भील भजन गीत लोकगीत Bheel Janjati ke Bhajan Geet Lyrics (Bhil)
भजन / 1 / भील गीत
ओम-सोम दोनों बैल सुरता रास लगाय
धर्म की रास व लकड़ी पिराणा
हात में ले, सुरा ने ललकार
सत्य का माला रोपना धर्म की पेड़ी बंधाकर।
- धर्म का मकान सत्य की पेड़ी बँधाकर बनाना। ज्ञान के गोले चलाना जिससे पंछी उड़-उड़कर जायें। बोने के लिए सोवन सत्य का सरता बँधाकर बक्खर चलाना। कुल को तारने वाला बीज बोना, जिससे खेती लटालूम हो। भगवान के पास से बुलावा आया, वह वापस नहीं फेरा जा सकता है। कबीरदासजी की विनती है भगवान लज्जा रखना।
भजन / 2 / भील गीत
खेती खेड़ो हरि नाम की, तेमा मिलसे से लाभ॥
पाप ना पालवा कटावजो, धरमी हळे अपार॥
एची खेचिन बायरा लावजो, खेती कंचन थाय॥
खेती खेड़ो रे हरि नाम की, तेमा मिलसे से लाभ॥
ओम-सोम दोउ वाळ दिया, हाँरे सुरता रास लगाय॥
रास पिराणा धरिन हातमा,
हाँ रे सूरा दिया ललकार, खेती खेड़ो रे हरि नाम की,
तेमा मिलसे रे लाभ॥
सत कारे माळा रोपजो, धरमी पयड़ी बंधाव॥
ग्यान का गोळा चलावणा,
हाँ रे पंछी उड़-उड़ जाय, खेती खेड़ो रे हरि नाम की॥
ववन वकर जुपाड़जो, सोवन सरतो बंदाय,
कुल तारण बीज रे बोवणा,
हाँ रे खेती लटा-लुम थाय, खेती खेड़ो रे हरि नाम की॥
दावण आइ रे दयाल की, पाछी फेरी नि जाय॥
दास कबिर की रे विणती न रे, लज्जा राखो रे भगवान॥
खेती खेड़ो रे हरी नाम की, तेमा मिलसे रे लाभ॥
खेती खेड़ो रे हरी नाम की।
-भगवान के नाम की खेती करो। भगवान का भजन करो, उसमें लाभ मिलेगा।
इस खेती में पाप के जो वृक्ष उगे हैं, उन्हें खुदवाओ। धर्म खूब करो और उन वृक्षों को खींच-खाँचकर बाहर निकालो, जिनसे तुम्हारे जीवनरूपी खेती का सौन्दर्य बढे़गा। इसके बाद तुम्हारी खेती सोना ही जायेगी।
भजन / 3 / भील गीत
सरग झोपड़ा बांदिया, ने बणा लिया रे दुवार,
सरग झोपड़ा रे बांदिया॥
घर ऊँचा रे धारण नीचा, धरे नेवा नीची रे निकास॥
बारी रे छ छ सब धरिया
बिच बारी रे लगाय, सरग झोपड़ा रे बांदिया॥
बिना टाकी का घर घड़िया, नहिं लाग्या रे सुतार॥
हीरा मुद्रिका जड़ाविया
घरे मेल बनिया केवलास, सरग झोपड़ा रे बांदिया॥
खम्बा रे दीपक जले हाँ रे जाका रे भया उजाळा
तन की रे बत्ती बणाविया, सरग झोपड़ा रे बणाविया॥
धवळा घोड़ा मुख हासन, हीरा जड़िया पलाण॥
चांद सूरी मन पेगड़ा, हाँ रे उड़ी हुया असवार॥
सरग झोपड़ा बांदिया।
- तुम्हारा झोपड़ा स्वर्ग में बने, हमेशा इसका प्रयास करना। तुम्हारे झोपड़े का चौड़ा द्वार हो, घर ऊँचा हो, जिसके निकास का द्वार छोटा होना चाहिए। जिस घर के दरवाजे में हीरा-मोती जड़ें हों। उस घर के सामने जलने वाले दीपक की रोशनी से सारा जग प्रकाशित हो। यह सब तुम्हारे आचरण से ही सम्भव है।
भजन / 4 / भील गीत
रूसी भगवान राजा घर पावणों आयो॥
रूसी भगवान साते शेर लायो॥
राजा-राणी को एक लड़को रइयो तो रे राम॥
रूसी भगवान पावणो आयो राम।
राजा-रानी दाल-बाटी की मिजवानी दी राम॥
रूसी भगवान ने शेर वाटे लड़के के मिजवानी मांगी राम।
नइ तो भूख्या वापिस जावां जी।
राज-रानी लड़के की मिजवानी दी राम॥
राजा-रानी ने लड़के को आरी से काटा राम
नाहर के मिजवानी दे दी राम
राजा-रानी चार थाली परोसी राम।
रूसी भगवान बोल्या एक थाली और परोसो राम॥
