कबीर के दोहे हिन्दी अर्थ सहित Kabir Ke Dohe Hindi arth sahit


कबीर के दोहे




तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ ॥


जीवात्मा कह रही है कि ‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह भगवान पर न्यौछावर होते−होते मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।
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मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।

तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥


मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है। मेरा यश, मेरी धन-संपत्ति, मेरी शारीरिक-मानसिक शक्ति, सब कुछ तुम्हारी ही है। जब मेरा कुछ भी नहीं है तो उसके प्रति ममता कैसी? तेरी दी हुई वस्तुओं को तुम्हें समर्पित करते हुए मेरी क्या हानि है? इसमें मेरा अपना लगता ही क्या है?
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मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीति।

कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीति॥


मन के हारने से हार होती है, मन के जीतने से जीत होती है (मनोबल सदैव ऊँचा रखना चाहिए)। मन के गहन विश्वास से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है।




कबीर के दोहे मृत्यु विषय 



जिस मरनै थै जग डरै, सो मेरे आनंद।


कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥

जिस मरण से संसार डरता है, वह मेरे लिए आनंद है। कब मरूँगा और कब पूर्ण परमानंद स्वरूप ईश्वर का दर्शन करूँगा। देह त्याग के बाद ही ईश्वर का साक्षात्कार होगा। घट का अंतराल हट जाएगा तो अंशी में अंश मिल जाएगा।

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प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ।


प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ॥

परमात्मा के प्रेमी को मैं खोजता घूम रहा हूँ परंतु कोई भी प्रेमी नहीं मिलता है। यदि ईश्वर-प्रेमी को दूसरा ईश्वर-प्रेमी मिल जाता है तो विषय-वासना रूपी विष अमृत में परिणत हो जाता है।

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कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम।


मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण न देई राम॥

यह माया बड़ी पापिन है। यह प्राणियों को परमात्मा से विमुख कर देती है तथा


उनके मुख पर दुर्बुद्धि की कुंडी लगा देती है और राम-नाम का जप नहीं करने देती।
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साँच बराबरि तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है ताकै हृदय आप॥


सच्चाई के बराबर कोई तपस्या नहीं है, झूठ (मिथ्या आचरण) के बराबर कोई पाप कर्म नहीं है। जिसके हृदय में सच्चाई है उसी के हृदय में भगवान निवास करते हैं।
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बेटा जाए क्या हुआ, कहा बजावै थाल।

आवन जावन ह्वै रहा, ज्यौं कीड़ी का नाल॥


बेटा पैदा होने पर हे प्राणी थाली बजाकर इतनी प्रसन्नता क्यों प्रकट करते हो?

जीव तो चौरासी लाख योनियों में वैसे ही आता जाता रहता है जैसे जल से युक्त नाले में कीड़े आते-जाते रहते हैं।








काबा फिर कासी भया, राम भया रहीम।

मोट चून मैदा भया, बैठ कबीर जीम॥


सांप्रदायिक सद्भावना के कारण कबीर के लिए काबा काशी में परिणत हो गया। भेद का मोटा चून या मोठ का चून अभेद का मैदा बन गया, कबीर उसी को जीम रहा है।
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कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।

गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाऊँ॥


कबीर कहते हैं कि मैं तो राम का कुत्ता हूँ, और नाम मेरा मुतिया है। मेरे गले में राम की ज़ंजीर पड़ी हुई है, मैं उधर ही चला जाता हूँ जिधर वह ले जाता है। प्रेम के ऐसे बंधन में मौज-ही-मौज है।
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हम भी पांहन पूजते, होते रन के रोझ।

सतगुरु की कृपा भई, डार्या सिर पैं बोझ॥


कबीर कहते हैं कि यदि सद्गुरु की कृपा न हुई होती तो मैं भी पत्थर की पूजा करता और जैसे जंगल में नील गाय भटकती है, वैसे ही मैं व्यर्थ तीर्थों में भटकता फिरता। सद्गुरु की कृपा से ही मेरे सिर से आडंबरों का बोझ उतर गया।

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चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ।

दोइ पट भीतर आइकै, सालिम बचा न कोई॥


काल की चक्की चलते देख कर कबीर को रुलाई आ जाती है। आकाश और धरती के दो पाटों के बीच कोई भी सुरक्षित नहीं बचा है।
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सब जग सूता नींद भरि, संत न आवै नींद।

काल खड़ा सिर ऊपरै, ज्यौं तौरणि आया बींद॥


सारा संसार नींद में सो रहा है किंतु संत लोग जागृत हैं। उन्हें काल का भय नहीं है, काल यद्यपि सिर के ऊपर खड़ा है किंतु संत को हर्ष है कि तोरण में दूल्हा खड़ा है। वह शीघ्र जीवात्मा रूपी दुल्हन को उसके असली घर लेकर जाएगा।
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Kabir Ke Dohe Hindi arth sahit



साँई मेरा बाँणियाँ, सहजि करै व्यौपार।

बिन डाँडी बिन पालड़ै, तोलै सब संसार॥


परमात्मा व्यापारी है, वह सहज ही व्यापार करता है। वह बिना तराज़ू एवं बिना डाँड़ी पलड़े के ही सारे सांसार को तौलता है। अर्थात् वह समस्त जीवों के कर्मों का माप करके उन्हें तदनुसार गति देता है।

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जौं रोऊँ तौ बल घटै, हँसौं तौ राम रिसाइ।

मनहीं माँहि बिसूरणां, ज्यूँ धुँण काठहिं खाइ॥


यदि आत्मारूपी विरहिणी प्रिय के वियोग में रोती है, तो उसकी शक्ति क्षीण होती है और यदि हँसती है, तो परमात्मा नाराज़ हो जाते हैं। वह मन ही मन दुःख से अभिभूत होकर चिंता करती है और इस तरह की स्थिति में उसका शरीर अंदर−अंदर वैसे ही खोखला होता जाता है, जैसे घुन लकड़ी को अंदर−अंदर खा जाता है।
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बिरह जिलानी मैं जलौं, जलती जलहर जाऊँ।

मो देख्याँ जलहर जलै, संतौ कहा बुझाऊँ॥


विरहिणी कहती है कि विरह में जलती हुई मैं सरोवर (या जल-स्थान)

के पास गई। वहाँ मैंने देखा कि मेरे विरह की आग से जलाशय भी जल रहा है। हे संतो! बताइए मैं अपनी विरह की आग को कहाँ बुझाऊँ?

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सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।


धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥

यदि मैं सातों समुद्रों के जल की स्याही बना लूँ तथा समस्त वन समूहों की लेखनी कर लूँ, तथा सारी पृथ्वी को काग़ज़ कर लूँ, तब भी परमात्मा के गुण को लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि वह परमात्मा अनंत गुणों से युक्त है।

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हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जले ज्यूँ घास।


सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥

हे जीव, यह शरीर नश्वर है। मरणोपरांत हड्डियाँ लकड़ियों की तरह और केश घास (तृणादि) के समान जलते हैं। इस तरह समस्त शरीर को जलता देखकर कबीर उदास हो गया। उसे संसार के प्रति विरक्ति हो गई।

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कबीर यहु घर प्रेम का, ख़ाला का घर नाँहि।


सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माँहि॥

परमात्मा का घर तो प्रेम का है, यह मौसी का घर नहीं है जहाँ मनचाहा प्रवेश मिल जाए। जो साधक अपने सीस को उतार कर अपने हाथ में ले लेता है वही इस घर में प्रवेश पा सकता है।

संबंधित विषय : प्रेम







हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।


बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥

साधना की चरमावस्था में जीवात्मा का अहंभाव नष्ट हो जाता है। अद्वैत की अनुभूति जाग जाने के कारण आत्मा का पृथक्ता बोध समाप्त हो जाता है। अंश आत्मा अंशी परमात्मा में लीन होकर अपना अस्तित्व मिटा देती है।


यदि कोई आत्मा के पृथक् अस्तित्व को खोजना चाहे तो उसके लिए यह असाध्य कार्य होगा।
संबंधित विषय : समुद्र








माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।

आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर॥


कबीर कहते हैं कि प्राणी की न माया मरती है, न मन मरता है, यह शरीर ही बार-बार मरता है। अर्थात् अनेक योनियों में भटकने के बावजूद प्राणी की आशा और तृष्णा नहीं मरती वह हमेशा बनी ही रहती है।
संबंधित विषय : देह और 2 अन्य








माली आवत देखि के, कलियाँ करैं पुकार।

फूली-फूली चुनि गई, कालि हमारी बार॥


मृत्यु रूपी माली को आता देखकर अल्पवय जीव कहता है कि जो पुष्पित थे अर्थात् पूर्ण विकसित हो चुके थे, उन्हें काल चुन ले गया। कल हमारी भी बारी आ जाएगी। अन्य पुष्पों की तरह मुझे भी काल कवलित होना पड़ेगा।

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कलि का बामण मसखरा, ताहि न दीजै दान।

सौ कुटुंब नरकै चला, साथि लिए जजमान॥


कलियुग का ब्राह्मण दिल्लगी-बाज़ है (हँसी मज़ाक करने वाला) उसे दान मत दो। वह अपने यजमान और सैकड़ों कुटुंबियों के साथ नरक जाता है।







पाणी ही तैं पातला, धूवां हीं तैं झींण।


पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीरै कीन्ह॥

जो जल से भी अधिक पतला (सूक्ष्म) है और धुएँ से भी झीना है और जो पवन के वेग से भी अधिक गतिमान है। ऐसे रूप वाले सूक्ष्म उन्मन को कबीर ने अपना मित्र बनाया है।








चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति।

जे जन बिछूटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति॥


रात के समय में अपने प्रिय से बिछुड़ी हुई चकवी (एक प्रकार का पक्षी) प्रातः होने पर अपने प्रिय से मिल गई। किंतु जो लोग राम से विलग हुए हैं, वे न तो दिन में मिल पाते हैं और न रात में।

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नैनाँ अंतरि आव तूँ, ज्यूँ हौं नैन झँपेऊँ।

