संत शिवनारायण के दोहे (शिवनारायणी संप्रदाय) Sant Shivnarayan ke Dohe

 दुनिया को मद कर्म है, संतन को मद प्रेम।

प्रेम पाय तौ पार है, छुटै कर्म अरु नेम॥


जब मन बहकै उड़ि चलै, तब आनै ब्रह्म ग्यान॥

ग्यान खड़ग के देखते, डरपै मन के प्रान॥


जहं लगि आये जगत महं, नाम चीन्ह नहिं कोय।

नाम चिन्हे तौ पार ह्वै, संत कहावत सोय॥


चालिस भरि करि चालि धरि, तत्तु तौलु करु सेर।

ह्वै रहु पूरन एक मन, छाडु करम सब फैर॥


संतमंत सबत परे, जोग भोग सब जीति।

अदग अनंद अभै अधर, पूरन पदारथ प्रीति॥


एक-एक देख्यो सकल घट, जैसे चंद की छांह।

वैसे जानो काल जग, एक-एक सब मांह॥

संत सालिगराम के दोहे (राधास्वामी सत्संग' के द्वितीय गुरु) Sant Saligram ke Dohe

सत्यनारायण कविरत्न के दोहे (भारतेंदु युग के कवि) Satyanarayan Kaviratn ke Dohe

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