भगवतीचरण वर्मा की कविता / Bhagwati Charan Verma Ki Kavita

स्मृतिकण / भगवतीचरण वर्मा


क्या जाग रही होगी तुम भी?

निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये! अपना यह व्यापक अंधकार,

मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;

मेरी पीडाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;

किस आशंका की विसुध आह! इन सपनों को कर गई पार

मैं बेचैनी में तडप रहा; क्या जाग रही होगी तुम भी?

अपने सुख-दुख से पीडित जग, निश्चिंत पडा है शयित-शांत,

मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;

यदि एक साँस बन उड सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य

यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत

पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;

मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,

क्या जाग रही होगी तुम भी?

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें / भगवतीचरण वर्मा



कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें।

जीवन-सरिता की लहर-लहर,

मिटने को बनती यहाँ प्रिये

संयोग क्षणिक, फिर क्या जाने

हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये।

पल-भर तो साथ-साथ बह लें,

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें।

आओ कुछ ले लें औ' दे लें।

हम हैं अजान पथ के राही,

चलना जीवन का सार प्रिये

पर दुःसह है, अति दुःसह है

एकाकीपन का भार प्रिये।

पल-भर हम-तुम मिल हँस-खेलें,

आओ कुछ ले लें औ' दे लें।

हम-तुम अपने में लय कर लें।

उल्लास और सुख की निधियाँ,

बस इतना इनका मोल प्रिये

करुणा की कुछ नन्हीं बूँदें

कुछ मृदुल प्यार के बोल प्रिये।

सौरभ से अपना उर भर लें,

हम तुम अपने में लय कर लें।

हम-तुम जी-भर खुलकर मिल लें।

जग के उपवन की यह मधु-श्री,

सुषमा का सरस वसन्त प्रिये

दो साँसों में बस जाय और

ये साँसें बनें अनन्त प्रिये।

मुरझाना है आओ खिल लें,

हम-तुम जी-भर खुलकर मिल लें।

आज शाम है बहुत उदास / भगवतीचरण वर्मा


आज शाम है बहुत उदास

केवल मैं हूँ अपने पास ।

दूर कहीं पर हास-विलास

दूर कहीं उत्सव-उल्लास

दूर छिटक कर कहीं खो गया

मेरा चिर-संचित विश्वास ।

कुछ भूला सा और भ्रमा सा

केवल मैं हूँ अपने पास

एक धुंध में कुछ सहमी सी

आज शाम है बहुत उदास ।

एकाकीपन का एकांत

कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत ।

थकी-थकी सी मेरी साँसें

पवन घुटन से भरा अशान्त,

ऐसा लगता अवरोधों से

यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त ।

अंधकार में खोया-खोया

एकाकीपन का एकांत

मेरे आगे जो कुछ भी वह

कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत ।

उतर रहा तम का अम्बार

मेरे मन में व्यथा अपार ।

आदि-अन्त की सीमाओं में

काल अवधि का यह विस्तार

क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर?

एक प्रशन मैं हूँ साकार ।

क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना?

मेरे मन में व्यथा अपार

औ समेटता निज में सब कुछ

उतर रहा तम का अम्बार ।

सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,

आज शाम है बहुत उदास ।

जोकि आज था तोड़ रहा वह

बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस

और अनिश्चित कल में ही है

मेरी आस्था, मेरी आस ।

जीवन रेंग रहा है लेकर

सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,

और डूबती हुई अमा में

आज शाम है बहुत उदास ।

तुम सुधि बन-बनकर बार-बार / भगवतीचरण वर्मा




तुम सुधि बन-बनकर बार-बार

क्यों कर जाती हो प्यार मुझे?

फिर विस्मृति बन तन्मयता का

दे जाती हो उपहार मुझे।

मैं करके पीड़ा को विलीन

पीड़ा में स्वयं विलीन हुआ

अब असह बन गया देवि,

तुम्हारी अनुकम्पा का भार मुझे।

माना वह केवल सपना था,

पर कितना सुन्दर सपना था

जब मैं अपना था, और सुमुखि

तुम अपनी थीं, जग अपना था।

जिसको समझा था प्यार, वही

अधिकार बना पागलपन का

अब मिटा रहा प्रतिपल,

तिल-तिल, मेरा निर्मित संसार मुझे।

मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ / भगवतीचरण वर्मा


मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ

अपने प्रकाश की रेखा

तम के तट पर अंकित है

निःसीम नियति का लेखा

देने वाले को अब तक

मैं देख नहीं पाया हूँ,

पर पल भर सुख भी देखा

फिर पल भर दुख भी देखा।

किस का आलोक गगन से

रवि शशि उडुगन बिखराते?