नाँ हौं देखौं और कूँ, नाँ तुझ देखन देऊँ॥


आत्मारूपी प्रियतमा कह रही है कि हे प्रियतम! तुम मेरे नेत्रों के भीतर आ जाओ। तुम्हारा नेत्रों में आगमन हाते ही, मैं अपने नेत्रों को बंद कर लूँगी या तुम्हें नेत्रों में बंद कर लूँगी। जिससे मैं न तो किसी को देख सकूँ और न तुम्हें किसी को देखने दूँ।

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मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि।

दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछांणि॥


मन को मथुरा (कृष्ण का जन्म स्थान) दिल को द्वारिका (कृष्ण का राज्य स्थान) और देह को ही काशी समझो। दशवाँ द्वार ब्रह्म रंध्र ही देवालय है, उसी में परम ज्योति की पहचान करो।

संबंधित विषय : तंत्र और 1 अन्य








जेहि मारग गये पण्डिता, तेई गई बहीर।

ऊँची घाटी राम की, तेहि चढ़ि रहै कबीर॥


जिस रास्ते से पुरोहित एवं पंडित लोग जाते हैं, उसी रास्ते से भीड़ भी जाती है, किंतु कबीर तो सबसे अलग एवं स्वतंत्र होकर स्वरूपस्थिति रूपी राम की ऊँची घाटी पर चढ़ जाता है।

संबंधित विषय : पंडित और 3 अन्य








ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।

अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥


कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।

ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि॥


जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहिं।

सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥


सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥


बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।

राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥


निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।

बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥


पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।

एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥


हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।

अब घर जालौं तासका, जे चले हमारे साथि॥


संबंधित विषय : ईश्वर और 9 अन्य






जाति न पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।1।


आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।

कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक।2।


माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि।

मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं।3।


कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ।

उड़ि पड़ै जब आँखि मैं, खरी दुहेली होइ।4।


जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय।

या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।5।


संबंधित विषय : आत्म और 2 अन्य


कबीर दोहे हिन्दी 




मुला मुनारै क्या चढ़हि, अला न बहिरा होइ।

जेहिं कारन तू बांग दे, सो दिल ही भीतरि जोइ॥


हे मुल्ला! तू मीनार पर चढ़कर बाँग देता है, अल्लाह बहरा नहीं है। जिसके लिए तू बाँग देता है, उसे अपने दिल के भीतर देख।

संबंधित विषय : उपदेशक








नर-नारी सब नरक है, जब लग देह सकाम।

कहै कबीर ते राम के, जैं सुमिरैं निहकाम॥


जब तक यह शरीर काम भावना से युक्त है तब तक समस्त नर-नारी नरक स्वरूप हैं। किंतु जो काम रहित होकर परमात्मा का स्मरण करते हैं वे परमात्मा के वास्तविक भक्त हैं।

संबंधित विषय : भक्ति








सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।

बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥


सद्गुरु ने मुझ पर प्रसन्न होकर एक रसपूर्ण वार्ता सुनाई जिससे प्रेम रस की वर्षा हुई और मेरे अंग-प्रत्यंग उस रस से भीग गए।

संबंधित विषय : गुरु और 1 अन्य








जो जानहु जिव आपना, करहु जीव को सार।

जियरा ऐसा पाहुना, मिले न दूजी बार॥


यदि जीव को अपना स्वरूप समझते हो, तो उसे पूर्णत: प्रमाणित सर्वोच्च सत्ता समझो और उसका स्वागत करो। जीव मानव शरीर में ऐसा पाहुना है, जो लौटकर पुन: इसमें नहीं आएगा।

संबंधित विषय : पुनर्जन्म








कबीर मरनां तहं भला, जहां आपनां न कोइ।

आमिख भखै जनावरा, नाउं न लेवै कोइ॥


कबीर कहते हैं कि ऐसे स्थान पर मरना चाहिए जहाँ अपना कोई न हो।

जानवर उसका माँस खाकर अपना पेट भर लें और उसका नाम लेने वाला कोई ना हो।








जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।

अंधा−अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥


जिसका गुरु अँधा अर्थात् ज्ञान−हीन है, जिसकी अपनी कोई चिंतन दृष्टि नहीं है और परंपरागत मान्यताओं तथा विचारों की सार्थकता को जाँचने−परखने की क्षमता नहीं है; ऐसे गुरु का अनुयायी तो निपट दृष्टिहीन होता है। उसमें अच्छे-बुरे, हित-अहित को समझने की शक्ति नहीं होती, जबकि हित-अहित की पहचान पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। इस तरह अँधे गुरु के द्वारा ठेला जाता हुआ शिष्य आगे नहीं बढ़ पाता। वे दोनों एक-दूसरे को ठेलते हुए कुएँ मे गिर जाते हैं अर्थात् अज्ञान के गर्त में गिर कर नष्ट हो जाते हैं।

संबंधित विषय : गुरु








प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न दृष्टि बिकाइ।

राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सो ले जाइ॥


प्रेम किसी खेत में उत्पन्न नहीं होता और न वह किसी हाट (बाज़ार) में ही बिकता है। राजा हो अथवा प्रजा, जिस किसी को भी वह रुचिकर लगे वह अपना सिर देकर उसे ले जा सकता है।

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कबीर ऐसा यहु संसार है, जैसा सैंबल फूल।

दिन दस के व्यौहार में, झूठै रंगि न भूलि॥


यह जगत सेमल के पुष्प की तरह क्षण-भंगुर तथा अज्ञानता में डालने वाला है। दस दिन के इस व्यवहार में, हे प्राणी! झूठ-मूठ के आकर्षण में अपने को डालकर स्वयं को मत भूलो।

संबंधित विषय : नश्वर








हरि रस पीया जाँणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार।

मैमंता घूँमत रहै, नाँहीं तन की सार॥


राम के प्रेम का रस पान करने का नशा नहीं उतरता। यही राम-रस पीने वाले की पहचान भी है। प्रेम-रस से मस्त होकर भक्त मतवाले की तरह इधर-उधर घूमने लगता है। उसे अपने शरीर की सुधि भी नहीं रहती। भक्ति-भाव में डूबा हुआ व्यक्ति, सांसारिक व्यवहार की परवाह नहीं करता और उसकी दृष्टि में देह-धर्म नगण्य हो जाता है।

संबंधित विषय : ईश्वर और 1 अन्य








अंषड़ियाँ झाँई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि॥


प्रियतम का रास्ता देखते-देखते आत्मा रूपी विरहिणी की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा है। उसकी दृष्टि मंद पड़ गई है। प्रिय राम की पुकार लगाते-लगाते उसकी जीभ में छाले पड़ गए हैं।

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Kabir Dohe with meaning 




सतगुर की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।

लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावण हार॥


ज्ञान के आलोक से संपन्न सद्गुरु की महिमा असीमित है। उन्होंने मेरा जो उपकार किया है वह भी असीम है। उसने मेरे अपार शक्ति संपन्न ज्ञान-चक्षु का उद्घाटन कर दिया जिससे मैं परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सका। ईश्वरीय आलोक को दृश्य बनाने का श्रेय महान गुरु को ही है।

संबंधित विषय : गुरु और 1 अन्य








परनारी पर सुंदरी, बिरला बंचै कोइ।

खातां मीठी खाँड़ सी, अंति कालि विष होइ॥


पराई स्त्री तथा पराई सुंदरियों से कोई बिरला ही बच पाता है। यह खाते (उपभोग करते) समय खाँड़ के समान मीठी (आनंददायी) अवश्य लगती है किंतु अंततः वह विष जैसी हो जाती है।

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कबीर यहु जग अंधला, जैसी अंधी गाइ।

बछा था सो मरि गया, ऊभी चांम चटाइ॥


यह संसार अँधा है। यह ऐसी अँधी गाय की तरह है, जिसका बछड़ा तो मर गया किंतु वह खड़ी-खड़ी उसके चमड़े को चाट रही है। सारे प्राणी उन्हीं वस्तुओं के प्रति राग रखते हैं जो मृत या मरणशील हैं। मोहवश जीव असत्य की ओर ही आकर्षित होता है।

संबंधित विषय : गाय और 1 अन्य








हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।

हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध॥


जो सर्व दुराचरणों को त्यागकर सदाचरणपूर्वक गृहस्थी मर्यादानुसार चलता है वह मनुष्य है। जो गृहस्थी से हटकर त्याग-वैराग्यपूर्वक चलता है, वह साधु है। और जो उक्त दोनों से परे होकर रमता है, उसका अनुभव दूसरे के लिए दुर्बोध है, वह सर्वोच्च है।







पाणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति।


एक दिनाँ छिप जाँहिगे, तारे ज्यूं परभाति॥

यह मानव जाति तो पानी के बुलबुले के समान है। यह एक दिन उसी प्रकार छिप (नष्ट) जाएगी, जैसे ऊषा-काल में आकाश में तारे छिप जाते हैं।


संबंधित विषय : नश्वर







खीर रूप हरि नाँव है, नीर आन व्यौहार।


हंस रूप कोइ साध है, तत का जाणहार॥

स्वयं भगवान क्षीर रूप हैं, जगत के अन्य व्यवहार जल की तरह हैं। कोई विरला साधु हंस रूप है जो तत्त्व का जानने वाला है। जल को छोड़कर क्षीर (दूध) की ओर उन्मुख भक्त जन ही होते हैं, क्योंकि नीर-क्षीर विवेक उन्हीं में होता है।








तीन लोक भौ पींजरा, पाप-पुण्य भौ जाल।

सकल जीव सावज भये, एक अहेरी काल॥


सत, रज और तम ये तीनों गुण पिंजड़े बन गए, पाप तथा पुण्य जाल बन गए और सब जीव इनमें फंसने वाले शिकार बन गए। एक अज्ञान-काल-शिकारी ने सबको फंसाकर मारा।

संबंधित विषय : आत्मा और 3 अन्य








पात झरंता यों कहै, सुनि तरवर बनराइ।

अब के बिछुड़े ना मिलैं, कहुँ दूर पड़ैंगे जाइ॥


पेड़ से गिरता हुआ पत्ता कहता है कि बनराजि के वृक्ष अबकी

बार बिछुड़कर फिर नहीं मिलेंगे, गिरकर कहीं दूर हो जाएँगे। जीवात्मा जहाँ जन्म लेती है दुबारा वहाँ उसका जन्म नहीं होता।








