Krishnadas ke Pad Rachna कृष्णदास के पद रचनाएं

बैद को बैद गुनी को गुनी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

बैद को बैद गुनी को गुनी ठग को ठग ढूमक को मन भावै ।

काग को काग मराल मराल को कान्ध गधा को खजुलावै ।

कृष्ण भनै बुध को बुध त्योँ अरु रागी को रागी मिलै सुर गावै ।

ग्यानी सो ग्यानी करै चरचा लबरा के ढिँगै लबरा सुख पावै ।

कृष्णदास का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।

ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै, चिबुक चारु गडि ठठक्यो॥

सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, फिर चित अनत न भटक्यो।

कृष्णदास किए प्रान निछावर, यह तन जग सिर पटक्यो॥

देख जिऊँ माई नयन रँगीलो कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

देख जिऊँ माई नयन रँगीलो।

लै चल सखी री तेरे पायन लागौं, गोबर्धन धर छैल छबीलो॥

नव रंग नवल, नवल गुण नागर, नवल रूप नव भाँत नवीलो।

रस में रसिक रसिकनी भौहँन, रसमय बचन रसाल रसीलो॥

सुंदर सुभग सुभगता सीमा, सुभ सुदेस सौभाग्य सुसीलो।

कृष्णदास प्रभु रसिक मुकुट मणि, सुभग चरित रिपुदमन हठीलो॥

तरनि तनया तट आवत है कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

तरनि तनया तट आवत है प्रात समय,

कंदुक खेलत देख्यो आनंद को कंदवा.

नूपुर पद कुनित,पीताम्बर कटि बांधे,

लाल उपरना, सिर मोरन के चंदवा.

कंचन मनि मरकत रस ओपी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

कंचन मनि मरकत रस ओपी।

नन्द सुवन के संगम सुखकर अधिक विराजति गोपी।।

मनहुँ विधाता गिरिधर पिय हित सुरतधुजा सुख रोपी।

बदनकांति कै सुन री भामिनी! सघन चन्दश्री लोपी।।

प्राणनाथ के चित चोरन को भौंह भुजंगम कोपी।

कृष्णदास स्वामी बस कीन्हे,प्रेम पुंज को चोपी।।

प्रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

प्रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी॥

उर सोहे मरगजी सुमाल डगमगी सुदेशचाल चरणकंज मगनजीति करत गामिनी ॥१॥

प्रिया प्रेम अंगराग सगमगी सुरंग पाग, गलित बरूहातुलचूड अलकनसनी ॥

कृष्णदास प्रभु गिरिधर सुरत कंठ पत्र लिख्यो करज लेखनी पुन-पुन राधिका गुनी ॥२॥

गोकुल गाम सुहावनो सब मिलि खेलें फाग कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

गोकुल गाम सुहावनो सब मिलि खेलें फाग। मोहन मुरली बजावैं गावें गोरी राग ॥१॥

नर नारी एकत्र व्है आये नंद दरबार। साजे झालर किन्नरी आवज डफ कठतार ॥२॥

चोवा चन्दन अरगजा और कस्तूरी मिलाय। बाल गोविन्द को छिरकत सोभा बरनी न जाय॥३॥

बूका बंदन कुमकुमा ग्वालन लिये अनेक। युवती यूथ पर डारही अपने-अपने टेक॥४॥

सुर कौतुक जो थकित भये थकि रहे सूरज चंद। ’कृष्णदास’ प्रभु विहरत गिरिधर आनन्द कंद॥५॥

सघन कुंज भवन आज फूलन की मंडली रचि कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

सघन कुंज भवन आज फूलन की मंडली रचि ता मधि लै संग राधा बैठे गिरिधरनलाल।

चूनरी की बांधि पाग अंग बागो चूनरी को उपरेना कंठ हीरा हार मोती माल॥१॥

स्याम चूरी हरित लहँगा पहरि चूनरि झूमक सारी मानो गनगौर बनी ऐन मेन कीरति बाल ।

कृष्णदास पिय प्यारी अपने कर दरपन लै मुख देखत बार बार हँसि हँसि भरि अंक जाल॥२॥

नंद घरुनि वृषभान घरुनि मिलि कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

