्कृति का अभिन्न अंग है। इन गीतों के अभाव में विवाह के अवसर को पूर्ण नहीं माना जाता । रुहेलखण्ड में ऐसे अनेक लोक गीत प्रचलित हैं, जिन्हें विवाह के अवसर पर गाया जाता है। परिवार की महिलाएं ढोलक -- मजीरे की ताल पर सामूहिक रुप से इन गीतों को गाती हैं। प्राय: इन गीतों की धुन पर महिलाएं नृत्य करती हैं। इनमें से कुछ गीत इस प्रकार हैं--
गीत
सं० --(i )
बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।
मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।
बाबा तेरे बैठे नाना तेरे बैठे
मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।
नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के, पायल उतार के।
आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ी।।
बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।
मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।
चाचा तेरे बैठें, ताऊ तेरे बैठे।
मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।
नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के,पायल उतार के।
आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ी।।
बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।
मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।
नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के, पायल उतार के।
आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ीं।।
गीत
सं० --(ii )
लगन आई हरे- भरे
लगन आई मेरे अँगना।
चाचा सज गए. चाची सज गईं,
सज गयी सारी बारात।
रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।
लगन आई हरे- भरे
लगन आई मेरे अँगना।
मामा सज गए. मामी सज गयीं,
सज गयी सारी बारात।
रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।
लगन आई हरे- भरे
लगन आई मेरे अँगना।
भईया सज गए. भाभी सज गयीं,
सज गयी सारी बारात।
रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।
लगन आई हरे- भरे
लगन आई मेरे अँगना।
फूफा सज गए. बुआ सज गयीं,
सज गयी सारी बारात।
रघुन्नदन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।
गीत
सं० --(iii )
बन्नो सोहाग भरी किसी को न न लगे। बन्नो
दादी आई सोहाग चढ़ाने माता आई सोहाग चढ़ाने
उसकी मोतिन से मांग भरी।
और फूलों से गोद भरी। किसी ताई आई सोहाग
चढ़ाई चाची आई सोहाग चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।
और फूलों से गोद भरी। किसी बुआ आई
सोहाग चढ़ाने मौसी आई सोहाग चढ़ाने
जीजा आई सोहाग चढ़ाने भाभी आई सोहाग
चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।
और फूलों से गोद भरी। किसी नानी आई सोहाग
चढ़ाने मामी आई सोहाग चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।
और फूलों से गोद भरी। किसी मेरी लाड़ो
सोहाग भरी किसी की न ना लगे।
गीत
सं० --(iv )
सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना
सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना
तुम आए चटक चदरिया, सिर पै रखो गगरिया,
छोटी ननद लै लेओ साथ।
सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना।
मैने ओढ़ी चटक चुनरिया,सिर पै रखी गगरिया,
छोटी ननदी लै लई साथ ।
रसीले दोऊ नैना।
तुम बैठो कदम की छैया, मैं भर लाऊँ ठन्डो पनिया,
ननदी गर मत कहइयो जाय।
रसीले दोऊ नैना।
वह मोसे पहले आई,उसने दो की चार लगाई,
भैया भाभी के दो यार।
रसीले दोऊ नैना।
फाल्गुन में ब्याह कर्रूँगी,बैसाख में गौना कर्रूँगी,
ननदी कबहूँ न लेऊ तेरो नाम।
रसीले दोऊ नैना।
फाल्गुन में ब्याह रचइयो, बैसाख में गौना करइयो,
भाभी तीजो पे लियो बुलाय,
रसीले दोऊ नैना।
सावन के गीत
विभिन्न ॠतुओं को आधार बनाकर गीत लिखने की परम्परा अति प्राचीन है। सावन ॠतु को आधार बनाकर असंख्य गीत लिखे गये हैं। रुहेलखण्ड क्षेत्र में भी ऐसे गीतों का दर्शन होते हैं। इसी प्रकार के गीत हैं--
गीत
सं०--(i )
ऊँची अटरिया झझन किवरिया,
कोरी आवे झरोकन व्यार जी।
विजनी डुलाउत सास नै देखो,
कोई सास को मुडवा पिराने जी।
लावौ ना अम्मा मेरी कसी खुरपिया,
कोई जंगल बूटी लै आवै जी।
कोई लावै ना रनिया करेजी जी।
लावै ना जम्मा मेरी पाँचौ से कपड़े,
कोई लावौ ना पाँचौ हतियार जी।
कोई रनिया करेजी लै आवे जी,
लेउ ना अम्मा मेरी रनिया करेजी कोई घिस-घिस मुडवा लगावौ
कोह कौ -- बेटा मेरे छलवल करत हौ,
कोई लाए न हिरन करेजी जी।
तुमरे पीहर में रनिया ब्याह उठो है,
कोई तुम्हे पीहर पहुचावें जी।
न मेरे भैया न भतीजो,
कोई कि घर उठो है ब्याहो जी।
तुमरे पिछले रनिया भैया जो जनमें,
कोई उन्हीं को उठो है ब्याहो जी।
आपको तो राजा ने घुडेला सजाये,
कोई रनिया को डुलिया सजायी जी।
एक वन नागो दूजो वन नागो,
कोई तिजवन पहुँचे वन जाये जी।
न हिया चिरही न दिया चिरमगली,
कोई वन में काहे ले आए जी।
पहली कटारी जब मारी है राजा नै,
कोई लै लई वैयान बीच जी।
दूसरी कटारी जब मारी राजा नै,
कोई लै लई जंघन बीच जी।
बिना खता के राजा काहे कौ मारौ,
कोई बाई कोख नन्द लाल जी।
तीसरी कटारी जब मारी है राजा नै,
तीसरी में तजे है प्राण जी।
बाई हाथ राजा लई है करेजी,
कोई दाहिने लहै है नन्द लाल जी।