बाग़ों ना जा रे ना जा, तेरी काया में गुलज़ार।

सहस-कँवल पर बैठ के, तू देखे रूप अपार॥


अरे, बाग़ों में क्या मारा-मारा फिर रहा है। तेरी अपनी काया (अस्तित्व) में गुलज़ार है। हज़ार पँखुड़ियों वाले कमल पर बैठकर तू ईश्वर का अपरंपार रूप देख सकता है।

संबंधित विषय : ईश्वर और 1 अन्य








जाके मुँह माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।

पुहुप बास तैं पातरा, ऐसा तत्त अनूप॥


जिसके मुख और मस्तक नहीं है, न रूप है न अरूप। वह न तो रूपवान है

और न रूपहीन है, पुष्प की सुगंध से भी सूक्ष्म वह अनुपम तत्त्व है।








अंतरि कँवल प्रकासिया, ब्रह्म वास तहाँ होइ।

मन भँवरा तहाँ लुबधिया, जाँणौंगा जन कोइ॥


कबीर कहते हैं कि हृदय के भीतर कमल प्रफुल्लित हो रहा है। उसमें से ब्रह्म की सुगंध आ रही या वहाँ ब्रह्म का निवास है। मेरा मन रूपी भ्रमर उसी में लुब्ध हो गया। इस रहस्य को कोई ईश्वर भक्त ही समझ सकता है। किसी अन्य व्यक्ति के समझ में नहीं आएगा।

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कबीर का घर शिखर पर, जहाँ सिलहली गैल।

पाँव न टिके पिपीलका, तहाँ खलकन लादै बैल॥


जीव की शाश्वत स्थिति उसके अपने सर्वोच्च स्वरूप चेतन में है। उस तक पहुंचने का रास्ता फिसलन से भरा है। जहां चींटी के पैर नहीं टिकते, वहां संसार के लोग बैल पर सामान लादकर व्यापार करना चाहते हैं।

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पायन पुहुमी नापते, दरिया करते फाल।

हाथन पर्वत तौलते, तेहि धरि खायो काल॥


जो ओंधे पैरों से पूरी पृथ्वी नाप लेते थे, समुद्र को एक ही छलांग में कूद जाते थे और अपने हाथों से पर्वत उठा लेते थे, उन्हें भी मौत ने धर दबोचा।

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जो जन भीजै रामरस, बिगसित कबहुँ न रुख।

अनुभव भाव न दरसे, ते नर सुख न दुख॥


जो साधक आत्मचिंतन में सदैव डूबे रहते हैं, वे न सांसारिक उपलब्धियों में हर्षित होते हैं और न उनके चले जाने से शोकित होते हैं। सदैव स्वरूपस्थिति के अनुभव में लीन होने से उन्हें सांसारिक भाव-तरंगें नही प्रभावित कर पातीं। अतएव वे सांसारिक वस्तुओं के मिलने-बिछुड़न में न सुखी होते हैं और न दुखी होते हैं।

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पारस रूपी जीव है, लोह रूप संसार।

पारस ते पारस भया, परख भया टकसार॥


जीव पारसरूप है तथा संसार लोहरूप है। अर्थात जीव चेतन है और संसार जड़ है। जैसे पारस से छू जाने पर लोहा सोना हो जाता है, वैसे चेतन के संबंध से जड़ शरीर चेतनवत हो जाता है। पारस के स्पर्श से लोहा केवल सोना होता है, पारस नहीं, परंतु पारखी सद्गुरु के संसर्ग से मनुष्य पारखी हो जाता है। यही पारस से पारस होना है। और सत्यासत्य की परख सत्संग में होती है।

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जाके चलते रौंदे परा, धरती होय बेहाल।

सो सावत घामें जरे, पण्डित करहू विचार॥


हे पंडितों! विचार करो, जिनके चलने के कारण पद-मर्दन से जमीन रगड़ जाती थी और धरती के जीव परेशान हो जाते थे, वे राजे-महाराजे एवं योद्धागण युद्धस्थल में अधमरे पड़े धूप में जलते हैं।

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Kabir Dohe Hindi Mein




राम नाम जिन चीन्हिया, झीना पिंजर तासु।

नैन न आवै नींदरी, अंग न जामें माँसु॥


जिसका नाम राम है उस आत्मतत्व की जिन्होंने परख की, उसका शरीर दुर्बल होता है, उसके नेत्रों में नींद नहीं आती तथा उसके अंगों में मांस नहीं बढ़ता।

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हाड़ जरै जस लाकड़ी, बार जरै जस घास।

कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरै कपास॥


मृत शरीर का दाह करने पर उसकी हड्डी लकड़ी के समान जलती है और बाल घास के समान जलते हैं, परंतु परोक्ष में राम मानकर उसकी उपासना एवं विरह-वेदना में जीव उसी प्रकार भीतर-भीतर जलता रहा जैसे कोठी में कपास जल जाए और बाहर पता न चले।

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मूवा है मरि जाहुगे, बिन शिर थोथी भाल।

परेहु करायल बृक्ष तर, आज मरहु की काल॥


पहले के लोग मर चुके हैं। तुम भी अविवेकरूपी बिना धार के भोथरे भाले के प्रहारों से एक दिन मर जाओगे। क्षणभंगुर संसार रूपी बिना पत्ते एवं बिना छाया के कंटीले झाड़ीदार करील पेड़ के नीचे पड़े हो, आज मरो या कल।

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आधी साखी सिर खड़ी, जो निरूवारी जाय।

क्या पंडित की पोथिया, जो राति दिवस मिलि गाय॥


विचार एवं निर्णय करके आचरण में लायी गई बोधप्रद आधी साखी भी पूर्ण कल्याणकारी हो सकती है। निर्णय-रहित पंडित की बड़ी-बड़ी पोथियों को रात-दिन गाने से क्या लाभ जिनमें स्वरूप का सच्चा बोध नहीं है।

टैग्ज़: पंडित और 1 अन्य








मूवा है मरि जाहुगे, मुये कि बाजी ढोल।

सपन सनेही जग भया, सहिदानी रहिगौ बोल॥


पहले के लोग मर चुके हैं। तुम भी मर जाओगे। मुये चाम का ही तो ढोल बजता है। संसार के लोग सपने में मिले हुए प्राणी-पदार्थों के मोही बने हैं। एक दिन यह सपना टूट जाता है। मर जाने के बाद लोगों में उसकी चर्चा ही कुछ दिनों तक पहचान रह जाती है।

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असुन्न तखत अड़ि आसना, पिण्ड झरोखे नूर।

जाके दिल में हौं बसा, सैना लिये हजूर॥


हे जीव! जिसने शरीर के इन्द्रिय-झरोखों से अपना ज्ञान-प्रकाश फैला रखा है, वह सत्य चेतनस्वरूप ही तुम्हारी अविचल स्थिति-दशा है। ज्ञान-प्रकाश की सेना लेकर 'मैं' के रूप में सभी दिलों में वही उपस्थिति है।

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एक कहौं तो है नहीं, दोय कहौं तो गारि।

है जैसा रहै तैसा, कहहिं कबीर बिचारि॥


यदि मैं कहूं कि तत्व एक है तो वैसा है ही नहीं, परंतु यदि कहूं कि जीव का आश्रय-स्थल कोई दूसरा है तो यह भी अनुचित बात है। इसलिए कबीर साहेब विचारपूर्वक कहते हैं कि जैसी वास्तविकता है वैसी दशा में ही स्थित होना चाहिए।







मसि कागद छूवों नहीं, कलम गहो नहिं हाथ।


चारिउ युग का महातम, कबीर मुखहि जनाई बात॥

मैं स्याही और कागज नहीं छूता और न कलम हाथ में पकड़ता हूँ, चारों युगों में जिसकी महत्ता है, मैं उसकी बातें मुख से ही बता देता हूँ।








हंसा मोति बिकानिया, कंचन थार भराय।

जो जाको मरम न जाने, सो ताको काह कराय॥


जैसे हंस मोती चुगने के प्रलोभन में पड़कर तथा बधिक के जाल में फंसकर बाज़ार में बिक जाए। वैसे चेतन-मानव मुक्ति के प्रलोभन में पड़कर तथा थाली में स्वर्ण-मोहरें भरकर गुरुओं को अर्पित करता है और उनके जाल में फंसकर संसार-बाज़ार में बिक जाता है, किंतु जो भ्रमिक एवं अधकचरे गुरु स्वयं मुक्ति का रहस्य नहीं जानते हैं, शिष्यों को क्या रास्ता बता सकते हैं।

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बिन देखे वह देश की, बात कहै सो कूर।

आपुहि खारी खात है, बेंचत फिरै कपूर॥


जीवन्मुक्ति एवं स्वरूपस्थिति का अनुभव किए बिना जो उसका अधिकारपूर्वक न करते हैं, वे कायर एवं मूर्ख हैं। वे स्वयं तो विषय-भोगरूपी नमक खाते हैं और दूसरे को श्रेष्ठ ज्ञानरूपी कपूर बांटते फिरते हैं।

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बिनु डाँड़े जग डाँड़िया, सोरठ परिया डाँड़।

बाटनि हारे लोभिया, गुर ते मीठी खाँड़॥


संसार के लोगों को किसी ने दण्डित नहीं किया,किंतु ये अपने अज्ञानवश स्वयं ही दण्डित हुए। इनका मानव-जीवनरूपी जुआ व्यर्थ गया। ये सुख के लोभी अपने कल्याण की इच्छा का दांव हार गए। गुड़ से शकर मीठा होता है, परंतु ये गुड़ को शकर न बना सके अर्थात जीवन को तपाकर आध्यात्मिक लाभ न ले सके।

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गोरख रसिया योग के, मुये न जारी देह।

माँस गली माटी मिली, कोरी माँजी देह॥


श्री गोरखनाथ जी योगाभ्यास के बड़े प्रेमी थे। उन्होंने अपने शरीर को योगाभ्यास में इसलिए तपाया कि यह अमर हो जाए। फलत: उनके शरीर का मांस गलकर मिट्टी में मिल गया। अभिप्राय है कि उन्होंने योगाभ्यास से मांस को गला डाला और उनकी देह की हड्डियां मंजे हुए बरतन के समान चमकने लगीं।