नंद घरुनि वृषभान घरुनि मिलि कहति सबन गनगौर मनाओ।

नये बसन आभूषन पहरो मंगल गीत मनोहर गाओ॥१॥

करि टीकौ नीकौ कुमकुम कौ आंगन मोतिन चौक पुराओ।

चित्र विचित्र वसन पल्लव के तोरन बंदरवार बँधाओ॥२॥

घूमर खेलो नवरस झेलो राधा गिरिधर लाड लडावो।

विविध भांति पकवान मिठाई गूँजा पूआ बहु भोग धराओ॥३॥

जल अचवाय पोंछि मुख वस्तर माला धरि दोऊ पान खवाओ।

कृष्णदास पिय प्यारी को आनन निरखि नैन मन मोद बढावो॥४॥

रंगीली तीज गनगौर आज चलो भामिनी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

रंगीली तीज गनगौर आज चलो भामिनी कुंज छाक लै जैये।

विविध भांति नई सोंज अरपि सब अपने जिय की तृपत बुझैये॥१॥

लै कर बीन बजाय गाय पिय प्यारी जेंमत रुचि उपजैये।

कृष्णदास वृषभानु सुता संग घूमर दै दै नंदनंद रिझैये॥२॥

नवल निकुंज महेल मंदिर में कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

नवल निकुंज महेल मंदिर में जेंवन बैठे कुंवर कन्हाई।

भरि भरि डला सीस धरि अपने व्रजबधू तहाँ छाक लै आई॥१॥

हरखित बदन निरखि दंपति को सुंदरि मंद मंद मुसकाई।

गूँजा पूआ धरि भोग प्रभु को कृष्णदास गनगौर मनाई॥२॥

कहत जसोदा सब सखियन सों कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

कहत जसोदा सब सखियन सों आवो बैठो मंगल गावो।

है गनगौर की तीज रंगीली कान्ह कुंवर को लाड लडावो॥१॥

ललिता चन्द्रभगा चन्द्रावली बेगि जाय राधा लै आवो।

स्यामा चतुरा रसिका भामा तुम पिय को सिंगार बनावो॥२॥

कमला चंपा कुमुदा सुमना पहोंपमाल लै उर पहिरावो।

ध्याया दुर्गा हरखा बहूला लै दरपन कर बैनु गहावो॥३॥

कृष्णा यमुना वृंदा नैनां चरन परसि करि नैन लगावो।

तारा रंगा हंसा विमला जमुनाजल झारी पधरावो॥४॥

नवला अबला नीला सीला गूँजा पूवा ले भोग धरावो।

हीरा रत्ना मैना मोहा लै बीना तुम तान सुनावो॥५॥

घूमर खेलो मन रस झेलो नेह मेह बरखा बरखावो।

कृष्णदास प्रभु गिरिधर को सुख निरखि निरखि दोऊ दृगन सिरावो॥६॥

लाल गोपाल गुलाल हमारी आँखिन में जिन डारो जू कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

लाल गोपाल गुलाल हमारी आँखिन में जिन डारो जू।

बदन चन्द्रमा नैन चकोरी इन अन्तर जिन पारो जू ॥१॥

गावो राग बसन्त परस्पर अटपटे खेल निवारो जू।

कुमकुम रंग सों भरी पिचकारी तकि नैनन जिन मारो जू॥२॥

बंक विलोचन दुखमोचन लोचन भरि दृष्टि निहारो जू।

नागरी नायक सब सुख गायक कृष्णदास को तारो जू॥३॥

खेलत वसंत निस पिय संग जागी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

(मंगला दर्शन के समय)