मलिन -मलिन में बेचत फीरत है,
कोई लाल नै लैलो मौल जी।
कई रुपैया जाको मोल बुलत है,
कोई कइयो रुपैया दै दो जी।
लाख रुपैया जाको मोल बुलत है,
कोई पाँच रुपैया दे दो जी।
लेयो न अम्मा मेरी रनिया करेजी,
कोई घिस- घिस मुडवा लगावोजी।
लावो न अम्मा मेरी पाँचों से कपड़े
होई हम जोगी हो जावेगें।
चन्दा सा मेरी बहू गई है सूरत सी ससुराल जी
काहो को बेटा मेरे सोच करत हो दो--दो व्याहंगी
करा एक गोरी एक साँवली जी।
गीत
सं०--(ii )
नन्हीं - नन्हीं बुदियाँ सावन का मेरा बरसना जी।
पहला झूला -झूला मैनें बावुल जी के राज्य में,
सारी -सारी रतियां बागों का मेरा झूलना जी।
पहला झूला -झूला मैनें भैया जी के राज्य में,
सारी -सारी रतियां सखियों संग मेरा झूलना जी।
एक झूला- झूला मैंने ससुरा जी के राज्य में,
सारी -सारी रतियां महलों में मेरा झूलना जी।
एक झूला- झूला मैंने ससिया जी के राज्य में,
सारी -सारी रतियां सेजों पर मेरा झूलना जी।
नवरात्र के गीत
नवरात्र के अवसर पर गाये जानेवाले गीत
विभिन्न धार्मिक अवसरों का गीतों से गहन सम्बन्ध है। नवरात्र के अवसर पर गाये जाने वाले गीत , भारत के अनेक प्रान्तों में देखे जा सकते हैं। रुहेलखण्ड के गाँवों में ऐसे अनेक गीत प्रचलित हैं , जिन्हें नवरात्र में गाया जाता है। इनमें से कुछ गीत इस प्रकार हैं --
गीत
सं०--i
पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,
सासुल पीसे पीसनो, ससुरा सौवो खाट।
निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।
पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,
देवरानी पीसे पीसनो, देवर सौवो खाट।
निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।
पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,
भाभी पीसे पीसनो, भाईया सौवो खाट।
निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।
पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,
चाची पीसे पीसनो, चाचो सौवो खाट।
निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।
पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,
मामी पीसे पीसनो, मामा सौवो खाट।
निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।
गीत
सं०--ii
दो- दो जोगिनी के बीच अकेला लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली झूमड़ ला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली लटकन ला दे मोय।
दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली नथनी ला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली झमका ला दे मोय।
दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली हरवा ला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली पैन्डल ला दे मोय।
दो - दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली तगड़ी ला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली गच्छा ला दे मोय।
दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली पायलला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली आयल ला दे मोय।
दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
पहली जोगिनी यो उठ बोली बिन्दा ला दे मोय,
दूजी जोगिनी यो उठ बोली सिन्दूर ला दे मोय।
दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।
गीत
सं०--iii
मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।
मेरो ससुरा जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,
बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,
मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।
मेरो जेठ जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,
बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,
मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।
मेरो देवर जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,
बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,
मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।
नवरात्र के समय रुहेलखण्ड को गाँवों और नगरों में छोटी -छोटी बच्चियों द्वारा गाए जाने वाले झुझिया गीत भी अत्यन्त लोकप्रिय हैं। नवरात्र के दिनों में छोटी बच्चियाँ टोलियाँ बनाकर घर-घर जाती हैं और इन गीतों को सामूहिक रुप से गाती हैं। इन गीतों को गाते समय यह बालिकाएं अपने साथ मिट्टी से बने जालीदार कंडील भी रखती हैं। छोटे- छोटे इन कंडीलों के भीतर दिया जलाया जाता है, जिससे कंडील सुन्दर प्रतीत होते हैं।
Thursday, September 11, 2025
अपील का जादू – Appeal ka Jadoo | Harishankar Parsai
एक देश है ! गणतंत्र है ! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूंक, टोना-टोटका से हल किया जाता है ! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-कांटे में कुछ गड़बड़ आ गयी है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतंत्र ठीक चलने लगता है। सारी समस्याएं मुहावरों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया—हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई !
एक दिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के पास यह शिकायत करने गये कि चीजों की कीमतें बहुत बढ़ गयी हैं। प्रधानमंत्री उस समय गाय के गोबर से कुछ प्रयोग कर रहे थे, वे स्वमूत्र और गाय के गोबर से देश की समस्याओं को हल करने में लगे थे। उन्होंने लोगों की बात सुनी, चिढ़कर कहा—आप लोगों को कीमतों की पड़ी है ! देख नहीं रहे हो, मैं कितने बड़े काम में लगा हूँ। मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूं। जैसे गोबर गैस ‘वैसे गोबर नैतिकता’। इस नैतिकता के प्रकट होते ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। तीस साल के कांग्रेसी शासन ने देश की नैतिकता खत्म कर दी है। एक मुंहफट आदमी ने कहा—इन तीस में से बाइस साल आप भी कांग्रेस के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहे हैं, तो तीन-चौथाई नैतिकता तो आपने ही खत्म की होगी ! प्रधान मन्त्री ने गुस्से से कहा-बको मत, तुम कीमतें घटवाने आए हो न ! मैं व्यापारियों से अपील कर दूंगा। एक ने कहा—साहब, कुछ प्रशासकीय कदम नहीं उठायेंगे ? दूसरे ने कहा-साहब, कुछ अर्थशास्त्र के भी नियम होते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा—मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में, यह गांधी का देश है,, यहां हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं अपील से उनके दिलों में लोभ की जगह त्याग फिट कर दूंगा। मैं सर्जरी भी जानता हूं। रेडियो से प्रधानमंत्री ने व्यापारियों से अपील कर दी-व्यापारियों को नैतिकता का पालन करना चाहिए। उन्हें अपने हृदय में मानवीयता को जगाना चाहिए। इस देश में बहुत गरीब लोग हैं। उन पर दया करनी चाहिए। अपील से जादू हो गया। दूसरे दिन शहर के बड़े बाजार में बड़े-बड़े बैनर लगे थे- व्यापारी नैतिकता का पालन करेंगे। मानवता हमारा सिद्धांत है। कीमतें एकदम घटा दी गयी हैं। जगह-जगह व्यापारी नारे लगा रहे थे-नैतिकता ! मानवीयता ! वे इतने जोर से और आक्रामक ढंग से ये नारे लगा रहे थे कि लगता था, चिल्ला रहे हैं-हरामजादे ! सूअर के बच्चे !
गल्ले की दुकान पर तख्ती लगी थी—गेहूं सौ रुपये क्विंटल ! ग्राहक ने आंखें मल, फिर पढ़ा। फिर आंखें मलीं फिर पढ़ा। वह आंखें मलता जाता। उसकी आंखें सूज गयीं, तब उसे भरोसा हुआ कि यही लिखा है। उसने दुकानदार से कहा—क्या गेहूं सौ रुपये क्विंटल कर दिया ? परसों तक दो सौ रुपये था। सेठ ने कहा—हां, अब सौ रुपये के भाव देंगे। ग्राहक ने कहा—ऐसा गजब मत कीजिए। आपके बच्चे भूखे मर जाएँगे। सेठ ने कहा—चाहे जो हो जाये, मैं अपना और परिवार का बलिदान कर दूंगा, पर कीमत नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता का तकाजा है।
ग्राहक गिड़गिड़ाने लगा—सेठजी, मेरी लाज रख लो। दो सौ पर ही दो। मैं पत्नी से दो सौ के हिसाब से लेकर आया हूं, सौ के भाव से ले जाऊंगा, तो वह समझेगी कि मैंने पैसे उड़ा दिये और गेहूं चुरा कर लाया हूं। सेठ ने कहा—मैं किसी भी तरह सौ से ऊपर नहीं बढ़ाऊंगा। लेना हो तो लो, वरना भूखों मरो। दूसरा ग्राहक आया। वह अक्खड़ था। उसने कहा—ऐ सेठ, यह क्या अंधेर मचा रखा है, भाव बढ़ाओ वरना ठीक कर दिये जाओगे। सेठ ने जवाब दिया—मैं धमकी से डरने वाला नहीं हूं। तुम मुझे काट डालो; पर मैं भाव नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता भी कोई चीज है। एक गरीब आदमी झोला लिये दुकान के सामने खड़ा था। दुकानदार आया और उसे गले लगाने लगा। गरीब आदमी डर से चिल्लाया-अरे, मार डाला ! बचाओ ! बचाओ ! सेठ ने कहा—तू इतना डरता क्यों है ?