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अनुवाद





बिरह की ओदी लाकड़ी, सपचै औ धुँधवाय।

दुख ते तबहीं बाँचिहो, जब सकलो जरि जाय॥


जैसे पानी से भीगी गीली लकड़ी को जलाने पर वह धू-धू कर सुलगती है, ठीक से जलती नहीं, उसका धू-धू कर सुलगना तभी समाप्त होता है जब वह पूर्णतया जल जाती है, वैसे जो व्यक्ति अपने सुख एवं लक्ष्य को अपने से अलग मानकर उसके वियोग की पीड़ा का अनुभव करता है वह मन-ही-मन निरंतर सुलगता और रोता रहता है। इस दुख से वह तभी बचता है जब उसके मन की सारी वासनाएं एवं कल्पनाएं जल जाती हैं।

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घुँघुँची भर के बोइये, उपजा पसेरी आठ।

डेरा परा काल का, साँझ सकारे जात॥


पुरुष द्वारा नारी-क्षेत्र में थोड़ी मात्रा में सजीव वीर्य सिंचन से पांच विषय एवं तीन गुण से संबंधित मानो आठ पसेरी एवं मन भर का शरीर पैदा हो जाता है। और शरीर के पैदा होते ही मानो उसमें काल का पड़ाव पड़ जाता है। रात और दिन बीतते हैं और शरीर क्षीण होता है। परंतु यदि कोई पांच विषय एवं तीन गुणयुक्त इस आठ पसेरी के निर्जीव शरीर को गाड़ दे और इससे चाहे कि एक देहधारी का पिंड पैदा हो जाए तो असंभव है। जीवन-निर्माण का एक प्राकृतिक-क्रम है। सब कुछ या कुछ भी अचानक नहीं हो जाता है। परंतु लोग मेरी कारण-कार्य-व्यवस्था के विचारों को नहीं समझते, अत: वे भौतिकवादी दृष्टि अपनाकर अंत में अपने आप को खोकर चलते हैं।

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गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहि मस्कला देय।

शब्द छोलना छोलिके, चित दर्पण करि लेय॥


जिस प्रकार सिकलीगर मसकला देकर धातुओं को उज्ज्वल कर देता है, उसी प्रकार ऐसे सद्गुरु की शरण लो जो तुम्हारे मन पर विवेक का मसकला देकर, निर्णय शब्दरूपी छोलने से छीलकर और मल, विक्षेप तथा आवरणरूपी मूर्चा को झाड़कर तुम्हारे चित्त को दर्पणवत स्वच्छ बना दे।

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Kabir Ke Dohe Prem




प्रेम पाट का चोलना, पहिर कबीरु नाच।

पानिप दीन्हों तासु को, जो तन मन बोले साँच॥


हे मनुष्य! प्रेमरूपी वस्त्र का अंगरखा पहनकर नाचो, अर्थात अपने जीवन के सारे व्यवहार प्रेमपूर्वक करो। यह विश्व-प्रकृति उसी के जीवन में चमक देती है और विवेकवान मानव भी उसी की मर्यादा करते हैं जिसके तन में, मन में और वचन में एक सत्य ही समाया हो।

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हंसा सरवर तजि चले, देही परिगौ सून।

कहहिं कबीर पुकारि के, तेहि दर तेहि थून॥


जब जीव शरीर छोड़कर चला जाता है, तब यह शरीर चेतना से शून्य होकर मुरदा हो जाता है। सद्गुरु जोर देकर कहते हैं कि कर्माध्यासी जीव पुन: उसी गर्भ में प्रवेश करता है, जहाँ उसका शरीर निर्मित होता है।

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धौंकी डाही लाकड़ी, वो भी करे पुकार।

अब जो जाय लोहार घर, डाहै दूजी बार॥


जली हुई धौं की लकड़ी कोयला बनकर चिल्लाती है कि यदि मैं लोहार के घर गई तो वह मुझे पुन: जलाएगा। अर्थात जन्म-जन्मान्तरों एवं गर्भवास से पीड़ित मुमुक्षु जीव सद्गुरु की शरण में पुकरता है कि हे सद्गुरु,अब मुझे संसार-सागर से बचा लो, अन्यथा यदि अज्ञानरूपी लोहार के हाथों में पड़ गया तो मैं उसके द्वारा पुन: संसार के तापों में जलाया जाऊंगा।

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पाँच तत्व का पूतरा, युक्ति रची मैं कीव।

मैं तोहि पूछौं पंडिता, शब्द बड़ा की जीव॥


पांच तत्वों के इस पुतले शरीर को मैंने ही रचकर तैयार किया है। हे पंडितों! मैं तुमसे पूछता हूँ कि शब्द बड़ा होता है या जीव?

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जो घर हैगा सर्प का, सो घर साध न होय।

सकल संपदा ले गये, विष भरि लागा सोय॥


जो सांप का घर है, वह साधु का घर नहीं है। अर्थात विषयासक्ति और देहादि का अहंकार तो जीव की सारी आध्यात्मिक शक्ति नष्ट कर देते हैं और सांसारिकता का विष लेकर उसमें चिपक जाते हैं।

टैग्ज़: भक्ति और 1 अन्य








पाँच तत्त्व के भीतरे, गुप्त बस्तु अस्थान।

बिरला मर्म कोई पाइ हैं, गुरु के शब्द प्रमान॥


पांच तत्वों से बने इस शरीर के भीतर-स्थान में एक अदृश्य ज्ञानस्वरूप चेतन जीव निवास करता है। परंतु सद्गुरु के निर्णय वचनों के प्रमाणों से कोई बिरला उसका भेद ठीक से जान सकता है।

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दोहरा तो नौ तन भया, पदहि न चीन्हैं कोय।

जिन्ह यह शब्द विवेकिया, छत्र धनी है सोय॥


जीव अपने शुद्ध चेतनस्वरूप को भूलकर दूसरी एवं विजाति दृश्य-माया में मोह करता है, इसलिए उसे भव-सागर में भटकते हुए नए-नए शरीरों की प्राप्ति होती है। क्योंकि विजाति जड़-दृश्यों से हटकर कोई अपने चेतनस्वरूप को तो पहचानता नहीं। जो व्यक्ति उक्त बातों पर विवेक कर तथा जड़-दृश्यों का राग छोड़कर अपने शुद्ध चेतनस्वरूप में स्थित होता है, वह स्वरूपस्थिति के उच्चासन पर आरूढ़ होकर स्वतंत्र, सुखी एवं सम्राट हो जाता है।

टैग्ज़: नीति और 1 अन्य








गही टेक छोड़ै नहीं, जीभ चोंच जरि जाय।

ऐसो तप्त अंगार है, ताहि चकोर चबाय॥


चकोर पक्षी चंद्रमा का प्रेमी होता है वह उसके प्रेमपक्ष को कभी नहीं छोड़ता। वह तप्त अंगार को भी चंद्रमा का अंश मानकर निगल जाता है चाहे उसकी जीभ एवं चोंच भले जल जाएं। लगाव ऐसी वस्तु है कि वह जलता भी नहीं।

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Kabir doha bhakti



बिरह बाण जेहि लागिया, औषध लगे न ताहि।

सुसुकि-सुसुकि मरि-मरि जिवै, उठे कराहि-कराहि॥


जिसको विरह का बाण लग गया है, अर्थात जो समझता है कि मेरा लक्ष्य मुझसे अलग है, उसको स्वरूप-विचार की औषधि नहीं लगती। वह तो अपने लक्ष्य को पाने के लिए सुबक-सुबककर रोता है, मूर्छित होता है, जागता है और अपने प्रियतम के वियोग की याद में बारम्बार कराह उठता है।

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मानुष तेरा गुण बड़ा, माँसु न आवे काज।

हाड़ न होते आभरण, त्वचा न बाजन बाज॥


हे मनुष्य! तेरे दयादि सद्गुण ही श्रेष्ठ हैं, अन्यथा तेरा शरीर व्यर्थ है। न तेरा मांस किसी के काम में आता है, न तेरी हड्डी के आभूषण बनते हैं और न तेरे चाम के बाजे बनकर बजते हैं।







लोभे जन्म गँमाइया, पापै खाया पून।


साधी सो आधी कहैं, ता पर मेरा ख़ून॥

लोग अपना जीवन लोभ में खो देते हैं। लोभ तो पाप की जड़ है। वह पुण्य को खा जाता है। अधकचरे गुरु साधक-जीव से परमार्थ की आधी-अधूरी बातें करते हैं। उन पर मुझे गुस्सा आता है।








शब्द हमारा तू शब्द का, सुनि मति जाहु सरक।

जो चाहो निज तत्त्व को, तो शब्दहि लेह परख॥


हे मानव! जो हमारे निर्णय वचन हैं, तुम उनके अधिकारी हो, परंतु उन्हें सुनकर खिसक न जाओ, प्रत्युत उनका आचरण करो। तुम यदि अपने मूल स्वरूप का बोध चाहते हो, तो सार-असार शब्दों की परख करो।

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शब्द हमारा आदि का, पल-पल करहु याद।

अन्त फलेगी माँहली, ऊपर की सब बाद॥


हमारे निर्णय-शब्द मूल चेतनस्वरूप के परिचायक हैं, अत: ऐसे शब्दों का निरंतर मनन-चिंतन करो। इसके अंतिम फल में स्वरूपस्थिति रूपी महल के निवासी बन जाओगे, ऊपर की माया तो सब व्यर्थ है।

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पानि पियावत क्या फिरो, घर-घर सायर बारि।

तृषावन्त जो होयगा, पीवगा झख मारि॥


उपदेश क्या देते फिरते हो! सबके मन में ज्ञान का सागर भरा है, अर्थात् सबको अहंकार है कि हम ज्ञानी हैं। जो व्यक्ति सत्योपदेश का प्यासा होगा, वह अहंभाव छोड़कर स्वयं ग्रहण करेगा।







