भूषण - रीतिकाल के सुपरिचित वीर रस कवि / Kavi Bhushan ka Kavya

भूषण के कवित्त Bhushan ke Kavit

 इंद्र जिम जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर/भूषण

इंद्र जिम जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर रावन सदंभ पर रघुकुलराज है।
पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है।

दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुँड पर भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है।
तेज तम-अंस पर कान्ह जिम कंस पर यौं मलेच्छ-बंस पर सेर सिवराज है॥

भूषण कवि कहते हैं कि इंद्र ने जिस प्रकार जंभासुर नामक दैत्य पर आक्रमण करके उसे मारा था और जिस प्रकार बाडवाग्नि समुद्र के पानी को जलाकर सोख लेती है, अभिमानी एवं छल-कपटी रावण पर जिस प्रकार श्रीराम ने आक्रमण किया था, जैसे बादलों पर वायु के वेग का प्रभुत्व रहता है, जिस प्रकार शिवजी ने रति के पति कामदेव को भस्म कर दिया था, जिस प्रकार सहस्रबाहु (कार्त्तवीर्य) राजा को परशुराम ने आक्रमण कर मार दिया था, जंगली वृक्षों पर दावाग्नि जैसे अपना प्रकोप दिखलाती है और जिस प्रकार वनराज सिंह का हिरणों के झुंड पर आतंक छाया रहता है अथवा हाथियों पर मृगराज सिंह का आतंक रहता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें अंधकार को समाप्त कर देती हैं और दुष्ट कंस पर जिस तरह आक्रमण करके भगवान् श्रीकृष्ण ने उसका विनाश कर दिया था, उसी प्रकार सिंह के समान शौर्य एवं पराक्रम वाले छत्रपति शिवाजी का मुग़लों के वंश पर आतंक छाया रहता है। अर्थात् वे मुग़लों का प्रबल विरोध करते है और वीरतापूर्वक उन पर आक्रमण कर विनाश-लीला करते हैं। उनके शौर्य से समस्त मुग़ल भयभीत रहते हैं।



आपस की फूट ही तें सारे हिंदुवान टूटे/भूषण

आपस की फूट ही तें सारे हिंदुवान टूटे टूट्यो कुल रावन अनीति अति करतें।
पैठियो पताल बलि बज्रधर ईरषा तें टूट्यो हिरनाच्छ अभिमान चित धरतें।

टूट्यो सिसुपाल बासुदेव जू सौं बैर करि टूट्यो है महिष दैत्य अध्रम बिचरतें।
राम-कर छूवन तें टूट्यो ज्यौं महेस-चाप टूटी पातसाही सिवराज-संग लरतें॥

कवि भूषण कहते हैं कि समस्त हिंदू राज्य आपसी फूट के कारण ही टूट गए, अर्थात् पराजित हो गए। रावण का वंश अति अनीति करने के कारण नष्ट हुआ। भगवान विष्णु से ईर्ष्या करने के कारण ही राजा बलि को पाताल-लोक जाना पड़ा था। शिशुपाल ने वासुदेव श्रीकृष्ण से शत्रुता की, इसलिए उसका भी विनाश हुआ और महिषासुर नामक दैत्य नीच और पाप-कर्म में प्रवृत्त था, इसलिए मारा गया। जिस प्रकार भगवान राम के हाथों का स्पर्श पाते ही शंकर का धनुष टूट गया था उसी प्रकार शिवाजी के साथ युद्ध करते ही मुग़ल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।



चोरी रही मन में ठगोरी रूप ही में रही/भूषण

चोरी रही मन में ठगोरी रूप ही में रही नाहीं तौ रही है एक मानिनी के मान में।
केस में कुटिलताई नैन में चपलताई भौंह में बँकाई हीनताई कटियान में।

भूषन भनत पातसाही पातसाहन में, तेरे सिवराज राज अदल जहान में।
कुच मे कठोरताई रति में निलजताई छाँड़ि सब ठौर रही आइ अबलान में॥