किस अंधकार को लेकर

काले बादल घिर आते?

उस चित्रकार को अब तक

मैं देख नहीं पाया हूँ,

पर देखा है चित्रों को

बन-बनकर मिट-मिट जाते।

फिर उठना, फिर गिर पड़ना

आशा है, वहीं निराशा

क्या आदि-अन्त संसृति का

अभिलाषा ही अभिलाषा?

अज्ञात देश से आना,

अज्ञात देश को जाना,

अज्ञात अरे क्या इतनी

है हम सब की परिभाषा?

पल-भर परिचित वन-उपवन,

परिचित है जग का प्रति कन,

फिर पल में वहीं अपरिचित

हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन।

है क्या रहस्य बनने में?

है कौन सत्य मिटने में?

मेरे प्रकाश दिखला दो

मेरा भूला अपनापन ।

देखो-सोचो-समझो / भगवतीचरण वर्मा


देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ' जानो

इसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो

लेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो,

जीवन की धारा में अपने को बहने दो

तुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो ।

वैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्ध ज्ञानी हो

तुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी हो

लेकिन अचरज इतना, तुम कितने भोले हो

ऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले हो

बन कर मिट जाने की एक तुम कहानी हो ।

पल में रो देते हो, पल में हँस पड़ते हो,

अपने में रमकर तुम अपने से लड़ते हो

पर यह सब तुम करते - इस पर मुझको शक है,

दर्शन, मीमांसा - यह फुरसत की बकझक है,

जमने की कोशिश में रोज़ तुम उखड़ते हो ।

थोड़ी-सी घुटन और थोड़ी रंगीनी में,

चुटकी भर मिरचे में, मुट्ठी भर चीनी में,

ज़िन्दगी तुम्हारी सीमित है, इतना सच है,

इससे जो कुछ ज्यादा, वह सब तो लालच है

दोस्त उम्र कटने दो इस तमाशबीनी में ।

धोखा है प्रेम-बैर, इसको तुम मत ठानो

कडु‌आ या मीठा ,रस तो है छक कर छानो,

चलने का अन्त नहीं, दिशा-ज्ञान कच्चा है

भ्रमने का मारग ही सीधा है, सच्चा है

जब-जब थक कर उलझो, तब-तब लम्बी तानो ।

कल सहसा यह सन्देश मिला / भगवतीचरण वर्मा


कल सहसा यह सन्देश मिला

सूने-से युग के बाद मुझे

कुछ रोकर, कुछ क्रोधित हो कर

तुम कर लेती हो याद मुझे।

गिरने की गति में मिलकर

गतिमय होकर गतिहीन हुआ

एकाकीपन से आया था

अब सूनेपन में लीन हुआ।

यह ममता का वरदान सुमुखि

है अब केवल अपवाद मुझे

मैं तो अपने को भूल रहा,

तुम कर लेती हो याद मुझे।

पुलकित सपनों का क्रय करने

मैं आया अपने प्राणों से

लेकर अपनी कोमलताओं को

मैं टकराया पाषाणों से।

मिट-मिटकर मैंने देखा है

मिट जानेवाला प्यार यहाँ

सुकुमार भावना को अपनी

बन जाते देखा भार यहाँ।

उत्तप्त मरूस्थल बना चुका

विस्मृति का विषम विषाद मुझे

किस आशा से छवि की प्रतिमा!

तुम कर लेती हो याद मुझे?

हँस-हँसकर कब से मसल रहा

हूँ मैं अपने विश्वासों को

पागल बनकर मैं फेंक रहा

हूँ कब से उलटे पाँसों को।

पशुता से तिल-तिल हार रहा

हूँ मानवता का दाँव अरे

निर्दय व्यंगों में बदल रहे

मेरे ये पल अनुराग-भरे।

बन गया एक अस्तित्व अमिट

मिट जाने का अवसाद मुझे

फिर किस अभिलाषा से रूपसि!

तुम कर लेती हो याद मुझे?

