होरी खेलूँगी तोते नाय फाग लोकगीत भदावरी
Hori Khelungi Tote Naay Faag Lokgeet Bhadawari
होरी खेलूँगी श्याम तोते नाय हारूँ
उड़त गुलाल लाल भए बादर, भर गडुआ रंग को डारूँ
होरी में तोय गोरी बनाऊँ लाला, पाग झगा तरी फारूँ
औचक छतियन हाथ चलाए, तोरे हाथ बाँधि गुलाल मारूँ।
रसिया रस लूटो होली में फाग लोकगीत भदावरी
Rasiya Ras Luto Holi mein Faag Lokgeet Bhadawari
रसिया रस लूटो होली में,
राम रंग पिचुकारि, भरो सुरति की झोली में
हरि गुन गाओ, ताल बजाओ, खेलो संग हमजोली में
मन को रंग लो रंग रंगिले कोई चित चंचल चोली में
होरी के ई धूमि मची है, सिहरो भक्तन की टोली में
सैयां बहिंया न गहो फाग लोकगीत भदावरी
Sainya Bahiya na Gaho Faag Lokgeet Bhadawari
सैयां बहिंया न गहो गलि गलियारे हो,
सैयां बहियां न गहो गलि हो॥टेक॥
गलि गलियारे शर्म लगत है,
गलि गलियारे शर्म लगति है,
ले चलि महल अटारे हो,
सैयां बहियां न गहो गलि हो॥१॥
डेल डिलारे कसक लगति है,
डेल डिलारे कसक लगति है,
ले चलि खेत खितारे हो,
सैयां बहियां न गहो गलि हो॥२॥
नदी के भीतर ऊब लगति है,
नदी के भीतर ऊब लगति है,
ले चलि नदी किनारे हो,
सैयां बहियां न गहो गलि हो॥३॥
काल कर्मगति संग चलति है,
काल कर्म गति संग चलति है,
ले चलि गुरु सहारे हो,
सैयां बहियां न गहो गलि हो॥४॥
(उपरोक्त भाग भदावर क्षेत्र में होली के दहन के बाद में गाया जाने वाला गीत है,इस फ़ाग को गाने के तोड में पहले शरीर रूपी सुन्दरी अपने प्रीतम ईश्वर से कहती है,कि मुझे गलियों में भक्ति करने के लिये मत कहो,गलियों में भक्ति करते हुये मुझे शर्म आती है,दूसरी पंक्ति में कहा है कि जंगल बीहड और पत्थरों में जाकर मुझे भक्ति करने को मत कहो,वहां पर मुझे भूख प्यास और शरीर में सर्दी गर्मी बरसात की चोट लगती है,एक विस्तृत क्षेत्र में ले कर चलो,जहां मै मौज से भक्ति कर सकूं,तीसरी पंक्ति में नदी रूपी संगति जो लगातार आगे से आगे चली जा रही हो,उसके साथ मुझे मत जोडो उसके साथ चलने में मुझे दूसरी प्रकार की भक्ति सम्बन्धी बातें उबाती है,मुझे समझ में नहीं आती है,इसलिये किसी एकान्त किनारे पर लेकर चलो,चौथी पंक्ति में कहा है कि सबके साथ नही चलने पर किया भी क्या जा सकता है,समय जो करवाता है,उसे करना पडता है,पीछे जो हम करके आये है,उसका भुगतान तो लेना ही पडेगा,इन सबके बाद जो जीवन की गति मिली है,उसके अनुसार चलना तो पडेगा ही,इसलिये किसी गुरु की शरण में लेकर चलो,जिससे भक्ति करने का उद्देश्य तो गुरु के द्वारा समझने को मिले.)
रचयिता- रामेन्द्र सिंह भदौरिया (ज्योतिषाचार्य) ३७ पंचवटी कालोनी जयपुर ३०२००६
लंगुरिया - १ भदावरी लोकगीत भदावरी
Languriya Languria Lokgeet Bhadawari Lokgeet
करिहां चट्ट पकरि के पट्ट नरे में ले गयो लांगुरिया॥ टेक॥
आगरे की गैल में दो पंडा रांधे खीर,चूल्ही फ़ूंकत मूंछे बरि गयीं फ़ूटि गयी तकदीर॥ करिहां॥
आगरे की गैल में एक लम्बो पेड खजूर,ता ऊपर चढि के देखियो केला मैया कितनी दूरि॥ करिहां॥
आगरे की गैल में एक डरो पेंवदी बेर,जल्दी जल्दी चलो भवन को दरशन को हो रही देर॥ करिहां॥
आगरे की गैल में लांगुर ठाडो रोय,लांगुरिया पूरी भई भोर भयो मति सोय॥ करिहां॥
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| Bhadawari Lokgeet Languriya Faag |

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