छाये नभमंडल मैं, सलज सघन घन / लाल कवि पद
Chhaaye nabhmandal main salaj saghan ghan Laal Kavi Pad
छाये नभमंडल मैं, सलज सघन घन,
कारे पीरे श्वेत रंग, धारतै रहत हैं।
'लाल' जू कहत, त्यौंही चहकि चुरैल ऐसी,
चंचला जवाल जाल, जारतै रहत हैं॥
वन प्रभु पुंजन मैं, मालती निकुंजन मैं / लाल कवि पद
Van prabhu punjan main maalti nikunjan main Laal Kavi Pad
वन प्रभु पुंजन मैं, मालती निकुंजन मैं,
सीतल समीर, अनुसारतै रहत हैं।
कैसे धरै धीर जीव, पीव बिन मेरी बीर,
पीव-पीव पपिहा पुकारतै रहत हैं॥
होन लागे केकी, कुहकार कुंज कानन मैं / लाल कवि पद
Hon laage keki kuhkaar kunj kaanan main Laal Kavi Pad
होन लागे केकी, कुहकार कुंज कानन मैं,
झिल्ली-झनकार, दबि देह दहने लगे।
दौरि-दौरि धुरवा, धुधारे मारे भूधर से,
भूधर भ्रमाय, चित चोय चहने लगे॥
लाल लखौ पावस प्रताप जगती तल पैं / लाल कवि पद
Laal lakho paavas prataap jagti tal pein Laal Kavi Pad
'लाल' लखौ पावस प्रताप जगती तल पैं,
शीतल समीर बीर बैरी बहने लगे।
दाबे, दबे, दबकीले, दमक, दिखाए, दीह,
दिशि, देश, बादर, निसासी रहने लगे॥
सिंधु के सपूत, सिंधु तनया के बंधु / लाल कवि पद
Sindhu ke sapoot sindhu tanaya ke bandhu Laal Kavi Pad
सिंधु के सपूत, सिंधु तनया के बंधु,
अरे बिरही जरे हैं, रे अमंद तेरे ताप तैं
तू तौ दोषी दोष तैं, कालिमा कलंक भयो,
धारे उर छाप, रिषी गौतम के साप तैं।
'लाल' कहै हाल तेरो, जाहिर जहान बीच,
बारुणी को बासी त्रासी राहु के प्रताप तैं।
बाँधो गयो, मथो गयो, पीयो गयो, खारो भयो,
बापुरो समुद्र तो से पूत ही के पास तैं॥
बडभाग सुहाग भरी पिय सों / लाल कवि पद
Badhbhaag suhaag bharee piya saun Laal Kavi Pad
बडभाग सुहाग भरी पिय सों, लहि फागु में रागन गायो करै।
कवि 'लाल' गुलाल की धूँधर में, चख चंचल चारु चलायो करै॥
उझकै झिझकै झहराय झुकै, सखि-मंडल को मन भायो करै।
छतियाँ पर रंग परे ते तिया, रति रंग ते रंग सवायो करै॥
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