जो जानहु जग जीवना, जो जानहु सो जीव।


पानि पचावहु आपना, तो पानी माँगि न पीव॥

यदि जगत में जीने की कला जानते हो और उस जीव को भी जानते हो जो तुम्हारा स्वरूप है, तो आज तक की ग्रहण की हुई सारी वासनाओं को नष्ट कर दो तथा आगे किसी प्रकार वासना संसार से न ग्रहण करो।








जाके मुनिवर तप करें, वेद थके गुण गाय।

सोई देउँ सिखापना, कोई नहीं पतियाय॥


जिस स्वरूपज्ञान, स्वरूपस्थिति एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ मुनिजनों ने तप किया है, तथा जिसके अनंत गुण गाने में वेद असमर्थ हो जाते हैं, मैं उसी की शिक्षा देता हूं, परंतु कोई विश्वास नहीं करता।







ज्यों मोदाद समसान शिल, सबै रूप समसान।


कहहिं कबीर वह सावज की गति, तबकी देखि भुकान॥

जैसे स्वच्छ कांच के समान स्फटिक पत्थर होता है जिसे प्राप्त रंग के अनुसार प्रतीत होने के नाते समसान शिला भी कहते हैं, वह सभी रूपों एवं रंगों को ग्रहण करता है, वैसे मनुष्य का मन है। यह प्राप्त वृत्तियों के रंग में रंगकर उस-उस के अनुसार बन जाता है। सद्गुरु कहते हैं कि जैसे कुत्ता शीशमहल में अपने प्रतिबिंब देखकर और उन्हें अपना प्रतिद्वंदी मानकर उन्हें परास्त करने के लिए भूंक-भूंककर मरता है, वैसे मनुष्य भ्रमवश अपनी ही भावनाओं को सबमें प्रतिबिंबित करके राग-द्वेष में भूंक-भूंककर मरता है।



नीति पर कबीर के दोहे 

kabir doha niti 




कलि खोटा जग आँधरा, शब्द न माने कोय।

जाहि कहौं हित आपना, सो उठि बैरी होय॥


कलह एवं झगड़ा बुरी बात है। जगत के लोग विवेकहीन हैं, वे निर्णय-वचन नहीं मानते। मैं जिसको सजाति मानव-बंधु मानकर उसके ही कल्याण के लिए उसे सही रास्ता बताता हूँ, वही उठकर शत्रु बनने का प्रयास करता है।

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मूढ़ कर्मिया मानवा, नख शिख पाखर आहि।

बाहनहारा क्या करै, जो बान न लागै ताहि॥


मूढ़ता का आचरण करने वाले मनुष्य के तो एड़ी से चोटी तक मूर्खता की झूल पड़ी है, फिर ज्ञानोपदेशरूपी बाण चलाने वाले उपदेशक संत-गुरु क्या करें जबकि मूढ़ श्रोता को एक बाण भी नहीं लगता।







पर्वत ऊपर हर बहै, घोड़ा चढ़ि बसै गाँव।


बिना फूल भौंरा रस चाहै, कहु बिरवा को नाँव॥

अपनी आत्मा को परम तत्व न समझकर शब्द-जालों में पड़े हुए जो अलग परमात्मा या मोक्ष खोजते हैं, वे मानो पत्थर पर हल चलाना चाहते हैं, घोड़े पर चढ़कर उस पर गांव बसाना चाहता हैं और उनका मन-भौंरा बिना फूल के ही रस चाहता है। कहो भला, कल्पना जो छोड़कर उस वृक्ष का नाम क्या हो सकता है!








ज्यों दर्पण प्रतिबिंब देखिये,आपु दुहुँनमा सोय।

यह तत्व से वह तत्व है, याही से वह होय॥


जैसे मनुष्य दर्पण में अपने शरीर का प्रतिबिंब देखता है, तो बिम्ब शरीर एवं प्रतिबिंब छाया-दोनों में उसी की ही सत्ता रहती है। बिम्ब तत्व से ही प्रतिबिम्ब-तत्व बनता है, दर्पण में इस शरीर की ही छाया पड़ती है, वैसे जिस प्रकार हमारी मान्यता होती है, उसी प्रकार हमारी भावना बनती है।




नीति पर कबीर के दोहे 



ह्रदया भीतर आरसी, मुख देखा नहिं जाय।


मुख तो तबहीं देखिहो, जब दिल की दुबिधा जाय॥

हर मनुष्य के ह्रदय में विवेक का दर्पण है, परंतु वह उसमें अपना वास्तविक चेहरा नहीं देख पाता। वह अपने आप को उसमें तभी देखेगा जब उसके मन का दो-तरफापन मिट जाएगा।


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देश विदेश हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल।


जाको ढूँढ़त हौं फिरा, ताका परा दुकाल॥

मैं देश-विदेश में घूमा तो पाया कि सर्वत्र मन की कल्पनाओं का सुराज है। मैं जिस सत्य के पारखी को खोजता फिरता हूँ, उसका अभाव है।








हीरा परा बजार में, रहा छार लपटाय।

केतेहिं मूरख पचि मुये, कोइ पारखि लिया उठाय॥


हीरा बाजार में पड़ा है और उस पर धूल लिपट गई है। कितने मूर्ख मनुष्य उसकी खोज में दुखी होकर उसके आस-पास से आते-जाते हैं और नहीं पहचान पाते। परंतु जो उसका पारखी है, वह उसे पहचानकर उठा लेता है। अर्थात सत्य का हीरा हम लोगों के बीच में ही है, परंतु उसे सब नहीं परख पाते, कोई पारखी परखकर ग्रहण करता है।







साखी कहै गहै नहीं, चाल चली नहिं जाय।


सलिल धार नदिया बहै, पाँव कहाँ ठहराय॥

लोग साखी-शब्द या ज्ञान के वचन कहते हैं अथवा मैं साक्षी स्वरूप चेतन हूँ, यह कहते हैं, परंतु इनके भाव हृदय में ग्रहण नहीं करते और इन भावों के अनुसार आचरण नहीं करते। नदी में पानी की जोरदार धारा बहती है, फिर वहां पैर कहां ठहरे, अर्थात अन्त:करण में वासनाओं का जोर है फिर उसमें


धैर्य कहाँ रहे।







लोगों केरि अथाइया, मति कोइ पैठो धाय॥


एकै खेत चरत है, बाघ गधेहरा गाय॥

जहां निर्णय नहीं है ऐसी भीड़ में किसी सत्यइच्छुक जिज्ञासु को दौड़कर नहीं घुसना चाहिए। वहां तो एक ही खेत में बाघ, गधा और गाय एक साथ चरते हैं। अर्थात वहां सब धान साढ़े बाइस पसेरी है।








चलते-चलते पगु थका, नगर रहा नौ कोस।

बीचहि में डेरा परा, कहहु कौन को दोष॥


मानो कोई यात्री हो। वह सुबह से चल रहा हो। चलते-चलते उसके पैर थक गए हों, अभी उसका मूल निवास स्थान नौ कोस की दूरी पर हो, इतने में शाम आ गई हो। इसलिए बीच में ही उसका पड़ाव पड़ गया हो, तो कहो इसमें किसका दोष है! वस्तुत: चलने वाले का दोष है जो सही रास्ते से न चलकर भटक गया है। भटकने वाले का रास्ता लंबा हो ही जाता है।

इसी प्रकार कर्म, उपासना, ज्ञान सभी मार्गों में चलते-चलते मनुष्य का जीवन थक जाता है और वह बूढ़ा हो जाता है, परंतु आत्मस्थिति एवं स्वरूपस्थिति, चतुष्टय अंत:करण में संस्कारित पांचों विषयों की आसक्तिरूपी नौ कोस की दूरी पर ही रह जाती है और मौत का समय आ जाता है। इसमें कहो भला किसका दोष है! दोष चलने वाले का ही है, जो कल्याण का सही रास्ता न पकड़कर भूले पथ में भटक गया है।


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माया केरी बसि परे, ब्रह्मा विष्णु महेश।


नारद शारद सनक सनंदन, गौरी पूत गणेश॥

ब्रह्म, विष्णु, महेश, नारद, सरस्वती, सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार तथा गौरी के पुत्र गणेश-सब मायिक प्रकृति के अधीन हुए।


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मन मतंग गइयर हने, मनसा भई सचान।


जंत्र-मंत्र माने नहीं, लागी उड़ि-उड़ि खान॥

मन उन्मत्त-हाथी के समान है, यह जीवरूपी महावत को मारता रहता है और इच्छाएं बाज-पक्षी के समान है, वे उड़-उड़कर मनुष्य को खाती रहती हैं। इन पर यंत्र-मंत्र का प्रभाव नहीं पड़ता।





kabir dohe viyog



करक करेजे गड़ि रही, बचन वृक्ष की फाँस।

निकसाये निकसे नहीं, रही सो काहू गाँस॥


वाणीरूपी पेड़ के कांटे मनुष्यों के कलेजे में चुभ गए हैं। वे रुक-रूककर पीड़ा करते हैं। वे किसी के निकालने पर भी नहीं निकलते। वे भावुकों के दिलों में चुभकर रूके हुए हैं।

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हंसा तू सुवर्ण वर्ण, क्या वर्णों मैं तोहिं।

तरिवर पाय पहेलिहो, तबै सराहौं तोहिं॥


हे चेतन! तू उत्तम ज्ञान-रंग है। मैं तेरी क्या प्रशंसा करूँ। मनुष्य-शरीर तो पाए हुए हो, परंतु जब अपने रहस्य को समझोगे, तभी मैं तुम्हारी प्रशंसा करूँगा।







हाथ कटोरा खोवा भरा, मग जोवत दिन जाय।


कबीर उतरा चित्त से, छाँछ दियो नहिं जाय॥

जिस प्रकार खोया (मावा) से भरा कटोरा लेकर प्रिय का मार्ग देखते-देखते किसी के दिन जाएं कि प्रिय आए तो उसे प्रेमपूर्वक खिला दूं, परंतु प्रिय के दुराचरण के कारण यदि वह प्रेमी के चित्त से उतर जाए तो प्रेमी को उसे मट्ठा देने की भी इच्छा नहीं होगी; उसी प्रकार अंत:करणरूपी हाथ के प्रेमरूपी पात्र में बोधरूपी खोया भरकर जिज्ञासुओं का मार्ग देखते ही सद्गुरु के दिन जाते हैं; परंतु व्यक्ति जब अपने दुराचरण के कारण गुरु के चित्त से उतर जाता है, तब बोधरूपी खोया कौन कहे, उसे मट्ठारूपी व्यावहारिक सीख देने का भी मन नहीं होता।