खेलत वसंत निस पिय संग जागी।

सखी वृंद गोकुल की सोभा गिरिधर पिय पदरज अनुरागी॥१॥

नवल कुंज में गुंजत मधुप पिक विविध सुगन्ध छींट तन लागी।

कृष्णदास स्वामिनी युवती यूथ चूडामणि रिझवत प्राणपति राधा बडभागी ॥२॥

आज कछु देखियत ओर ही बानक कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

(मंगला समय)

आज कछु देखियत ओर ही बानक प्यारी तिलक आधे मोती मरगजी मंग।

रसिक कुंवर संग अखारे जागी सजनी अधर्सुख निस बजावत उपंग॥१॥

नव निकुंज रंग मंडप में नृत्य भूमि साजि सेज सुरंग।

तापर विविध कल कूजित सखी सुनत श्रवन वन थकित कुरंग॥२॥

कृष्णदास प्रभु नटवर नागर रचत नयन रतिपति व्रत भंग।

मोहनलाल गोवर्धनधारी मोहि मिलन चलि नृत्य अनंग॥३॥

तरणि तनया तीर आवत हें प्रात समे कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

तरणि तनया तीर आवत हें प्रात समे गेंद खेलत देख्योरी आनंद को कंदवा।

काछिनी किंकणि कटि पीतांबर कस बांधे लाल उपरेना शिर मोरन के चंदवा॥१॥

पंकज नयन सलोल बोलत मधुरे बोल गोकुल की सुंदरी संग आनंद स्वछंदवा।

कृष्णदास प्रभु गिरिगोवर्धनधारी लाल चारु चितवन खोलत कंचुकी के बंदवा॥२॥

लीला लाल गोवर्धनधर की कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

लीला लाल गोवर्धनधर की।

गावत सुनत अधिक रुचि उपजत रसिक कुंवर श्री राधावर की॥१॥

सात द्योस गिरिवर कर धार्यो मेटी तृषा पुरंदरदर की।

वृजजन मुदित प्रताप चरण तें खेलत हँसत निशंक निडर की॥२॥

गावत शुक शारद मुनि नारद रटत उमापति बल बल कर की।

कृष्णदास द्वारे दुलरावत मांगत जूठन नंदजू के घर की॥३॥

परम कृपाल श्री वल्लभ नंदन कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

परम कृपाल श्री वल्लभ नंदन करत कृपा निज हाथ दे माथे ।

जे जन शरण आय अनुसरही गहे सोंपत श्री गोवर्धननाथ ॥१॥

परम उदार चतुर चिंतामणि राखत भवधारा बह्यो जाते ।

भजि कृष्णदास काज सब सरही जो जाने श्री विट्ठलनाथे ॥२॥

फल्यो जन भाग्य कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

फल्यो जन भाग्य पथ पुष्टि प्राकट करण दुष्ट पाखंड मत खंड खंडन किये ।

सकल सुख घोष को तिमिर हर लोक को कृष्ण रस पोष को पुंज पुंजन दिये ॥१॥

सकल मर्यादा मंडन प्रभु अवतरे खलन दंडन करन भक्त निर्मल हिये ।

प्रकट लक्ष्मण सदन निरख हरखत वदन मदन छबि कदन भई पदन नखना छिये ॥२॥

उदित भयो इंदु वृंदा विपिन को हरख वरख रस वचन सुन श्रवण निजजन पिये ।

कृष्णदास निनाथ हाथ गिरिवर धर्यो साथ सब गोप मुख निरख नेनन जिये ॥३॥

नवल वसंत नवल वृंदावन कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

नवल वसंत नवल वृंदावन खेलत नवल गोवर्धनधारी ।

हलधर नवल नवल ब्रजबालक नवल नवल बनी गोकुल नारी ॥१।

नवल यमुना तटा नवल विमलजल नूतन मंद सुगंध समीर ।

नवल कुसुम नव पल्लव साखा कूजत नवल मधुपपिककीर ॥२॥

नव मृगमद नव अरगजा चंदन नूतन अगर सु नवल अबीर ।

नव वंदन नव हरद कुंकुमा छिरकत नवल परस्पर नीर ॥३॥

नवल बेनु महुवरी बाजे अनुपम नौतन भूषण नौतन चीर ।

नवल रूप नव कृष्णदास प्रभु को नौतन जस गावति मुनि धीर ॥४॥

श्री गिरिधर लाल की बानिक ऊपर कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