गरीब ने कहा—तुम मुझे दबोच जो रहे हो ! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? सेठ ने कहा—अरे भाई, मैं तो तुझसे प्यार कर रहा हूं। प्रधान मंत्री ने मानवीयता की अपील की है न ! एक दुकान पर ढेर सारे चाय के पैकेट रखे थे। दुकान के सामने लगी भीड़ चिल्ला रही थी—चाय को छिपाओ। हमें इतनी खुली चाय देखने की आदत नहीं है। हमारी आंखें खराब हो जाएंगे। उधर से सेठ चिल्लाया—मैं नैतिकता में विश्वास करता हूं। चाय खुली बेचूंगा और सस्ती बेचूंगा। कालाबाजार बंद हो गया है।
एक मध्यमवर्गीय आदमी बाजार से निकला। एक दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया। उस आदमी ने कहा—सेठजी, इस तरह बाजार से बेइज्जत क्यों करते हो ! मैंने कह तो दिया कि दस तारीख को आपकी उधारी चुका दूंगा। सेठ ने कहा—अरे भैया, पैसे कौन मांगता है ? जब मर्जी हो, दे देना। चलो, दुकान पर चलो। कुछ शक्कर लेते जाओ। दो रुपये किलो।
दस दिन का अनशन – Das Din ka Anshan | Harishankar Parsai
आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."
बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.
सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "
मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए."
सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, " यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे."
मैंने कहा, " अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल है, गोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं क उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा."
बन्नू ने कहा," सफलता मिल जायेगी?"
मैंने कहा," यह तो 'इशू' बनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम 'एक्सपर्ट' के पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी 'प्रैक्टिस' चल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं."
हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा," ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?"
बन्नू कांप गया. बोला," मुझे डर लगता है."
"जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है."
"मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है."
बाबा ने कहा," अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. 'इशू' हम बनायेंगे."
बन्नू फिर डरा. बोला," मर तो नहीं जाऊँगा."
बाबा ने कहा," चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे."
11 जनवरी
आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है - 'सबको
सन्मति दे भगवान्!'. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि 'मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!'
सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा," यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?"
बाबा बोले," देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है."
सावित्री ने कहा," मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ."
बाबा ने शान्ति से कहा," देवी, तू तो 'इशू' है. 'इशू' से थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."
वह बड़बड़ाती हुई चली गई.
बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया," चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है."
13 जनवरी
बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, " जयप्रकाश नारायण आये?"
मैंने कहा," वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है."
वह पूछता है," विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?"
बाबा बोले," उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है."
बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,"भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ."
आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.
पूछने लगे," उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? "
बाबा ने कहा," हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है."
मैंने कहा," और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा."
14 जनवरी
बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.
आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.
इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग 'धर्म की जय हो!' नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी----
"राधिका प्रसाद-- पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो."
स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.
15 जनवरी
रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.
जनमत बन गया है.
स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने---
"बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है."
"धन्य है इस निष्ठां को."
"मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला."
"उसका मरद भी कैसा बेशरम है."
"सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था."
"स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!"
"बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना."
आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.
बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.
अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.
आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने मिलने से इनकार कर दिया.
देखते हैं कब तक नहीं मिलते.
शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे," किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है."
हमने समझाया," यह 'इशू' ज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी."
वे शांत हुए. बोले," अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा."
मैंने कहा," फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है."
जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.
बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.
बाद में हमने उससे कहा," अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं."
16 जनवरी
जयप्रकाश बाबू की 'मिशन' फेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा," हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा."
हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा," पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी 'एसीटोन' आने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें."
बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, "अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा. उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का."
आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.
हमने नामंजूर कर दिया.
17 जनवरी
आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं---
"बन्नू के प्राण बचाओ!
बन्नू की हालत चिंताजनक!'
मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!"
एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया---
"कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग---!
बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!
बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !"
ब्राम्हण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राम्हण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.
हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.
इससे निपटकर वही लोग ब्राम्हणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.
पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.
बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे 'केस' मज़बूत होगा.
18 जनवरी
रात को ब्राम्हणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.
सुबह ब्राम्हणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.
शहर में दफा 144 लग गयी.
सनसनी फैली हुई है.
हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा," इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा."
हमने कहा," तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी."
वे कहने लगे," पहले अनशन तुडवाओ ? "
हमने कहा," सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है."
सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.
मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में 'डेडलॉक' आ गया है.
छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.
रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.
'प्राण बचाओ'---की मांग आज और बढ़ गयी.
19 जनवरी
बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.
बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग 'एक्सपोज़' हो जायेंगे.
कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.
प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.
20 जनवरी
'डेडलॉक '
सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.
बन्नू अब संभल नहीं रहा है.
उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि "वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!"
सरकार भी घबराई मालूम होती है.
साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.