मलयागिर की बास में, बेधा ढाँक पलास।

बेना कबहुँ न बेधिया, जुग-जुग रहिया पास॥


ढांक-पलाश जैसे साधारण पेड़-पौधे भी सरस होने से मलयगिरि की सुगंध में सुवासित होकर चंदन बन जाते हैं। परंतु बांस-जैसे बड़े वृक्ष भी गांठदार, पोले तथा नीरस होने से मलयगिरि की सुगंधी को नहीं ग्रहण कर पाते, भले ही वे मलयगिरि के पास बहुत काल से रहते हों। इसी प्रकार साधारण मनुष्य अपनी विनम्रता के कारण सत्संग से लाभ लेकर महान हो जाते हैं, परंतु बड़प्पन के अहंकारी लोग चाहे नित्य साधुजनों के पास ही रहें, उनसे कोई लाभ नहीं ले पाते।

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चारि मास घन बरसिया, अति अपूर जल नीर।

पहिरे जड़ तन बखतरी, चुभै न एकौ तीर॥


बादल चारों महीने वर्षा काल में भरपूर पानी बरसाए, किंतु ऊसर जमीन में जैसे कुछ न पैदा हो, और किसी द्वारा बाणों की भरपूर वर्षा करने पर भी लोहे का कवच पहने होने से उसके अंग में एक भी बाण न चुभे, वैसे जिसने जड़ता का कवच पहन रखा है उसे ज्ञान की एक बात भी नहीं लगती, चाहे उसके सामने कोई ज्ञान-वाणी की अपार वर्षा करता रहे।







संसारी समय बिचारी, कोई ग्रेही कोइ जोग।


औसर मारे जात है, तैं चेत बिराने लोग॥

संसार के लोगों पर जब समय की मार पड़ती है अर्थात जब उन्हें कोई ज्यादा कष्ट होता है, तब वे विचार में पड़ जाते हैं, और सोचने लगते हैं कि हम चाहते हैं सुख, परंतु मिलता है दुख। तो निश्चित ही हमें सुख और दुख देने वाला


कोई दूसरा है। अतएव ऐसा सोचकर उनमें से कोई तो गृहस्थी में रहकर ही कीर्तन-भजन, अर्चन-वंदन एवं नवधा-भक्ति आदि करने लगता है, और कोई घर छोड़कर योगी-संयासी होकर तप-ध्यान आदि द्वारा उसे खोजने लगता है। सद्गुरु कहते हैं कि तेरे सुनहले अवसर व्यर्थ समाप्त हो रहे हैं, तू अपने घर में रहते हुए भी पराए बने हुए के समान अपने उच्चतम चेतनस्वरूप से बे-भान बना है। हे मानव! सावधान हो जा!







आपा तजै हरि भजै, नख सिख तजै विकार।


सब जीवन से निर्बैर रहै, साधु मता है सार॥

अहंकार को छोड़े, हरि का भजन करे, नख से शिखा तक के विकारों का परित्याग करे, सभी जीवों से निर्वैर रहे और उत्तम विचारों के पथ पर चले, यही जीवन में सार है।








नाना रंग तरंग है, मन मकरन्द असूझ।

कहहिं कबीर पुकारि के, तैं अकिल कला ले बूझ॥


कल्पनाओं एवं भावनाओं की नाना लहरें हैं। मन भंवरा उनमें पड़कर अंधा बना रहता है। कबीर साहेब मनुष्यों की भीड़ में सबको उच्चस्वर में सुनाकर कह रहे हैं-हे मनुष्यों! तुम इनसे पार होने के लिए विवेकी गुरु के पास विवेकज्ञान एवं परखरूपी साधन जानने का प्रयास करो।







जहिया जन्म मुक्ता हता, तहिया हता न कोय।


छठी तुम्हारी हौं जगा, तू कहाँ चला बिगोय॥

जब-जब जीव स्वतंत्र नरजन्म में था या वर्तमान में है, तब-तब मानवेतर अन्य तीन खानियों के विवशताकृत बंधन नहीं थे और न आज हैं। परंतु हे जीव! तू मन में अहंकार जागृतकर और अपने आप को खोकर कहाँ जा रहा है?।








राह बिचारी क्या करे, जो पंथि न चले बिचार।

आपन मारग छोड़ि के, फिरे उजार-उजार॥


बेचारी अच्छी राह क्या करे, जब पथिक विचारपूर्वक उस पर नहीं चलता और अपना रास्ता छोड़कर वीरान में भटकता है।

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हीरों की ओबरी नहीं, मलयागिरि नहिं पाँत।

सिंहों के लेहँड़ा नहीं, साधु न चले जमात॥


उत्तम हीरों से भरी कोठरी नहीं होती, पंक्ति की पंक्ति मलयगिरि नहीं होते, सिंहों के झुंड नहीं होते और पूर्णत्व प्राप्त संतों की भीड़ नहीं होती।

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जैसी गोली गुमज की, नीच परी ढहराय।

तैसा हृदय मूरख का, शब्द नहीं ठहराय॥


मंदिर के गोल गुंबद पर रखी गोली लुढ़ककर नीचे गिर पड़ती है। इसी प्रकार मूर्ख मनुष्य का हृदय होता है, उसमें निर्णय शब्द नहीं ठहरता।







प्रगट कहौं तो मारिया, परदा लखै न कोय।


सहना छिपा पयार तर, को कहि बैरी होय॥

यदि सत्य और असत्य को खोलकर कहा जाए तो अंधविश्वास के पक्षधर लोग मारने दौड़ते हैं और यदि कोई आड़ लेकर कहा जाए तो लोग भेद नहीं समझ पाते। चौकीदार पुवाल के नीचे छिपकर अन्न चुरा रहा है, अर्थात् भ्रामक गुरु सारहीन वाणियों की आड़ लेकर लोगों को भटका रहे हैं ऐसा कहकर कौन उनका वैरी बने!


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kabir doha on guru




ऊपर की दोऊ गई, हियहु की गई हेराय।


कहहिं कबीर जाकी चारिउ गई, ताको काह उपाय॥

ऊपर के दोनों चर्मनेत्रों से देखकर जो सत्यज्ञान एवं अच्छे आचरणों से नहीं चलता, और जिसके हृदय के विवेक-विचार रूपी नेत्र भी फूट गए हैं, सद्गुरु कहते हैं कि इस प्रकार जिसके चारों नेत्र नहीं रह गए, उसके कल्याण का क्या उपाय है!


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बुन्द जो परा समुद्र में, सो जानत सब कोय।


समुद्र समाना बुन्द में, सो जाने बिरला कोय॥

बारिश में जो जल की बूंदें समुद्र में पड़ती हैं, उन्हें सब जानते हैं, परंतु सूर्य की गरमी और वायु के संपर्क से समुद्र का जल वाष्परूप में उड़कर और बादल बनकर बूंद में समाया है इसे कोई बिरला जानता है। जीव ब्रह्म में लीन होता है इसे बहुत लोग कहते हैं, परंतु ब्रह्म जीव ही में लीन है, अर्थात ब्रह्मत्व, श्रेष्ठत्व जीव ही में निहित है, इस तथ्य को कोई बिरला जानता है।








शब्द हमारा आदि का, शब्दै पैठा जीव।

फूल रहन की टोकरी, घोर खाया घीव॥


हमारे निर्णय शब्द जीव के मूल स्वरूप के परिचायक हैं। परंतु जीव भ्रामक शब्दों में घुसा पड़ा है। मानव-शरीर तो सार शब्द रूपी फूल रखने की टोकरी है। जैसे घी मट्ठा में पड़ा रहने से खराब हो जाता है, वैसे जीव भ्रामक शब्दों में पड़ा रहने से पतित हो जाता है।

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संशय सब जग खंडिया, संशय खंडे न कोय।

संशय खंडे सो जना, जो शब्द विवेकी होय॥


संदेह और अनिश्चय ने संसार के सारे मनुष्यों के मन को उलझा दिया है; किंतु संदेह एवं अनिश्चय का नाश किसी ने नहीं किया। इनका नाश वही करता है, जो शब्दों का विवेकी होता है।




kabir doha jivan



मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुरि न दूजी बार।


पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुरि न लागै डार॥

मनुष्य का जन्म पुन: मिलना बड़ा कठिन है। पके फल जब डाली से टूटकर गिर पड़ते हैं तब वे पुन: लौटकर उसमें नहीं लगते। इसी प्रकार जीव जब देह छोड़कर चला जाता है तब पुन: उसमें नहीं लौटता।


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जाका गुरु है आँधरा, चेला काह कराय।


अंधे अंधा पेलिया, दोऊ कूप पराय॥

जिसका गुरु ही जड़-चेतन एवं सार-असार के विवेक से रहित है, वह शिष्य बेचारा क्या करे! अंतत: गुरु-शिष्य दोनों विवेकहीन बने अंध-परंपरा में एक दूसरे को ठेलते हुए अज्ञान एवं कल्पना के कुएं में पड़े रहते हैं।


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राम बियोगी बिकल तन, इन्ह दुखवो मति कोय।


छूवत ही मरि जायँगे, तालाबेली होय॥

जो लोग राम को अपनी आत्मा से अलग मानकर उसकी वियोगजनित पीड़ा से पीड़ित रहते हैं, उन्हें यह कहकर मत दुखाओ कि तुम्हारी आत्मा से अलग कहीं कोई राम नहीं है। क्योंकि वे इतनी बातें सुनते ही तिलमिलाकर अत्यंत पीड़ित हो जाएंगे।


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जो तू साँचा बाणिया, साँची हाट लगाव।


अन्दर झारू देइ के, कूरा दूरी बहाव॥

यदि तू सच्चे ज्ञान का व्यापारी है तो सत्संगरूप सच्चा बाजार लगा। विवेक-विचाररूपी बुहारी से अंत:करण को बुहारकर भ्रांति एवं विकाररूपी कचड़े को दूर फेंक दे।


