भई कंत दरस बिनु बावरी धरनीदास भजन / Bhajan Bhai Kant Darshan Bin Bawari Dharanidas Bhajan

 

भई कंत दरस बिनु बावरी।
मो तन व्यापे पीर प्रीतम की, मूरख जानै आवरी।
पसरि गयो तरू प्रेम साखा सखि, बिसरि गयो चित चावरी।
भोजन भवन सिंगार न भावै, कुल करतूति अभावरी।
खिन खिन उठि उठि पंथ निहारी, बार बार पछितावरी।
नैनन अंजन नींद न लागै, लागै दिवस विभावरी
देह दसा कछू कहत न आवै, जस जल ओछे नावरी।
धरनी धनी अजहुँ पिय पाओं, तो सहजै अनंद बधावरी। 

 
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