ब्राम्हण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राम्हण आत्मदाह करेंगे.
सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.
बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.
राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.
जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.
डॉ. लोहिया ने कहा है कि जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.
21 जनवरी:
बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.
व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.
भजन औ र प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.
ब्राम्हणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.
चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है," सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ."
नारे लग रहे हैं -- सत्य की जय! धर्म की जय!
कंधे श्रवणकुमार के – Kandhe Shravan Kumar ke | Harishankar Parsai
एक सज्जन छोटे बेटे की शिकायत करते हैं - कहना नहीं मानता और कभी मुँहजोरी भी करता है। और बड़ा लड़का? वह तो बड़ा अच्छा है। पढ़-लिखकर अब कहीं नौकरी करता है। सज्जन के मत में दोनों बेटों में बड़ा फर्क है और यह फर्क कई प्रसंगों में उन्हें दिख जाता है। एक शाम का प्रसंग है। वे नियमित संध्यावंदन करते हैं (यानी शराब पीते हैं), कोई बुरा नहीं करते। बहुत लोग पीते हैं। गंगाजल खुलेआम पीते हैं, शराब छिपकर - गो शराब ज्यादा मजा देती है। आदमी बेमजा खुलकर बात करता है। और बामजा को छिपाकर, यानी सुख शर्म की बात मानी जाती है। लेकिन बात उन सज्जन की उठी थी। उन्हें सोडा की जरूरत पड़ती है। बड़ा लड़का कहते ही फौरन किताब के पन्नों में पेन्सिल रखकर सोडा लेने दौड़ जाता था। लाता छोटा भी है, पर फौरन नहीं उठता। पैराग्रफ पूरा करके उठता है। भारतीय पिता को यह अवज्ञा बरदाश्त नहीं। वह सीमांतों पर संबंध रखता है। या तो बेटे को पीटेगा या उसके हाथ से पिटेगा। बीच की स्थिति उसे पसंद नहीं। छोटा बेटा भी हरकत करता है। पिता जल्दी मचाते हैं, तो कह भी देता है ‘जाता तो हूँ’ ! उसके मन में सवाल और शंका भी उठती है। सोचता है - यह पिता फीस रोकर देता है, कपड़े बनवाना टालता जाता है, फिर यह नहीं सोचता कि इसे पढ़ाई के बीच से नहीं उठना चाहिए।
बड़े लड़के के मन में कभी सवाल और शंका नहीं उठे। वह मेरी ही उम्र का होगा। उसने वही किताब पढ़ी होंगी, जो मैंने पढ़ी थीं। हम सब गलत किताबों की पैदावार हैं। ये सवालों को मारने की किताबें थीं। स्कूल प्रार्थना से शुरू होता था -‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन!’ - क्यों शरण में आए हैं, किसके डर से आए हैं - कुछ नहीं मालूम। शरण में आने की ट्रेनिंग अक्षर-ज्ञान से पहले हो जाती थी। हमने गलत किताबें पढ़ीं हैं और आँखों को उनमें जड़ दिया। छोटा लड़का दूसरी किताबें पढ़ता है और आँखें उनमें गड़ाता नहीं है, आसपास भी देख लेता है। वह अपनी आँखों को फूटने से बचाने की कोशिश कर रहा है। इससे सारे पिता-स्वरूप लोग परेशान हैं - भौतिक पिता, गुरु, बड़े-बूढ़े शासक और नेता। हमारी किताबों में पिता-स्वरूप लोग सवाल और शंका से ऊपर होते थे। शिष्य पक्षपाती गुरु को अँगूठा काटकर दे देता था और दोनों ‘धन्य’ कहलाते थे। अब शिष्य उपकुलपति से रिपोर्ट कर देता है कि अमुक अध्यापक शिष्यों के अँगूठे कटवाते हैं। यदि उपकुलपति ध्यान नहीं देते, तो वह विद्यार्थियों का जुलूस लेकर विश्वविद्यालय पर धावा बोल देता है। हमें तो तीसरी कक्षा में ही उस भक्त की कथा पढ़ा दी गई थी, जो अपने पुत्र को आरे से चीरता है। कुछ लोगों के लिए आदमी और कद्दू में कोई फर्क नहीं। दोनों ही चीरे जा सकते हैं। उस भक्त का नाम मोरध्वज था। ऐसी सारी कथाओं का अंत ऐसा होता है जिससे चिरनेवालों को प्रोत्साहन मिले। भगवान प्रकट होते हैं और जिस पार्टी का जो नुकसान हुआ है, पूरा कर देते हैं - मृत को जिला देते हैं, जायदाद चली गई है, तो वापस दिला देते हैं, किसी को मुआवजे के रूप में स्वर्ग भेज देते हैं। कथा के इस अंत ने कितनी पीढ़ियों को आरे से चिरवा दिया होगा।
इस कथा पर न मैंने शंका की थी, न सज्जन के बड़े बेटे ने। मगर छोटा लड़का पूछेगा - पिताजी, चीरने से पहले यह बताइए कि भगवान इससे खुश होते हैं इसका सबूत क्या है? फिर इसकी क्या गारंटी कि वे आ ही जाएँगे? उन्हें हजार काम लगे रहते हैं। फिर इसका क्या भरोसा कि वे कटे को जोड़ देते हैं? अगर यह सब हो भी, तो भी आपके सत्यकल्पित विश्वास आपके अपने हैं। उनके लिए आप अपने को कटवाइए और अपनी हठ निभाइए। पहले जन्मे लोग अपनी सही-गलत मान्यता के लिए पीछे जन्मों को क्यों काटें? एक पीढ़ी के लिए दूसरी पीढ़ी क्यों चीरी जाए?