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घाट भुलाना बाट बिनु, भेष भुलाना कान।


जाकी माड़ी जगत में, सो न परा पहिचान॥

जैसे रास्ता न मिलने से नदी पार जाने का घाट भूल जाए, वैसे यथार्थ ज्ञान-पथ न मिलने से मोक्ष-द्वार भूल जाता है। मोक्ष-पथगामी तथा मोक्षोपदेशक साधु लोग तो अपने वेष की मर्यादा एवं मान-महंती में भूल जाते हैं और जिस जीव के कर्तव्यों की शोभा संसार में फैली है, मनुष्य को उसकी पहचान नहीं होती।








हरि हीरा जन जौहारी, सबन पसारी हाट।

जब आवै जन जौहरी, तब हीरों की साट॥


सभी मत के गुरुजनों ने अपने ज्ञानरूपी हीरों को सत्संगरूपी बाजार में फैलाकर दुकानें लगा रखीं हैं। परंतु जब कोई ज्ञान-हीरे का सच्चा पारखी आएगा, तब इनके हीरों की परख करेगा। सच्चा पारखी ही असली तथा नकली हीरे की परख करता है।




kabir doha maya par



कनक कामिनी देखि के, तू मत भूल सुरंग।


मिलन बिछुरन दुहेलरा, जस केंचुलि तजत भुवंग॥

हे ज्ञानस्वरूप जीव! धन-ऐश्वर्य और स्त्री-पुत्रादि की चमक-दमक देखकर तू मत भूल! सांप के शरीर में केंचुली आने और उसके जाने-दोनों में जैसे उसे कष्ट होता है, वैसे माया के प्राप्त करने तथा उसके बिछुड़ने-दोनों में जीव को कष्ट होता है।


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माया तजे क्या भया, जो मान तजा नहिं जाय।


जेहि माने मुनिवर ठगे, सो मान सबन को खाय॥

स्त्री,पुत्र,घर धन त्यागकर कोई साधुवेष धर लिया तो क्या विशेषता हो गई, यदि उसने अपने माने हुए बड़प्पन का घमंड नहीं छोड़ा। जिस बड़प्पन के अहंकार ने बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों को पथभ्रष्ट कर दिया, वही अहंकार आज भी सबको भ्रष्ट कर रहा है।


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चार चोर चोरी चले, पगु पनहीं उतार।


चारिउ दर थूनी हनी, पंडित करहु बिचार॥

मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार- ये चार चोर चुपचाप जीव के ज्ञान-धन की चोरी करने के लिए चले और विषयों के मनन, चिंतन, निश्चय एवं करतूति रूप चार दरों में भास-अध्यास की थूनियां गाड़ दीं। हे पंडितो, इन पर विचार करो और इनके फंदों से बचो।








आगे सीढ़ी साँकरी, पीछे चकनाचूर।

परदा तर की सुंदरी, रही धका से दूर॥


कोई बहुत ऊँची जगह पर चढ़ गया हो, परंतु वहां से और भी उंची जगह पर चढना हो और ऊँचे पर जाने के लिए आगे सीढ़ी बहुत संकरी तथा खड़ी हो। नीचे जितना पार कर आया हो वह भी बहुत गहरा हो। ऐसी अवस्था में धैर्यहीन यात्री की स्थिति बड़ी कायरतापूर्वक हो जाती है। वह ऊपर देखता है तो सीढ़ी बहुत संकरी तथा खड़ी है, उस पर चढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही है और पीछे देखता है तो बहुत गहरा है, उसे देखकर मन चकनाचूर हो जाता है। अत: वह कायरतापूर्वक बैठ जाता है। इसी प्रकार कोई परदे के भीतर रहने वाली सुकुमारी सुंदरी नारी हो, वह नावका पर समुद्र की यात्रा कर रही हो, बीच में झंझावत आने से उसे धूप और हवा सहन न होती हो,इसीलिए वह बीच ही में से अपनी यात्रा स्थगित कर किनारे से दूर मझधार में ही लंगर डालकर बैठ गई हो, तो उसकी दशा भी दयनीय हो जाती है।

विषयासक्त, सुखाध्यासी एवं आरामतलब लोगों की यही दशा है। कुछ शुद्ध संस्कार होने से मनुष्य कल्याण-पथ में चल पड़ा। परंतु उसे कुछ चलकर आगे का मार्ग कठिन दिखा और पीछे संसार में विषयासक्तिजनित दुख देखता है, तो उसका मन चकनाचूर हो जाता है। इस प्रकार वह परदातर की सुंदरी बनकर अर्थात आसक्ति को जीवन-प्राण मानकर बीच धारा में ही पड़ा रह गया, कल्याण-तट पर नहीं लगा।








हिलगी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट।

चुंबक बिना न नीकरे, कोटि पाहन गये छूट॥


शरीर में तीर घुसकर और उसका नोक टूटकर शरीर के अंदर रह गया। वह चुंबक-पत्थर के बिना नहीं निकल सकता। अन्य करोड़ो पत्थर उसे नहीं निकाल सकते। इसी प्रकार मनुष्य के मन में वचन के बाण घुसकर उसमें जम गए हैं। बिना विवेक-ज्ञान के वे नहीं निकल सकते। करोड़ो थोथे ज्ञान उनके लिए बेकार हैं।

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अपने अपने शिरों का, सबन लीन्ह है मान।

हरि की बात दुरन्तरी, परी न काहू जान॥


संसार के प्राय: सभी लोग निरख-परख किए बिना अपनी-अपनी परंपरा एवं सम्प्रदाय की बातों को स्वीकार लेते हैं, इसलिए यथार्थ ज्ञान की बातें समझना उनके लिए अत्यंत कठिन हो जाता है। कोई भी व्यक्ति केवल परम्परावादी बनकर सत्य को नहीं समझ सकता।







चौगोड़ा के देखते, ब्याधा भाग जाय।


अचरज एक देखो हो संतों, मूवा कालहिं खाय॥

शशा को देखकर शिकारी भयवश भाग खड़ा हुआ। हे संतो! एक आश्चर्य और देखता हूँ कि मुरदा ने काल को खा लिया है। अर्थात आज तक शिकार बना हुआ जीव ज्ञानवान हो जाने से उसे देखकर कामादि शिकारी भाग खड़े हुए और ज्ञानबल से मरे हुए मन ने भव-बंधनों को नष्ट कर दिया।








जिन्ह-जिन्ह सम्मल ना कीयो, अस पुर पाटन पाय।

झालि परे दिन आथये, सम्मल कियो न जाय॥


ऐसा उत्तम नर-शरीर और सत्संग पाकर जिसने आध्यात्मिक पूंजी नहीं बना ली, वह बूढ़ा होने पर तथा जीवन के अंत होने पर कुछ नहीं कर सकेगा।







झालि परे दिन आथये, अंतर पर गइ साँझ।


बहुत रसिक के लागते, बिस्वा रहि गइ बाँझ॥

जैसे किसी पथिक के अपने गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही संध्या हो जाए, दिन डूब जाए और रात का झोला पड़ने लगे, वैसे व्यक्ति अपनी स्वरूपस्थिति के पाने के पूर्व ही बूढ़ा हो जाता है, उसकी इंद्रियां निर्बल हो जाती है। उसके मन में अंधियार हो जाता है और मौत का समय आ जाता है। जैसे वेश्या से बहुत विषयी पुरुषों के लगने के कारण वह बंध्या रह जाए, वैसे जीव अनेक विषयों एवं कल्पित देवी-देवताओं में लगने के कारण स्वरूपस्थिति से दूर रह जाता है।


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kabir niti doha



बोलन है बहु भाँति का, तेरे नैनन किछउ न सूझ।


कहहिं कबीर बिचारि के, तैं घट-घट बानी बूझ॥

संसार में बातें बहुत प्रकार की होती हैं। तेरे भीतर के नेत्रों से तो कुछ सूझता नहीं है,तू सभी बातों को आंख मूंदकर मान लेता है। सद्गुरु कहते हैं कि हे मानव! तू सबकी जुबानों से निकली हुई बातों को परखकर समझने का प्रयत्न कर।








आगि जो लागि समुद्र में, धुवाँ न परगट होय।

की जाने जो जरि मुवा, की जाकी लाई होय॥


साधक के हृदयरूपी समुद्र में ज्ञान की आग लग गई। इसमें तो धुआं प्रकट होता नहीं है कि बाहर से कोई आग का अनुमान कर सके। इस आग को वही जानेगा जो इसमें जलकर मर चुका है, अर्थात ज्ञानाग्नि से जिसकी सारी आसक्तियां जलकर समाप्त हो गई हैं और वह जीवन्मुक्त हो चुका है या इसे वह सद्गुरु जानेगा जिसने इस आग को लाकर साधक के ह्रदय में लगाई हो।







हम तो सबकी कही, मोको कोइ न जान।


तब भी अच्छा अब भी अच्छा, जुग-जुग होउँ न आन॥

कबीर कहते हैं कि मैंने सबकी कसर-खोट की परख कराकर सबके कल्याण के लिए समान सत्यपथ बता दिया है, परंतु मेरे रहस्य को कोई नहीं समझता। तो भी, मैं पहले संतुष्ट था, आज संतुष्ट हूँ तथा आगे भी विकारी होने वाला नहीं। मैं सब समय संतुष्ट रहूँगा।





kabir doha on death

कबीर के दोहे मृत्यु 


काल खड़ा शिर ऊपरे, तैं जागु बिराने मीत।

जाका घर है गैल में, सो कस सोवे निश्चिन्त॥


हे माया मोही मानव! तू सावधान हो जा! तेरे सिर पर काल खड़ा है। जिसका निवास-स्थल काल के मार्ग में है, वह निश्चिंत होकर क्यों सो रहा है!