कवि भूषण वर्णन करते हुए कहते हैं कि शिवाजी के शासन में कहीं भी चोरी नहीं होती है, केवल मन की चोरी होती है। कहीं पर भी ठग-विद्या नहीं चलती है, केवल रूप-सौंदर्य की ही मोहिनी चलती है। उनके राज्य में दान देने में कोई ‘नहीं-नहीं’ नहीं करता, केवल मानिनी नायिकाएँ ही मान में ‘नहीं-नहीं’ करती हैं। इसी प्रकार किसी के आचरण में अस्थिरता नहीं है, केवल नेत्रों में चंचलता है। जनता के व्यवहार में टेढ़ापन नहीं है, केवल भौंहों में ही व्रकता है। धन-वैभव और आचरण में हीनता नहीं है, केवल सुंदरियों के कटि भागों में ही पतलापन (कृशता) है। कवि भूषण कहते हैं कि इसी प्रकार किसी का पतन नहीं होता है, केवल मुग़ल बादशाहों का ही पतन होता है। हे शिवाजी! आपके न्यायपूर्ण शासन या राज में संसार में कठोरता का व्यवहार कोई नहीं करता है, केवल नायिकाओं के स्तनों में ही कठोरता रहती है। इसी प्रकार कहीं पर कोई निर्लज्ज आचरण नहीं करता है, केवल रति-क्रीड़ा में अबलाओं में निर्लज्जता रहती है।


राखी हिंदुवानी हिंदुवान को तिलक राख्यो/भूषण

राखी हिंदुवानी हिंदुवान को तिलक राख्यो अस्मृति पुरान राखे बेद बिधि सुनीमैं।
राखी रजपूती राजधानी राखी राजन की धरामैं धरम राख्यो गुन राख्यो गुनीमैं।

भूषन सुकबि जीति हद्द मरहट्ठन की देस-देस कीरति बखानी तव सुनी मैं।
साहि के सपूत सिवराज समसेर तेरी दिल्ली दल दाबि कै दिवाल राखी दुनी में॥

कवि भूषण कहते हैं कि हे शाहजी के सुपुत्र महाराज शिवाजी! आपने हिंदू धर्म एवं संस्कृति को नष्ट होने से बचा लिया और हिंदुओं के तिलक की रक्षा की। इतना ही नहीं, आपने हिंदू धर्मग्रंथों की रक्षा की। वैदिक मर्यादाओं का उल्लंघन होने से बचाया, अर्थात् आपने स्मृतियों, पुराणों और वेदों की रक्षा की और क्षत्रियों के क्षत्रियत्व को भी बचाया है। क्षत्रिय राजाओं की राजधानियों की सुरक्षा की। पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की और गृहिणियों के गुणों की रक्षा की। भूषण कवि कहते हैं कि आपने मराठों की अधिकार सीमा की रक्षा की, अर्थात् उनकी अधिकार सीमा को बढ़ाया। आपकी कीर्ति देश-देश में फैली। इसको मैंने सुना है। हे शाहजी के सुपुत्र शिवराज। आपकी तलवार ने दिल्ली की सेना को परास्त करके संसार में हिंदू राष्ट्र और हिंदुओं की मर्यादा की रक्षा की।


ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी/भूषण

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करैं कंद मूल भोग करैं तीन बेर खातीं ते वै तीन बेर खाती हैं।

भूषन सिथिल अंग भूषन सिथिल अंग बिजन डुलातीं ते वै बिजन डुलाती हैं।
भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास नगन जड़ातीं ते वै नगन जड़ाती हैं॥

कविवर भूषण कहते हैं कि शिवाजी के भय से ऊँचे और विशाल महलों में रहने वाली शत्रुओं की स्त्रियाँ अब भयंकर पर्वतों की गुफाओं में रहती हैं। भाव यह है कि शिवाजी के डर से शत्रु-पक्ष की नारियों ने अपने ऊँचे-ऊँचे भवन छोड़ दिए और जान बचाने के लिए अब वे पर्वतों की गुफाओं में छिपती-फिरती हैं। जो मधुर पदार्थों से बने हुए स्वादिष्ट भोजन किया करती थीं वे ही अब वनों में भटकती हुई कंद-मूल-फल खाकर ही अपने जीवन का निर्वाह करती हैं। जिनके शरीरांग आभूषणों के भार से शिथिल हो जाते थे वही अब भूख के मारे शिथिल अंग वाली होकर भटकती फिर रही हैं। महलों में जिन पर व्यजन अर्थात् पँखे डुलाए जाते थे, वही अब निर्जन वनों में अकेली घूमती फिरती हैं। भूषण कवि कहते हैं कि हे शिवाजी, आपके डर से शत्रु की स्त्रियों की यहाँ तक दुर्दशा हो गई है कि जो पहले आभूषणों मे रत्न जड़वाया करती थीं, वही अब वस्त्र न मिलने के कारण नंगी जाड़े में ठिठुरती रहती हैं।


अकथ अपार भवपंथ के बिलोकी/भूषण

अकथ अपार भवपंथ के बिलोकी स्रम-हरन, करन बीजना से बरम्हाइयै।
यह लोक परलोक सफल करन कोकनद से चरन हियें आनिकै जुड़ाइयै।

अलिकुल-कलित कपोल ध्याय ललित अनंदरूप सरित मों भूषन अन्हाइयै।
पापतरु-भंजन बिघनगढ-गंजन भगत मन-रंजन द्विरदमुख गाइयै।