यह अपना-अपना भाग्य, मिला

अभिशाप मुझे, वरदान तुम्हें

जग की लघुता का ज्ञान मुझे,

अपनी गुरुता का ज्ञान तुम्हें।

जिस विधि ने था संयोग रचा,

उसने ही रचा वियोग प्रिये

मुझको रोने का रोग मिला,

तुमको हँसने का भोग प्रिये।

सुख की तन्मयता तुम्हें मिली,

पीड़ा का मिला प्रमाद मुझे

फिर एक कसक बनकर अब क्यों

तुम कर लेती हो याद मुझे?

पतझड़ के पीले पत्तों ने / भगवतीचरण वर्मा


पतझड़ के पीले पत्तों ने

प्रिय देखा था मधुमास कभी;

जो कहलाता है आज रुदन,

वह कहलाया था हास कभी;

आँखों के मोती बन-बनकर

जो टूट चुके हैं अभी-अभी

सच कहता हूँ, उन सपनों में

भी था मुझको विश्वास कभी ।

आलोक दिया हँसकर प्रातः

अस्ताचल पर के दिनकर ने;

जल बरसाया था आज अनल

बरसाने वाले अम्बर ने;

जिसको सुनकर भय-शंका से

भावुक जग उठता काँप यहाँ;

सच कहता-हैं कितने रसमय

संगीत रचे मेरे स्वर ने ।

तुम हो जाती हो सजल नयन

लखकर यह पागलपन मेरा;

मैं हँस देता हूँ यह कहकर

"लो टूट चुका बन्धन मेरा!"

ये ज्ञान और भ्रम की बातें-

तुम क्या जानो, मैं क्या जानूँ ?

है एक विवशता से प्रेरित

जीवन सबका, जीवन मेरा !

कितने ही रस से भरे हृदय,

कितने ही उन्मद-मदिर-नयन,

संसृति ने बेसुध यहाँ रचे

कितने ही कोमल आलिंगन;

फिर एक अकेली तुम ही क्यों

मेरे जीवन में भार बनीं ?

जिसने तोड़ा प्रिय उसने ही

था दिया प्रेम का यह बन्धन !

कब तुमने मेरे मानस में

था स्पन्दन का संचार किया ?

कब मैंने प्राण तुम्हारा निज

प्राणों से था अभिसार किया ?

हम-तुमको कोई और यहाँ

ले आया-जाया करता है;

मैं पूछ रहा हूँ आज अरे

किसने कब किससे प्यार किया ?

जिस सागर से मधु निकला है,

विष भी था उसके अन्तर में,

प्राणों की व्याकुल हूक-भरी

कोयल के उस पंचम स्वर में;

जिसको जग मिटना कहता है,

उसमें ही बनने का क्रम है;

तुम क्या जानो कितना वैभव

है मेरे इस उजड़े घर में ?

मेरी आँखों की दो बूँदों

में लहरें उठतीं लहर-लहर;

मेरी सूनी-सी आहों में

अम्बर उठता है मौन सिहर,

निज में लय कर ब्रह्माण्ड निखिल

मैं एकाकी बन चुका यहाँ,

संसृति का युग बन चुका अरे

मेरे वियोग का प्रथम प्रहर !

कल तक जो विवश तुम्हारा था,

वह आज स्वयं हूँ मैं अपना;

सीमा का बन्धन जो कि बना,

मैं तोड़ चुका हूँ वह सपना;

पैरों पर गति के अंगारे,

सर पर जीवन की ज्वाला है;

वह एक हँसी का खेल जिसे

तुम रोकर कह देती 'तपना'।

मैं बढ़ता जाता हूँ प्रतिपल,

गति है नीचे गति है ऊपर;

भ्रमती ही रहती है पृथ्वी,

भ्रमता ही रहता है अम्बर !

इस भ्रम में भ्रमकर ही भ्रम के

जग में मैंने पाया तुमको;

जग नश्वर है, तुम नश्वर हो,

बस मैं हूँ केवल एक अमर !