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सेमर सुवना सेइया, दुइ ढेंढ़ी की आस।

ढेंढ़ी फूटि चानक दै, सुवना चलै निरास॥


सुग्गों ने कुछ फल की आशा में सेमल के फूल और फल का सेवन किया, परंतु जब सेमल के फूल पककर चटाक से फूटने लगे और उनमें से नीरस रोयें निकलकर उड़ने लगे, तब सुग्गे निराश होकर उड़ चले। इसी प्रकार मनुष्य देखे और सुने हुए भोगों को भोगने की आशा में सांसारिक माया का सेवन करते हैं, परंतु संसार की नश्वरता और स्वार्थपरता की कलई खुलने पर निराश होकर संसार से चले जाते हैं।



kabir doha sumiran




साँचा शब्द कबीर का, हृदया देखु विचार।


चित्तहु दै समझै नहीं, मोहिं कहत भैल जगचार॥

कबीर के वचन सत्य के परिचायक हैं, इसलिए हे मानव, तुम उनको हृदय में विचारकर समझो। सद्गुरु कहते हैं कि लोग ध्यान देकर समझते नहीं हैं, मेरे-जैसे उपदेष्टा सभी समय पर संसार को समझाते आ रहे हैं।


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सायर बुद्धि बनाय के, बाँयें बिचक्षण चोर।


सारी दुनियाँ जहँडे़ गई, कोई न लागा ठौर॥

जीवों के ज्ञानधन एवं मानवता की चोरी करने वाले कुपथगामी विद्वानों ने अपनी बुद्धि को समुद्रवत विशाल बनाकर एवं नाना भ्रमपूर्ण ग्रंथों को रचकर समाज का पतन किया है। इसी में पड़कर संसार के सारे लोगों के विवेक-विचार नष्ट हो गए हैं। कोई अपनी स्थिति को नहीं प्राप्त हुआ।








राउर के पिछवारे, गावैं चारिउ सैन।

जीव परा बहु लूट में, ना कछु लेन न देन॥


चारों वेद श्रेष्ठतत्व के विषय में धुंधलके में संकेत करते हैं। जीव बहुत छीनाझपटी में पड़ा है। मूलत: विचार किया जाए तो जीव को संसार से कुछ प्रयोजन नहीं है।







बलिहारी तेहि पुरुष की, जो परचित परखनहार।


साई दीन्हों खाँड़ को, खारी बूझे गँवार॥

मैं उस मानव की प्रशंसा करता हूँ और उस पर अपने आप को न्योछावर करता हूं जो सार-असार से परिचित है या उनका परखने वाला है। परंतु मैं उस नादान की प्रशंसा करूं जिसने शकर लादने के लिए बयाना दिया है और जब माल तौलाना हुआ तब नमक तौलने तथा लादने लगा। अर्थात सत्यज्ञान पाने के लिए गुरुओं की सेवा की, परंतु उनसे ज्ञान के नाम पर भ्रांति का बोझा लादने लगा।








मन सायर मनसा लहरि, बूड़े बहुत अचेत।

कहहिं कबीर ते बाँचि हैं, चाके हृदय विवेक॥


मन समुद्र है और उससे उत्पन्न नाना इच्छाएं एवं कल्पनाएं लहरें हैं। इनमें बहुत-से असावधान लोग डूब गए हैं। सद्गुरु कहते हैं कि इनसे वही बचेगा जिसके हृदय में सत्य तथा असत्य एवं स्व और पर को परखने की शक्ति होगी।







मन भर के बोइये, घुँघुँची भर नहिं होय।


कहा हमार माने नहीं, अंतहु चले बिगोय॥

सकाम कर्मों के थोड़ा बीज बोने पर भी शरीर का निर्माण हो जाता है, और शरीर का निर्माण होने के बाद मानो उसमें काल का डेरा पड़ जाता है। रात और दिन बीतते हैं तथा शरीर क्षीण होता है। परंतु यदि कोई बहुत ज्यादा कर्म करे, किंतु उसमें सकाम-भावना न हो तो वे ज्यादा कर्म भी जन्म के थोड़ा भी कारण नहीं बनते। परंतु लोग मेरे विचारों पर ध्यान नहीं देते और सकाम कर्मों में डूबकर अपने आप को जन्मादि चक्कर में डालकर नष्ट करते हैं।








लाई लावनहार की, जाकी लाई पर जरे।

बलिहारी लावनहार की, छप्पर बाँचे घर जरे॥


साधक के ह्रदय में लाकर लगाई हुई ज्ञान की आग सद्गुरु की है, जिसकी आग से साधक के स्थूल-सूक्ष्म माया के आसक्ति रूपी पंख या राग-द्वेष के पंख जल गए और जीव-पक्षी का संसार के विषयों में उड़ना बंद हो गया। ज्ञानाग्नि लाकर लगाने वाले सद्गुरु की प्रशंसा है। इस ज्ञानाग्नि में छप्पर तो बच जाता है और घर जल जाता है अर्थात जीव का उद्धार हो जाता है और सांसारिक अहंता-ममता का घर जल जाता है।







झिलमिल झगरा झूलते, बाकि छूटि न काहु।


गोरख अटके कालपुर, कौन कहावै साहु॥

प्राणायाम करते हुए त्राटकादि हुए मुद्रा द्वारा झिलमिल ज्योति देखने के झगड़े में पड़कर सभी योगी इस भ्रम-झूले में झूलते हैं। इनमें से इससे कोई नहीं बचा। गोरखनाथ-जैसे महापुरुष भी इस कल्पना के नगर में फंस गए, फिर दूसरा कौन विवेकी कहलाएगा।


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साखी पुरंदर ढहि परे, बिबि अक्षर युग चार।


कबीर रसना रंभन होत है, कोइ कै न सकै निरुवार॥

चारों युगों से अर्थात बहुत काल से दो अक्षरों के जप से मोक्ष मनाने वाले उपासक तथा कर्मकांड से स्वर्ग मानने वाले और उसे प्रमाणित करने वाले इंद्र अपनी वास्तविक स्थिति से फिसलकर नीचे गिर गए हैं। सद्गुरु कहते हैं कि हर जगह प्राय: वाक्यजाल का विस्तार हो रहा है। कोई सत्यासत्य निर्णय कर बंधनों को नहीं छुड़ाता।




kabir doha -maut

कबीर के दोहे -मृत्यु 



मन माया की कोठरी, तन संशय का कोट।

बिषहर मंत्र माने नहीं, काल सर्प की चोट॥


यह मन माया की कोठरी है और शरीर संदेहों एवं भ्रांतियों का किला है। अज्ञानरूपी सांप ने मनुष्य को डसकर उसके अंग में ऐसा घाव बना दिया है कि उस पर सत्योपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता जिससे उसका विष दूर हो।

टैग: मृत्यु





kabir niti par doha



लोग भरोसे कौन के, बैठ रहै अरगाय।

ऐसे जियरहिं जम लूटे, जस मटिया लुटे कसाय॥


संसार के लोग किस देव-गोसैयां के भरोसे हाथ-पर-हाथ धरे एवं चुप्पी साधकर बैठे हैं! ऐसे आलसी मनुष्यों को वासनाएं उसी प्रकार लूटती हैं जैसे कसाई मांस को।

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सावन केरा सेहरा, बुन्द परा असमान।

सारी दुनियाँ वैष्णव भई, गुरु नहिं लागा कान॥


जैसे सावन महीने में वर्षा की झड़ी लग जाती है और आकाश से मेघमालाओं द्वारा घनाकर जलबूंदे पृथ्वी पर गिरती हैं, वैसे संसार में गुरुओं के अपार दल हो गए हैं और उन्होंने वर्षा-बुंदवत गुरु-मंत्रों की झड़ी लगा दी है। इसमें संसार के प्राय: सारे लोग भक्त तो हो गए हैं, परंतु सच्चे गुरु इनके कानों में सत्योपदेश नहीं दिए, अर्थात इन्हें सच्चे गुरु नहीं मिले।







ये कबीर तैं उतरि रहु, तेरो सम्मल परोहन साथ।


सम्मल घटे न पगु थके, जीव बिराने हाथ॥

परंतु हे कबीर, संसार के जीव अविवेकवश दूसरों के हाथों में पड़े हुए भटक रहे हैं। अतएव तुम उनके उद्धार के लिए राम की ऊँची घाटी एवं समाधि-सुख छोड़कर लोगों के बीच में उतर आओ। क्योंकि तुम्हारे पास विवेकज्ञान का शंबल है, पाथेय है और स्वावलंबन तथा स्व-श्रम का परोहन है। वे तुम्हारे पास से घटने वाले नहीं है। अतएव ऐसा करने से तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा नही, किंतु भूले जीवों का उद्धार होगा।








प्राणी तो जिभ्या डिगा, छिन-छिन बोल कुबोल।

मन के घाले भरमत फिरे, कालहिं देत हिंडोल॥


मनुष्य ने तो अपनी वाणी को चंचल कर रखा है और वह क्षण-क्षण गलत बातें बोलता है। वह मन के चक्कर में भटकता फिरता है। उसे कल्पनाएं नाना भ्रांतियों एवं राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि के झूले में झुला रही हैं।







बन ते भागि बेहड़े परा, करहा अपनी बान।


बेदन करहा कासो कहै, को करहा को जान॥

खरगोश अन्य हिंसक जंतुओं के डर से अपने दौड़ने के स्वभाववश भागकर एक उलझे हुए भयंकर स्थान में जा गिरा। अब वह अपनी पीड़ा किससे कहे! उसके दर्द को अन्य कौन समझेगा! अभिप्राय है कि मनुष्य गृहस्थी के बंधनों से भागकर साधु का वेष धारण किया और किसी सम्प्रदाय में दीक्षित हो गया, परंतु अपने फंसने के स्वभाववश वहां भी प्रपंच बनाकर उसमें बंध गया। अब वह अपने दुख को किससे कहे, उसके कष्ट को कौन दूर करे!




kabir maya par doha




माया के झक जग जरे, कनक कामिनी लाग।

कहहिं कबीर कस बाँचिहो, रुई लपेटी आग॥


संसार के लोग अर्थ और काम-भोग में आसक्त होकर माया रूपी आग की लपट में जलते हैं। सद्गुरु कहते हैं कि हे मनुष्य! तुम उसी प्रकार माया में आसक्त होकर जलने से बच नहीं सकते,जैसे आग में लिपटी हुई रुई नहीं बच सकती।
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