राजा-रानी बोल्या एक आपकी, एक नाहर की राम,
एक म्हारी और एक राणी की राम।
पांचवी थाली किकावाटे जी
रूसी भगवान बोल्या लड़के को बुलाओ राम
राजा-राणी बोल्या लड़के को तो काटा राम
कहाँ से आवेगा राम॥
भगवान बोल्या तुम बाहर जाओ राम।
तुम्हारा लड़का गेंद खेल रहा राम॥
राजा-राणी खुसी हुया ने बाहर पहुँच्या राम।
गेंद खेलता बाला के देख्यो ने घरे लाया राम॥
सभी ने भगवान को भोग लगाया जी॥
-राजा मोरध्वज के यहाँ भगवान शेर लेकर परीक्षा लेने के लिए गये, और उनके अतिथि-सत्कार की परीक्षा ली थी। यह एक प्रसिद्ध कथा है,जिसमें भगवान ने राजा के पुत्र का माँस शेर को खिलाने को कहा। राजा ने अपने पुत्र को आरे से चीरकर शेर के समक्ष परोसा। भगवान रूपी साधु की परीक्षा में राजा-रानी सफल हुए। लड़के
को भगवान ने जीवित कर दिया। भगवान भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं, क्योंकि बहुत से भक्त ढांेगी होते हैं, दिखावे के लिए भक्ति और दान-पुण्य करते हैं।
भजन / 5 / भील गीत
टेक- मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा।
उजळी कर लेणा, मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा।
गोदड़ी बणी रे गुरु ज्ञान की, हीरा लाल लगाया,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा।
काय की बणि रे साधु गोदड़ी, कायन केरा धागा
कायन केरा धागा,
कोण पुरुष दरजी भया, कोण सिवण हारा,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा, उजळी कर लेणा
मयली गोदड़ी...
चौक-2 जल की बणी रे साधु गोदड़ी, पवन केरा धागा,
हो पवन केरा धागा, आप पुरुष दरजी भया,
हंसा सीवण हारा,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा, उजळी कर लेणा
मयली गोदड़ी...
चौक-3 काहाँ से पवन पथारिया, कांसे आया जल पाणी,
अरे कांसे आया पाणी, कांसे आई सोवागणी,
कब से धरती रचाणी,
मयली गोदड़ी साधू धोई लेणा।
चौक-4 आगम से पवन पधारिया, पीछे आया जलपाणी,
आरे पीछे आया पाणी, इन्द्र से आई सोवागणी,
तब से धरती रचाणी,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा, उजळी कर लेणा
मयली गोदड़ी...
चौक-5 धवळो छोड़ो रे खुर वाटळो मोत्या जड़ि रे लगाम
अरे मोत्या जड़ि रे लगाम, चाँद सूरज बेड़ पेगड़ा,
उड़ि न हुयो रे असवार,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा, उजळी कर लेणा
मयली गोदड़ी...
छाप- अकास से धारा उतरिया, धारा गई रे पयाळ,
अरे धारा गई रे पयाळ, कईये कबीर सुणो साधू
अरे हंसो गयो सत लोग,
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा, उजळी कर लेणा
मयली गोदड़ी साधु धोई लेणा।
हे साधु पुरुष! यह काया मैली हो गई हो तो इसे धोकर स्वच्छ कर ले अर्थात्
भक्ति करकेक उज्ज्वल कर ले। हे साधु पुरुष! गुरु ज्ञान की गोदड़ी (बिछावन)
बनी है, इसमें हीरे और लाल लगे हैं। यह काया वैसे ही प्राप्त नहीं हुई है। चौरासी
लाख योनियों के बाद यह मानव काया प्राप्त हुई है। इस काया को भक्ति के
द्वारा उज्ज्वल कर ले।
यह काया जल से बनी है और पवन के धागे से सी गई है। गोदड़ी सीने को भगवान
दर्जी बने। हरे हंसा (जीव)! भगवान इसके बनाने वाले हैं।
पवन कहाँ से आया और जल कहाँ से आया? कहाँ से सुहागन आई और यह काया
(धरती) कब से बनी?