श्री गिरिधर लाल की बानिक ऊपर आज सखी तृण टूटे री ।

चोवा चंदन अबीर कुंकुमा पिचकाइन रंग छूटे री ॥१॥

लाल के नैना रगमगे देखियत अंग अनंगन लूटे री ।

कृष्णदास धन्य धन्य राधिका अधर सुधा रस लूटे री ॥२॥

शरण प्रतिपाल गोपाल रति वर्धिनी कृष्णदास पद Krishnadas ke Pad 

शरण प्रतिपाल गोपाल रति वर्धिनी ।

देत पिय पंथ कंथ सन्मुख करत , अतुल करुणामयी नाथ अंग अर्द्धिनी ॥१॥

दीन जन जान रसपुंज कुंजेश्वरी रमत रसरास पिय संग निश शर्दनी ।

भक्ति दायक सकल भव सिंधु तारिनी करत विध्वंसजन अखिल अघमर्दनी ॥२॥

रहत नन्दसूनु तट निकट निसि दिन सदा गोप गोपी रमत मध्य रस कन्दनी ।

कृष्ण तन वर्ण गुण धर्म श्री कृष्ण की कृष्ण लीलामयी कृष्ण सुख कंदनी ॥३॥

पद्मजा पाय तू संगही मुररिपु सकल सामर्थ्य मयी पाप की खंडनी ।

कृपा रस पूर्ण वैकुण्ठ पद की सीढी जगत विख्यात शिव शेष सिर मंडनी ॥४॥

पर्योपद कमल तर और सब छांडि के देख दृग कर दया हास्य मुख मन्दनी ।

उभय कर जोर कृष्णदास विनती करें करो अब कॄपा कलिन्द गिरि नन्दिनी ॥५॥

कृष्णदास परिचय 

उनका जन्म १४९५ ई. के आसपास गुजरात में चिलोतरा ग्राम के एक कुनबी पाटिल परिवार में हुआ था। बचपन से ही प्रकृत्ति बड़ी सात्विक थी। जब वे १२-१३ वर्ष के थे तो उन्होंने अपने पिता को चोरी करते देखा और उन्हें गिरफ्तार करा दिया फलत: वे पाटिल पद से हटा दिए गए। इस कारण पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया। वे भ्रमण करते हुए ब्रज पहुँचे। उन्हीं दिनों नवीन मंदिर में श्रीनाथ जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करने की तैयारी हो रही थी। श्रीनाथ जी के दर्शन से वे बहुत प्रभावित हुए और वल्लभाचार्य से उनके संप्रदाय की दीक्षा ली।

उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यवहार कुशलता और संघटन योयता से प्रभावित होकर वल्लभाचार्य ने उन्हें भेटिया (भेंट संग्रह करनेवाला) के पद पर नियुक्त किया और फिर शीघ्र उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर का अधिकारी बना दिया। उन्होंने अपने इस उत्तरदायित्व का बड़ी योग्यता से निर्वाह किया। कृष्णदास को सांप्रदायिक सिद्धांतों का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण वे अपने संप्रदाय के अग्रगण्य लोगों में माने जाते थे। उन्होंने समय-समय पर कृष्ण लीला प्रसंगों पर पद रचना की जिनकी संख्या लगभग २५० है जो राग कल्पद्रुम, राग रत्नाकर तथा संप्रदाय के कीर्तन संग्रहों में उपलब्ध हैं। १५७५ और १५८१ ई. के बीच किसी समय उनका देहावासन हुआ।



Krishnadas ke Pad
Krishnadas kavi


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

Amir Khusrow Dohe Kavita अमीर खुसरो के दोहे गीत कविता पहेलियाँ