कवि कहता है कि मैं ब्रह्मरूप गणेशजी का ध्यान करता हूँ जो अपने कान रूपी पंखे के झलने से इस भयंकर अपार संसार रूपी मार्ग में चलने की थकान को दूर करते हैं। इस लोक और परलोक में सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले गणेजी के लालकमल के समान चरणों को मैं अपने हृदय में धारण करता हूँ। भूषण कवि कहते हैं कि जिनके कपोल भौंरों के समूह से युक्त हैं (हाथी का गंड-स्थल मद बहने के कारण भौंरों से घिरा रहता है) जिनका ध्यान रखना सुंदर लगता है, ऐसे गणेशजी के आनंद की नदी में स्नान कीजिए। पाप रूपी पेड़ों को तोड़ने वाले, विघ्न रूपी क़िलों का नाश करने वाले और संसार का मनोरंजन (मन प्रसन्न) करने वाले गणेशजी के गुणों का सदैव गायन करना चाहिए।


उतरि पलँग तें न दियो हैं धरा पै पग/भूषण

उतरि पलँग तें न दियो हैं धरा पै पग तेऊ सगबग निसिदिन चली जाती हैं।
अति अकुलातीं मुरझातीं न छिपातीं गात बात न सोहाती बोले अति अनखाती हैं।

भूषन भनत सिंह साहि के सपूत सिवा तेरी धाक सुने अरि नारी बिललाती हैं।
जोन्ह में न जातीं ते वै धूपै चली जाती पुनि तीन बेर खातीं तेवै तीन बेर खाती हैं॥

कवि भूषण कहते हैं कि जिन शत्रु-पक्ष की नारियों ने कभी पलंग से उतरकर धरती पर पैर तक नहीं रखा था, वे ही नारियाँ अब वीर शिवाजी के भय से रात-दिन अपनी प्राण-रक्षा हेतु सकपकाकर अस्त-व्यस्त रहती हैं। अर्थात् वे रात-दिन दौड़ी चली जाती हैं। शिवाजी के भय से अत्यंत व्याकुल होने के कारण उनके मुख मुरझा गए हैं और वे अपने प्राण बचाने की चिंता में अपने वस्त्रों का भी ध्यान नहीं रख पाती हैं। किसी को भी किसी की बात नहीं सुहाती है। यदि उनसे कोई बोलता है तो वे चिढ़-सी जाती हैं, उस पर झुँझला उठती हैं तथा सदा ही भूखी रहती हैं। भूषण कवि कहते हैं कि शाहजी के सुपुत्र महाराज शिवाजी आपके पराक्रम की गाथाओं को सुनकर शत्रु-पक्ष की स्त्रियाँ बिलबिलाती हैं। जो इतनी कोमल थीं कि चंद्रमा की चाँदनी में भी बाहर नहीं निकलती थीं वे ही अब अपने प्राणों की रक्षा के भय से धूप में दौड़ती हुई चली जाती हैं। उनमें से कोई तो आत्म-हत्या करने के लिए तैयार हैं और अनेक छाती पीट-पीटकर रो रही है।


जढ़त तुरंग चतुरंग साजि सिवराज/भूषण

चढ़त तुरंग चतुरंग साजि सिवराज चढ़त प्रताप दिन-दिन अति अंग में।
भूषन चढ़त मरहट्ठ-चित्त चाउ चारु खग्ग खुली चढ़त है अरिन कै अंग में।

भ्वैसिला के हाथ गढ़-कोट है चढ़त अरि-जोट है चढ़त एक मेरुगिरि-सृंग में।
तुरकान-गन ब्योमजान है चढ़त बिन मान है चढ़त बदरंग अवरंग में॥

भूषण कवि कहते हैं कि जब शिवाजी अपनी चतुरंगिणी सेना को सजाकर अर्थात् अति उत्साह में भरकर घोड़े चढ़ते हैं तब उनके अंग-अंग में प्रतिदिन ही उनका प्रताप बढ़ता जाता है। भूषण कवि कहते हैं कि उनके मरहठी सैनिकों के मन में आगे बढ़ने का उत्साह चढ़ जाता है और उनकी तलवारें शत्रुओं के अंगों में खुलकर या बेरोक-टोक घुस जाती हैं। भौंसला राजा शिवाजी के हाथ में शत्रुओं के क़िले आ जाते हैं और शत्रुओं के समूह के समूह ऊँचे पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ने लगते हैं। युद्ध-क्षेत्र में जो मुग़ल योद्धा मृत्यु को प्राप्त हो गए वे मान रहित होकर आकाशयान पर चढ़ते हैं अर्थात मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनके चले जाने पर औरंगज़ेब का रंग फीका हो जाता है।