आगम से पवन का आगमन हुआ और उसके बाद जल आया। और इन्द्र के यहाँ
से सुहागन आई तब ये धरती बनी और जीव की उत्पत्ति हुई।
सफेद घोड़ा उसका खुर कटोरेनुमा, उसकी लगाम मोतियों से जड़ी है। चन्द्रमा
और सूर्य दोनों पेगड़े और उछलकर उस पर सवारी की। अरे जीव (हंसा)! इस
काया को भक्ति से उज्ज्वल कर ले, ताकि तुझे नरक का मुँह न देखना पड़े।
भजन / 6 / भील गीत
टेक- सीता हो राम सुमर लेणा, भजि लेवो भगवान,
सीता हो राम सुमर लेणा।
चौक-1 सपना की रे संपत भइ, बांधिया गजराज।
भंवर भयो उठ जागीया, तेरा वही रे हवाल।
सीता हो राम...
चौक-2 वाये सोनू नहिं नीबजे, मोती लाग्या डालम डाल।
भाग बिना केम पावसो, तपस्या बिन राज।
सीता हो राम...
चौक-3 राजा दसरथ की अयोध्या है, नंदि सरजु का तीर,
जा घर बैठी राणी कौशल्या, जिनका जाया रघुवरी।
सीता हो राम...
चौक-4 बिना रे पंख का सोरठा, उड़ि गया रे अकास,
रंग रूप वाहां को कछु नहिं, भूखा न प्यास।
सीता हो राम...
छाप- झिणि झिणि नोबत वाजसे, वाजे गरू रबार,
सेन भगत की रे वीणती, राखो चरण आधार,
सीता हो राम...
- सीता-राम का स्मरण करें अर्थात् भगवान का भजन कर लें।
यह संसार क्षणिक स्वप्न के समान है। स्वप्न में मनुष्य मालदार हो जाता है, उसके घर हाथी झूलने लगते हैं। भोर होने पर फिर वही हाल। हे मानव! भजन कर ले। सोना बोने से उगता नहीं, न ही डाली पर मोती लगते हैं। भाग्य के बना कुछ नहीं मिलेगा। तपस्या के बिना राज्य भी नहीं मिलता है। सरयू नदी के तट पर राजा दशरथ
की अयोधया है, जिनके पास कौशिल्या रानी हैं, उनके पुत्र रघुवीर हैं। उनका भजन कर लो। यह जीव बिना पंख का पक्षी है, उसका रंग रूप कुछ नहीं है। न भूख लगती है न प्यास। हे मानव! सीता-राम की भक्ति कर ले, तो पार उतर जायेगा।
भजन / 7 / भील गीत
टेक- कब लग तोहे समझाऊँ, भोळा रे मन कब लग तोहे समझाऊँ।
चौक-1 घोड़ो रे होय तो लगाम देवाहूं, खासी झीण डलाऊँ।
असवार होकर ऊपर बैठकर, चाबुक दे समझाऊँ।
भोळा रे मन कब लग तोहे समझाऊँ।
चौक-2 हाथी रे होय तो जंजीर बंधाड़ू, चारी पाँय बंधाड़ू,
मावत होकर ऊपर बैठे, तो अंकुस दे समझाऊँ।
भोळा रे मन कब लग तोहे समझाऊँ।
चौक-3 सोनू रे होय तो सुवागी बुलाऊँ, खासा ताव देवाड़ों।
नई फूकणी से फुकवा लाग्या, तो पाणी से पिघला
भोळा रे मन कब लग तोहे समझाऊँ।
चौक-4 लोहो रे होय तो लोहार बुलाऊँ, आइरण घाट घड़ाऊँ।
लइ सन्डासी खिंचवा लाग्या, तो यंत्र मा तार चलाऊँ।
भोळा रे मन कब लग तोहे समझाऊँ।
छाप- ज्ञानी रे होय तो बताऊँ, लइ पोथी समझाऊँ
कइये कबीर सुणो भाई सदू, तो पत्थर को क्या समझाऊँ
- अरे भोले मन! तुझे कब तक समझाऊँ। घोड़ा हो तो उसे लगाम लगाऊँ और उस पर मजबूत झींग कसवाऊँ और उस पर सवार होकर बैठूँ और चाबुक से उस समझाऊँ। अरे! तू तो मनुष्य है और सभी जीवधारियों में एकमात्र समझदार जीव है, तुझे क्या घोड़े को समझाने के समान समझाना पड़ेगा?