लड़के मुँहजोरी करने लगे हैं। कंबख्तों की किताबें बदल गई हैं। कोर्स इतनी जल्दी क्यों बदलने लगे हैं? बड़े लड़के से कह दिया था कि अपनी किताबें सँभालकर रखना छोटे के काम आएँगी! पर किताबें बदल गईं। पुरानी किताबें किसी के काम नहीं आ रही हैं। एक ही किताब पीढ़ियों क्यों नहीं चलती? पिताओं को यह चिंता है। बड़ा लड़का फौरन किताब में पेन्सिल रखकर सोडा लेने भाग जाता था। छोटा पैराग्राफ पूरा करके उठता है। भीष्म की कथा भी हमें तभी पढ़ा दी गई थी। हमने भीष्म को ‘धन्य’ कहा था। छोटा लड़का शांतनु को ‘धिक्कार’ कहेगा। ‘धन्य’ और ‘धिक्कार’ की जगहें बदल गई हैं। लोगों को पता नहीं है। छोटा लड़का भीष्म से कहेगा - क्या तुमने भी वही किताबें पढ़ी थीं, जो हमारे बड़े भाई ने? तुम पिता से क्यों नहीं कह सके कि जीवन भर के भोग के बाद भी आप की लिप्सा बनी हुई है, तो मैं क्या करूँ? अपना संयम दे सकता, तो थोड़ा दे देता, जीवन कैसे दे दूँ? राज्य से आप मुझे वंचित कर सकते हैं, पर मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार मैं हरगिज नहीं छोड़ूँगा।
छोटा टिप्पणी करेगा - भीष्म ऐसा नहीं कह सके। उन्हें पिता ने आदमी से तीर चलानेवाली मशीन बना दिया। ऑटोमेटिक धनुष ! महाभारत का यह सबसे भला, तेजस्वी, आदरणीय, ज्ञानी व्यक्ति सबसे दयनीय भी है। मगर देख रहा हूँ कि श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। यह काँवड़ हिलाने लगा है। काँवड़ में अंधे परेशान हैं। विचित्र दृश्य है यह। दो अंधे एक आँख वाले पर लदे हैं और उसे चला रहे हैं। जीवन से कट जाने के कारण एक पीढ़ी दृष्टिहीन हो जाती है, तब वह आगामी पीढ़ी के ऊपर लद जाती है। अंधी होते ही उसे तीर्थ सूझने लगते हैं। वह कहती है - हमें तीर्थ ले चलो। इस क्रियाशील जन्म का भोग हो चुका है। हमें आगामी जन्म के भोग के लिए पुण्य का एडवांस देना है। आँखवाले की जवानी अंधों को ढोने में गुजर जाती है। वह अंधों के बताए रास्ते पर चलता है। उसका निर्णय और निर्वाचन का अधिकार चला जाता है। उसकी आँखें रास्ता नहीं खोजतीं, सिर्फ राह के काँटे बचाने के काम आती हैं।
कितनी काँवड़े हैं - राजनीति में, साहित्य में, कला में, धर्म में, शिक्षा में। अंधे बैठे हैं और आँखवाले उन्हें ढो रहे हैं। अंधे में अजब काँइयाँपन आ जाता है। वह खरे और खोटे सिक्के को पहचान लेता है। पैसे सही गिन लेता है। उसमें टटोलने की क्षमता आ जाती है। वह पद टटोल लेता है, पुरस्कार टटोल लेता है, सम्मान के रास्ते टटोल लेता है। बैंक का चेक टटोल लेता है। आँखवाले जिन्हें नहीं देख पाते, उन्हें वह टटोल लेता है। नए अंधों के तीर्थ भी नए हैं। वे काशी, हरिद्वार, पुरी नहीं जाते। इस काँवड़वाले अंधे से पूछो - कहाँ ले चलें? वह कहेगा - तीर्थ! कौन सा तीर्थ? जवाब देगा केबिनट! मंत्रिमंडल! उस काँवड़वाले से पूछो, तो वह भी तीर्थ जाने को प्रस्तुत है। कौन-सा तीर्थ चलेंगे आप? जवाब मिलेगा अकादमी, विश्वविद्यालय! मगर काँवड़े हिलने लगी हैं। ढोनेवालों के मन में शंका पैदा होने लगी है। वे झटका देते हैं, तो अंधे चिल्लाते हैं - अरे पापी! यह क्या करते हो? क्या हमें गिरा दोगे? और ढोनेवाला कहता है - अपनी शक्ति और जीवन हम अंधों को ढोने में नहीं गुजारेंगे। तुम एक जगह बैठो। माला जपो। आदर लो, रक्षण लो। हमें अपनी इच्छा से चलने दो। अनुभव दे दो, दृष्टि मत दो! वह हम कमा लेंगे।
राजनीति, साहित्य आदि तो बड़े प्रगट क्षेत्र हैं। अप्रगट रूप से भी, विभिन्न क्षेत्रों में श्रवणकुमार काँवड़ उतारने के लिए हिला रहे हैं। वे किन्हीं विश्वासों की आरी से चिरने को तैयार नहीं हैं। मैं कॉफी हाउस के कोने में बैठे उस युवक की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसने गुस्से में दाढ़ी बड़ा ली है, जैसे उसकी दाढ़ी एक खास साइज और आकार की होते ही क्रांति हो जाएगी। बढ़ी दाढ़ी, ड्रेन पाइप और ‘सो ह्वाट’ वालों से यह नहीं हो रहा है। चुस्त कपड़े, हेयर स्टाइल और ‘ओ वंडरफुल’ वालियों से भी यह नहीं हो