बेद राखे बिदित पुरान परसिद्ध राखे/भूषण

बेद राखे बिदित पुरान परसिद्ध राखे राम-नाम राख्यो अति रसना सुघर में।
हिंदुन की चोटी रोटी राखि है सिपाहिन की काँधे में जनेऊ राख्यो मालाराखी गरमें।

मीड़ि राखे मुग़ल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यो कर में।
राजन की हद्द राखी तेगबल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर में॥

भूषण कहते हैं कि महाराज शिवाजी ने अपनी अपार शक्ति के बलबूते पर हिंदू धर्म की रक्षा की। उन्होंने औरंगज़ेब को परास्त कर वेद आदि हिंदू धर्मग्रंथों को नष्ट होने से बचाया और दूसरी ओर वेद-शास्त्रों में निहित ज्ञान का प्रसार किया। इसके अतिरिक्त हिंदू धर्म के सारभूत पुराणों की भी उन्होंने सुरक्षा की और राम-नाम का महत्त्व रखा। उस समय मुसलमानों के द्वारा हिंदुओं के धार्मिक चिह्न मिटाए जा रहे थे। उन्होंने हिंदुओं की चोटी कटने से बचाई और उन्हें आजीविका प्रदान की। उन्होंने हिंदुओं पर जनेऊ धारण करने तथा गले में माला पहनने की रक्षा की। उन्होंने दिल्ली के बादशाह को मरोड़कर रख दिया और सारे शत्रुओं को पीस डाला। साथ ही अपने हाथ में वरदान की शक्ति रखी, अर्थात् जो शरण में आया उसकी रक्षा की। हिंदू राजाओं के राज्य की सीमाओं की रक्षा की और अपने तलवार के बल पर मंदिरों की रक्षा की। इसके साथ ही वीर शिवाजी ने घर-घर में स्वधर्म (हिंदू धर्म) को बनाए रखा।


छूटत कमान बान बंदूकरु कोकबान/भूषण

छूटत कमान बान बंदूकरु कोकबान मुसकिल होत मुरचारनहू की ओट में।
ताही समै सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो दावा बाँधि द्वेषिन पै बीरन लै जोट में।

भूषन भनत तेरी हिम्मति कहाँ लौं कहौं किम्मति इहाँ लगि है जाकी भटझोट में।
ताव दै दै मूछन कगूरन पै पाँव दै दै घाव दै दै अरिमुख कूदे परैं कोट में॥

कवि कहता है कि जिस समय महाराज शिवाजी और औरंगज़ेब की सेना की बीच भयंकर युद्ध हो रहा था और दोनों ओर की सेनाएँ धनुष, बंदूक़ और बाणों की वर्षा कर रही थीं कि मोर्चे की ओट में भी उनसे बचने में कठिनाई हो रही थी। उस समय वीर शिवाजी ने उत्साहपूर्वक ललकारते हुए ओजस्वी वाणी में अपनी सेना को आदेश दिया कि आक्रमण करो तो मरहठा वीरों ने शत्रुओं पर आक्रमण करके हाहाकार मचा दिया और दावानल की भाँति उनका संहार कर दिया। कवि भूषण कहते हैं कि ऐसे पराक्रमी महाराज शिवराज आपके साहस के बल पर मराठा सैनिक मूँछों को ऐंठते हुए क़िलों के कंगूरों पर पैर रखकर और शत्रुओं के मुखों पर घाव दे-देकर परकोटे में कूद पड़ते हैं और क़िले पर अधिकार कर लेते हैं।


निकसत म्यान ते मयूखै, प्रलैभानु कैसी/भूषण

निकसत म्यान ते मयूखै, प्रलैभानु कैसी,
फारै तम-तोम से गयंदन के जाल को।

लागति लपकि कंठ बैरिन के नागिनि सी,
रुद्रहि रिझावै दै दै मुंडन की माल को।

लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहु बली,
कहाँ लौं बखान करौं तेरी करवाल को।

प्रतिभट कटक कटीले केते काटि-काटि,
कालिका सी किलकि कलेऊ देति काल को।


इंद्र जिमि जंभ पर बाड़व ज्यों अंभ पर/भूषण

इंद्र जिमि जंभ पर बाड़व ज्यों अंभ पर,
रावन सदंभ पर रघुकुल राज है।

पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है।

दावा द्रुम-दंड पर चीता मृग-झुंड पर,
भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है।

तेज तम अंस पर कान्ह जिमि कंस पर,
यौं मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज है।

जिस प्रकार देवराज इंद्र का जंभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर और भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।

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