हाथी हो तो पैर में जंजीर बाँधूँ (चारों पैरों में जंजीर बँधाऊँ), महावत होकर ऊपर बैठकर अंकुश से समझाऊँ। तू तो मनुष्य है।
सोना हो तो सुहागी बुलाकर और सोने के साथ डालकर खूब ताव दिलाऊँ (आग से ताव देने पर ही सोना पिघलता है) और फिर संडासी से पकड़कर पीटते हुए तारों में परिणत करूँ और आवश्यक डोरे-कंठी बनाऊँ। तू तो मनुष्य है। क्या सोने के समान आग पर तपाकर फूँकणी से फूँक देकर तार बनवाऊँ।
लोहा हो तो लोहार को बुलाऊँ और निहाई (लोहे की एरण) पर रखकर घड़वाऊँ और संडासी से पकड़कर हथौड़े से पीटते हुए तार बनवाऊँ।
ज्ञानी हो तो ज्ञान बताऊँ और पोथी लेकर समझाऊँ। कबीरदासजी कहते हैं कि- हे साधु भाइयों! सुनो, पत्थर को क्या समझाऊँ।
इस गीत में मनुष्य को शिक्षा दी गई है कि तू समझ जा और अच्छे कर्म करते हुए परिश्रम की कमाई से जीवन व्यतीत करते हुए साथ में इस संसार रूपी समुद्र से पार होने के लिए भगवान की भक्ति कर। गीत में घोड़े, हाथी, स्वर्ण, लोहा का उदाहरण देते हुए मनुष्य को समझाया गया है।
किसी की मृत्यु होने पर एकत्रित जनसमूह के समक्ष मृत्यु गीत गाते हैं। मरने वाला परलोक सिधार जाता है किन्तु गीतों से जनमानस को अच्छे कर्म के प्रति प्रेरित कर भगवान का भजन करने की प्रेरणा दी जाती है।
भजन / 8 / भील गीत
टेक- हारे सतगुरू का भरम नी पायो रे,
लियो रतन कोख अवतार रे।
चौक-1 आठ मास नव गर्भ रयो रे।
हंसा कोन पदारथ लायो रे।
आरे हंसा कोन पदारथ लायो रे।
कितना पुन से आयो मोरे हंसा,
ऐसो काई नाम धरायो रे।
लियो रतन कोख अवतार रे।
चौक-2 दान पुन प्रणाम कियो रे हंसा,
वइ काया संग लायो रे।
इतना पुन से आयो मोर हंसा,
ऐसो हीरा नाम धरायो रे।
लियो रतन कोख अवतार रे।
चौक-3 तीनी पण तुन धुल म गमायो हंसा,
हजुव नि समझ्यो गंवार रे।
अरे हंसा हजुव नि समझ्यो गंवार रे।
बइण भाणिज तुन वलकी नी जाण्यो।
थारो रगीसर को अवतार रे।
लियो रतन कोख अतवार रे।
चौक-4 जहाज पुरानी नंदी वव गयरी, केवटियो नादान रे।
आरे हंसा केवटियो नादान रे।
धर्मी राजा पार उतरियो, ऐसो पापी गोता खाय रे।
लियो रतन कोख अतवार रे।
कइये कमाली कबिर सा री लड़की ये निरबाणी।
अरे हंसा ये पंथ है निरबाणी।
गऊ का दान तुम देवो मेरे हंसा हो, तेरा धरम उतारेगा पार।
लियो रतन कोख अवतार।
- हाँ, मनुष्य तूने सतगुरू का भेद नहीं पाया, तूने रत्न की कोख से अवतार लिया है। (माँ की कोख को रतन कोख कहा गया है।)
आठ नौ माह त माँ के पेट में रहा, कौन सा पदार्थ लाया? अरे मानव! तू जान ले कितने पुण्य से मानव रूप में आया, ऐसा कौन सा नाम रखा है?
तूने पूर्व जन्म में जो भी दान-पुण्य और अराधना की, वही इस काया (शरीर) के साथ लाया है। इतने पुण्य से तू आया है और हीरा नाम रखा है। (मानव को हीरा माना है) जैसे धरती माता की कोख से बड़े प्रयत्न के बाद हीरा बाहर निकलकर संसार के लोगों के सामने आता है, वैसे ही माता की कोख से मनुष्य आता है।
अब मनुष्य के बुढ़ापे को कहा है कि बालपन, किशोर, युवावस्था तीनों पन धूल में गमा दिये अर्थात्तूने अपनी मुक्ति के लिए कुछ नहीं किया। अरे गँवार! बुढ़ापा आ गया, तू अभी तक नहीं समझा। बहन-भाणिजी को तूने नहीं पहचाना अर्थात् तूने नहीं पहचाना अर्थात् तूने बहन-भाणजी को दान नहीं दिया। तेरा जन्म व्यर्थ गया।
(भजन में बहन-भाणजी को दान देने की प्रेरणा दी गई है।)
अरे मानव! जिस प्रकार जहार पुरान हो और नदी गहरी हो और नाविक नादान (नासमझ) हो, उसमें धरम करने वाले राजा (मनुष्य) पार हो जाते हैं और पापी लोग नदी में गोते खाया करते हैं।
कबीरजी की लड़की कमाली कहती है कि- अरे मानव! गौ का दान करो तो वह धरम तुझे पार उतार देगा। (भजन में गौदान की महत्ता प्रतिपादित की गई है।)
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