आज मानव का सुनहला प्रात है / भगवतीचरण वर्मा


आज मानव का सुनहला प्रात है,

आज विस्मृत का मृदुल आघात है;

आज अलसित और मादकता-भरे,

सुखद सपनों से शिथिल यह गात है;

मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो,

आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो ।

आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है,

आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है;

आज शतदल पर मुदित सा झूलता,

कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है;

लाज की सीमा प्रिये, तुम तोड दो

आज मिल लो, मान करना छोड दो ।

आज मधुकर कर रहा मधुपान है,

आज कलिका दे रही रसदान है;

आज बौरों पर विकल बौरी हुई,

कोकिला करती प्रणय का गान है;

यह हृदय की भेंट है, स्वीकार हो

आज यौवन का सुमुखि, अभिसार हो ।

आज नयनों में भरा उत्साह है,

आज उर में एक पुलकित चाह है;

आज श्चासों में उमड़कर बह रहा,

प्रेम का स्वच्छन्द मुक्त प्रवाह है;

डूब जायें देवि, हम-तुम एक हो

आज मनसिज का प्रथम अभिषेक हो ।

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम / भगवतीचरण वर्मा


मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम

ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम,

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,

तेरे चरण चूमता सागर,

श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ

वाणी में है गीता का स्वर।

ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हरे-भरे हैं खेत सुहाने,

फल-फूलों से युत वन-उपवन,

तेरे अंदर भरा हुआ है

खनिजों का कितना व्यापक धन।

मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

प्रेम-दया का इष्ट लिए तू,

सत्य-अहिंसा तेरा संयम,

नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत

तुझमें चिर विकास का है क्रम।

चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से -

मुक्त, सबल उद्दाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

एक हाथ में न्याय-पताका,

ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में,

जग का रूप बदल दे हे माँ,

कोटि-कोटि हम आज साथ में।

गूँज उठे जय-हिंद नाद से -

सकल नगर औ' ग्राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

अज्ञात देश से आना / भगवतीचरण वर्मा


मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ

अपने प्रकाश की रेखा

तम के तट पर अंकित है

निःसीम नियति का लेखा

देने वाले को अब तक

मैं देख नहीं पाया हूँ,

पर पल भर सुख भी देखा

फिर पल भर दुख भी देखा।

किस का आलोक गगन से

रवि शशि उडुगन बिखराते?

किस अंधकार को लेकर

काले बादल घिर आते?

उस चित्रकार को अब तक

मैं देख नहीं पाया हूँ,

पर देखा है चित्रों को

बन-बनकर मिट-मिट जाते।

फिर उठना, फिर गिर पड़ना

आशा है, वहीं निराशा

क्या आदि-अन्त संसृति का

अभिलाषा ही अभिलाषा?

अज्ञात देश से आना,

अज्ञात देश को जाना,

अज्ञात अरे क्या इतनी

है हम सब की परिभाषा?

पल-भर परिचित वन-उपवन,

परिचित है जग का प्रति कन,

फिर पल में वहीं अपरिचित

हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन।

है क्या रहस्य बनने में?

है कौन सत्य मिटने में?

मेरे प्रकाश दिखला दो

मेरा भूला अपनापन।

बसन्तोत्सव / भगवतीचरण वर्मा


मस्ती से भरके जबकि हवा

सौरभ से बरबस उलझ पड़ी

तब उलझ पड़ा मेरा सपना

कुछ नये-नये अरमानों से;

गेंदा फूला जब बागों में

सरसों फूली जब खेतों में

तब फूल उठी सहस उमंग

मेरे मुरझाये प्राणों में;

कलिका के चुम्बन की पुलकन

मुखरित जब अलि के गुंजन में

तब उमड़ पड़ा उन्माद प्रबल

मेरे इन बेसुध गानों में;

ले नई साध ले नया रंग

मेरे आंगन आया बसंत

मैं अनजाने ही आज बना

हूँ अपने ही अनजाने में!

जो बीत गया वह बिभ्रम था,

वह था कुरूप, वह था कठोर,

मत याद दिलाओ उस काल की,

कल में असफलता रोती है!

जब एक कुहासे-सी मेरी

सांसें कुछ भारी-भारी थीं,

दुख की वह धुंधली परछाँही

अब तक आँखों में सोती है।

है आज धूप में नई चमक

मन में है नई उमंग आज

जिससे मालूम यही दुनिया

कुछ नई-नई सी होती है;

है आस नई, अभिलास नई

नवजीवन की रसधार नई

अन्तर को आज भिगोती है!

तुम नई स्फूर्ति इस तन को दो,

तुम नई नई चेतना मन को दो,

तुम नया ज्ञान जीवन को दो,

ऋतुराज तुम्हारा अभिनन्दन!

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