रहा है। ये तो न विश्वास में सच्चे, न शंका में। यह बिना प्रदर्शन और शोर शराबे के घरों और परिवारों में हो रहा है। सुशील, विनम्र और आज्ञाकारी युवक-युवती काँवड़े उतारने लगे हैं किसी के विश्वास के ओर से कटने से इनकार करने लगे हैं। एक परिचित है, जिसका ज्योतिष में विश्वास है। उनकी शिक्षिता जवान लड़की है। जिससे वह शादी करना चाहती थी, उससे ग्रह नहीं मिले। एक-दो और योग्य वरों से मिलान किया पर ग्रह यहाँ भी नहीं मिले। उसके ग्रहों ने किसी नालायक से मिलने के लिए स्थिति सँभाली होगी। लड़की एक दो साल घुटती रही। एक दिन उसने नम्रता से परिवार से कह दिया - ‘आप लोगों का इस ज्योतिष में विश्वास है, पर मेरा नहीं है। जो मेरा विश्वास ही नहीं है, उस पर मेरा बलिदान नहीं होना चाहिए।’ परिवार कुछ देर तो चमत्कृत रहा, फिर उसकी इच्छा से शादी कर दी। देख रहा हूँ कि मोरध्वज का आरा छीनकर फेंका जा रहा है। श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। वह काँवड़ को उतार कर रखने लगा है। वे सज्जन परेशान हैं। छोटा लड़का पैराग्राफ पूरा करके उठता है। बड़ा तो फौरन पेन्सिल रखकर दौड़ जाता था।
एक मध्यमवर्गीय कुत्ता – Ek Madhyamvargiya Kutta | Harishankar Parsai
मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, “इनके यहां कुत्ता तो नहीं है?“ मित्र ने कहा, “तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!” मैंने कहा, “आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता. उनसे निपट लेता हूं. पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूं.“
कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते. वहां जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है. अपने स्नेही से “नमस्ते“ हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- “क्यों यहां आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहां से !”
फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता- चार बार काट ले. डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है. यूं कुछ आदमी कुत्ते से अधिक ज़हरीले होते हैं. एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था. मैंने कहा, ”इन्हें कुछ नहीं होगा. हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ.”
एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया. मैं उनके बंगले पर पहुंचा तो फाटक पर तख्ती टंगी दीखी- ”कुत्ते से सावधान !” मैं फ़ौरन लौट गया.
कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ”आप उस दिन चाय पीने नहीं आये.” मैंने कहा, “माफ़ करें. मैं बंगले तक गया था. वहां तख्ती लटकी थी- ‘कुत्ते से सावधान.‘ मेरा ख़्याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं. पर नेमप्लेट कुत्ते की टंगी हुई दीखी.“ यूं कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है. मार्क ट्वेन ने लिखा है- ‘यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा.‘ कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है.
बंगले में हमारे स्नेही थे. हमें वहां तीन दिन ठहरना था. मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही ”भौं-भौं” की आवाज़ आयी. मैं दो क़दम पीछे हट गया. हमारे मेजबान आये. कुत्ते को डांटा- ‘टाइगर, टाइगर!’ उनका मतलब था- ‘शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं. तू इतना वफ़ादार मत बन.‘
कुत्ता ज़ंजीर से बंधा था. उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था. मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया. मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है. लगता ऐसा ही है. मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूं. चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो. उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी. मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता.
शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे. नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था. मैंने देखा, फाटक पर आकर दो ‘सड़किया‘ आवारा कुत्ते खड़े हो गए. वे सर्वहारा कुत्ते थे. वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते. फिर यहां-वहां घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते. पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था. वे सहम जाते और यहां-वहां हो जाते. पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते. मेजबान ने कहा, “यह हमेशा का सिलसिला है. जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं.“
मैंने कहा, “पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए. यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है. सुविधाभोगी है. वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं. इसकी और उनकी बराबरी नहीं है. फिर यह क्यों चुनौती देता है!”
रात को हम बाहर ही सोए. ज़ंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था. अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता. आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है. जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहां हूं, तुम्हारे साथ हूं.
मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है. यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है. मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते. उनका रोब ही निराला ! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना. आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे. लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे. कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी. वे बैठे रहते या घूमते रहते. फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट.
यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है. कहता है- ‘मैं तुममें शामिल हूं.‘ उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का. यह मध्यवर्गीय चरित्र है. यह मध्यवर्गीय कुत्ता है. उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है. तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है. हमारी आहट पर वह भौंका नहीं,
थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया. आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं. थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया. मैंने मेजबान से कहा, “आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है.“
मेजबान ने बताया, “आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया. वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही. दोनों ने इसे घेर लिया. इसे रगेदा. दोनों इस पर चढ़ बैठे. इसे काटा. हालत ख़राब हो गयी. नौकर इसे बचाकर लाया. तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है. डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउंगा.“
मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा. दीन भाव से पड़ा था. मैंने अन्दाज़ लगाया. हुआ यों होगा-
यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा. उन कुत्तों पर भौंका होगा. उन कुत्तों ने कहा होगा- “अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता. ढोंग रचता है. ये पट्टा और ज़ंजीर लगाये हैं. मुफ़्त का खाता है. लॉन पर टहलता है. हमें ठसक दिखाता है. पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है. संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा. हममें से है तो निकल बाहर. छोड़ यह पट्टा और ज़ंजीर. छोड़ यह आराम. घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा. धूल में लोट.“ यह फिर भौंका होगा. इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे. यह कहकर- ‘अच्छा ढोंगी. दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं.‘
इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी.
कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है|
खेती – Kheti | Harishankar Parsai
सरकार ने घोषणा की कि हम अधिक अन्न पैदा करेंगे और एक साल में खाद्य में आत्मनिर्भर हो जायेंगे।
दूसरे दिन कागज के कारखानों को दस लाख एकड़ कागज का आर्डर दे दिया गया। जब कागज आ गया, तो उसकी फाइलें बना दी गयीं। प्रधानमंत्री के सचिवालय से फाइल खाद्य विभाग को भेजी गयी। खाद्य विभाग ने उस पर लिख दिया कि इस फाइल से कितना अनाज पैदा होना है और अर्थ विभाग को भेज दिया।
अर्थ विभाग में फाइल के साथ नोट नत्थी किये गये और उसे कृषि विभाग भेज दिया गया। कृषि विभाग में उसमें बीज और खाद डाल दिये गये और उसे बिजली विभाग को भेज दिया। बिजली विभाग ने उसमें बिजली लगायी और उसे सिंचाई विभाग को भेज दिया गया।
अब यह फाइल गृह विभाग को भेज दी गयी। गृह विभाग विभाग ने उसे एक सिपाही को सौंपा और पुलिस की निगरानी में वह फाइल राजधानी से लेकर तहसील तक के दफ्तरों में ले जायी गयी। हर दफ्तर में फाइल की आरती करके उसे दूसरे दफ्तर में भेज दिया जाता।
जब फाइल सब दफ्तर घूम चुकी तब उसे पकी जानकर फूड कार्पोरेशन के दफ्तर में भेज दिया गयाऔर उस पर लिख दिया गया कि इसकी फसल काट ली जाए। इस तरह दस लाख एकड़ कागज की फाइलों की फसल पककर फूड कार्पोरेशन के पास पहुँच गयी।
एक दिन एक किसान सरकार से मिला और उसने कहा- "हुजूर हम किसानों को आप जमीन, पानी और बीज दिला दीजिए और अपने अफसरों से हमारी रक्षा कीजिए, तो हम देश के लिए पूरा अनाज पैदा कर देंगे।"
सरकारी प्रवक्ता ने जवाब दिया- "अन्न की पैदावार के लिए किसान की अब जरूरत नहीं है। हम दस लाख एकड़ कागज पर अन्न पैदा कर रहे हैं।"
कुछ दिनों बाद सरकार ने बयान दिया- "इस साल तो संभव नहीं हो सका, पर आगामी साल हम जरूर खाद्य में आत्मनिर्भर हो जायेंगे।" और उसी दिन बीस लाख एकड़ कागज का ऑर्डर और दे दिया गया।
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