Aziz Azad Ghazals / अज़ीज़ आज़ाद ग़ज़ल

 चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए / अज़ीज़ आज़ाद 

चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए
मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए

सलीकेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी
सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए

तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारों कब के मर जाते
अगर ज़िंदा हैं क़िस्मत से बुजुर्गों की दुआ कहिए

हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों<ref>जान छिड़कने वाले</ref> में
मगर यूँ तंगनज़री<ref>संकीर्ण-दृष्टि</ref> से हमें मत बेवफ़ा कहिए

तुम्हीं पे नाज था हमको वतन के मो’तबर<ref>प्रतिष्ठित</ref> लोगों
चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए

किसी की जान ले लेना तो इनका शौक है ‘आज़ाद’
जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए

चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के / अज़ीज़ आज़ाद

चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के
इतने कच्चे रिश्ते क्यूँ हैं इस दुनिया में अपनो के

सिर्फ़ मुहब्बत की दुनिया में सारी ज़बानें अपनी हैं
बाकी बोली अपनी-अपनी खेल तमाशे लफ़्ज़ों के

आँखों ने आँखों को पल में जाने क्या-क्या कह डाला
ख़ामोशी ने खोल दिये हैं राज छुपे सब बरसों के

अबके सावन ऐसा आया दिल ही अपना डूब गया
अश्कों के सैलाब में गुम है गाँव हमारे सपनों के

किसी मनचली मौज ने आकर इतने फूल खिला डाले
कोई पागल लहर ले गई सारे घरौंदे बच्चों के

नई हवा ने दुनिया बदली सुर-संगीत बदल डाले
हम आशिक‘आज़ाद’हैं अब भी उन्हीं पुराने नगमों के

अजब जलवे दिखाए जा रहे हैं
ख़ुदी को हम भुलाए जा रहे हैं

शराफ़त कौन-सी चिड़िया है आख़िर
फ़कत किस्से सुनाए जा रहे हैं

बुजुर्गों को छुपाकर अब घरों में
सजे कमरे दिखाए जा रहे हैं

खुद अपने हाथ से इज़्ज़त गँवा कर
अब आँसू बहाए जा रहे हैं

हमें जो पेड़ साया दे रहे थे
उन्हीं के क़द घटाए जा रहे हैं

सुख़नवर अब कहाँ हैं महफ़िलों में
लतीफ़े ही सुनाए जा रहे हैं

‘अजीज’अब मज़हबों का नाम लेकर
लहू अपना बहाए जा रहे हैं

अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया / अज़ीज़ आज़ाद


अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया
महफ़िल में आज सब की निगाहों में छा गया

कल तक तो इस हुजूम में मेरा कोई न था
लो आज हर कोई मुझे अपना बना गया

आता नहीं था कोई परिन्दा भी आस-पास
अब चाँद ख़ुद उतर के मेरी छत पे आ गया

जो दर्द मेरी जान पे रहता था रात-दिन
वो दर्द मेरी ज़िन्दगी के काम आ गया

हैरान हो के लोग मुझे पूछते हैं आज
‘आज़ाद’ तुमको कौन ये जीना सिखा गया

लोग सौ रंग बदलते हैं लुभाने के लिए / अज़ीज़ आज़ाद

लोग सौ रंग बदलते हैं लुभाने के लिए
कितने होते हैं जतन दिल की बुझाने के लिए

राह रुक जाती है जिस्मों की हदों तक जाकर
फिर मुहब्बत का सफ़र ख़त्म ज़माने के लिए

चन्द लम्हों में किया चाहेंगे बरसों का हिसाब
किसको फ़ुरसत है यहाँ साथ निभाने के लिए

प्यार करते हैं छुपाते हैं गुनाह हो जैसे
कौन तैयार है इल्ज़ाम उठाने के लिए

कैसे मुमकिन है के हर मोड़ पे मिल जाएँ ‘अज़ीज़’
ज़िन्दगी कम है जिन्हें अपना बनाने के लिए


मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन इक दिन तो हल होती है / अज़ीज़ आज़ाद

मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन इक दिन तो हल होती है
ज़िन्दा लोगों की दुनिया में अक्सर हलचल होती है

जीना है तो मरने का ये ख़ौफ़ मिटाना लाज़िम है
डरे हुए लोगों की समझो मौत तो पल-पल होती है

कफ़न बाँध कर निकल पड़े तो मुश्किल या मजबूरी क्या
कहीं पे काँटे कहीं पे पत्थर कहीं पे दलदल होती है

जिस बस्ती में नफ़रत को परवान चढ़ाया जायेगा
सँभल के रहना उस बस्ती की हवा भी क़ातिल होती है

इतना लूटा, इतना छीना, इतने घर बरबाद किये
लेकिन मन की ख़ुशी कभी क्या इनसे हासिल होती है

अम्नो-अमाँ के साये में ही सब तहज़ीबें पलती हैं
नफ़रत में पलने वालों की नस्ल तो ग़ाफ़िल होती है

होकर भी ‘आज़ाद’ जो अब तक दुनिया में मोहताज रहे
उन लोगों की हालत आख़िर रहम के क़ाबिल होती है


ज़िन्दगी धूप की बारिशों का सफ़र / अज़ीज़ आज़ाद

ज़िन्दगी धूप की बारिशों का सफ़र
यार क्या ख़ूब है ख़्वाहिशों का सफ़र

ज़ख़्म खाते रहे मुस्कराते रहे
यूँ ही चलता रहा काविशों का सफ़र

ज़ुल्म से ज़ब्त की और ताक़त बढ़ी
हौसला दे गया गर्दिशों का सफ़र

कितनी क़ौमें उलझ कर फ़ना हो गईं
खा गया है उन्हें रंजिशों का सफ़र

लड़खड़ाते हुए घर की जानिब चले
लो शुरू हो गया मैकशों का सफ़र

यार ‘आज़ाद’ थोड़ा सँभल कर चलो
मार डालेगा ये साज़िशों का सफ़र


चलो ये तो सलीक़ा है बुरे को मत बुरा कहिए / अज़ीज़ आज़ाद

चलो ये तो सलीक़ा है बुरे को मत बुरा कहिए
मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए

सलीक़ेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी
सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए

तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारो कब के मर जाते
अगर ज़िन्दा हैं क़िस्मत से बुज़ुर्गों की दुआ कहिए

हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों में
मगर यूँ तंगनज़री से हमें मत बेवफ़ा कहिए

तुम्हीं पे नाज़ था हमको वतन के मो’तबर लोगों
चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए

किसी की जान ले लेना तो इनका शौक़ है ‘आज़ाद’
जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए

वो मुहब्बत गई वो फ़साने गए / अज़ीज़ आज़ाद

वो मुहब्बत गई वो फ़साने गए
जो ख़ज़ाने थे अपने ख़ज़ाने गए

चाहतों का वो दिलकश ज़माना गया
सारे मौसम थे कितने सुहाने गए

रेत के वो घरौंदे कहीं गुम हुए
अपने बचपन के सारे ठिकाने गए

वो गुलेलें तो फिर भी बना लें मगर
अब वो नज़रें गईं वो निशाने गए

अपने नामों के सारे शजर कट गए
वो परिन्दे गए आशियाने गए

ज़िद में सूरज को तकने की वो ज़ुर्रतें
यार ‘आज़ाद’ अब वो ज़माने गए

पुराने पेड़ भी कितने घने हैं / अज़ीज़ आज़ाद  

पुराने पेड़ भी कितने घने हैं
थके-माँदों को साया दे रहे हैं

पले हैं जो हमारा ख़ून पीकर
उठा कर फन वही डसने लगे हैं

बड़े होकर हमारे सारे बच्चे
सरक कर दूर कितने हो गए हैं

सदा जो हाथ उठते थे दुआ को
न जाने वो लहू से क्यूँ सने हैं

जिन्हें सौंपी थी हमने रहनुमाई
उन्हीं की साज़िशों से घर जले हैं

‘अज़ीज़’ अब छोड़िये बेकार क़िस्से
कहेंगे लोग पागल हो गए हैं |

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