नये सुभाषित रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना Naye Subhashit Ramdhari Singh Dinkar Kavita



रामधारी सिंह दिनकर
1999 में भारत के डाक टिकट पर दिनकर
1999 में भारत के डाक टिकट पर दिनकर
जन्मरामधारी सिंह 23 सितंबर 1908 सिमरिया , बंगाल प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत (वर्तमान बेगुसराय , बिहार भारत)


मृत24 अप्रैल 1974 (आयु 65)
मद्रास (वर्तमान चेन्नई), तमिलनाडु , भारत
विश्राम स्थलबिहार
उपनामदिनकर
पेशा
भाषाहिन्दी
अल्मा मेटरपटना कॉलेज , पटना विश्वविद्यालय
साहित्यिक आंदोलनभारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
उल्लेखनीय कार्य
उल्लेखनीय पुरस्कार
जीवनसाथीश्यामावती देवी
बच्चे4
हस्ताक्षर
संसद सदस्य , राज्य सभा
कार्यकाल
3 अप्रैल 1952 – 2 अप्रैल 1964
अध्यक्षसर्वपल्ली राधाकृष्णन (1962-1964)
राजेंद्र प्रसाद (1952-1962)
अध्यक्षज़ाकिर हुसैन (1962-1964)
सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1952-1962)
निर्वाचन क्षेत्रबिहार
व्यक्तिगत विवरण
राजनीतिक दलभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

चुम्बन / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

Naye Subhashit Ramdhari Singh Dinkar Kavita

सब तुमने कह दिया, मगर, यह चुम्बन क्या है?

"प्यार तुम्हें करता हूँ मैं", इसमें जो "मैं" है,

चुम्बन उसपर मधुर, गुलाबी अनुस्वार है।

चुम्बन है वह गूढ़ भेद मन का, जिसको मुख

श्रुतियों से बच कर सीधे मुख से कहता है।


कविता और प्रेम / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना


ऊपर सुनील अम्बर, नीचे सागर अथाह,

है स्नेह और कविता, दोनों की एक राह।

ऊपर निरभ्र शुभ्रता स्वच्छ अम्बर की हो,

नीचे गभीरता अगम-अतल सागर की हो।


प्रेम / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

प्रेम की आकुलता का भेद

छिपा रहता भीतर मन में,

काम तब भी अपना मधु वेद

सदा अंकित करता तन में।

(२)

सुन रहे हो प्रिय?

तुम्हें मैं प्यार करती हूँ।

और जब नारी किसी नर से कहे,

प्रिय! तुम्हें मैं प्यार करती हूँ,

तो उचित है, नर इसे सुन ले ठहर कर,

प्रेम करने को भले ही वह न ठहरे।

(३)

मंत्र तुमने कौन यह मारा

कि मेरा हर कदम बेहोश है सुख से?

नाचती है रक्त की धारा,

वचन कोई निकलता ही नहीं मुख से।

(४)

पुरुष का प्रेम तब उद्दाम होता है,

प्रिया जब अंक में होती।

त्रिया का प्रेम स्थिर अविराम होता है,

सदा बढता प्रतीक्षा में।

(५)

प्रेम नारी के हृदय में जन्म जब लेता,

एक कोने में न रुक

सारे हृदय को घेर लेता है।

पुरुष में जितनी प्रबल होती विजय की लालसा,

नारियों में प्रीति उससे भी अधिक उद्दाम होती है।

प्रेम नारी के हृदय की ज्योति है,

प्रेम उसकी जिन्दगी की साँस है;

प्रेम में निष्फल त्रिया जीना नहीं फिर चाहती।

(६)

शब्द जब मिलते नहीं मन के,

प्रेम तब इंगित दिखाता है,

बोलने में लाज जब लगती,

प्रेम तब लिखना सिखाता है।

(७)

पुरुष प्रेम सतत करता है, पर, प्रायः, थोड़ा-थोड़ा,

नारी प्रेम बहुत करती है, सच है, लेकिन, कभी-कभी।

(८)

स्नेह मिला तो मिली नहीं क्या वस्तु तुम्हें?

नहीं मिला यदि स्नेह बन्धु!

जीवन में तुमने क्या पाया।

(९)

फूलों के दिन में पौधों को प्यार सभी जन करते हैं,

मैं तो तब जानूँगी जब पतझर में भी तुम प्यार करो।

जब ये केश श्वेत हो जायें और गाल मुरझाये हों,

बड़ी बात हो रसमय चुम्बन से तब भी सत्कार करो।

(१०)

प्रेम होने पर गली के श्वान भी

काव्य की लय में गरजते, भूँकते हैं।

(११)

प्रातः काल कमल भेजा था शुचि, हिमधौत, समुज्जवल,

और साँझ को भेज रहा हूँ लाल-लाल ये पाटल।

दिन भर प्रेम जलज सा रहता शीतल, शुभ्र, असंग,

पर, धरने लगता होते ही साँझ गुलाबी रंग।

(१२)

उसका भी भाग्य नहीं खोटा

जिसको न प्रेम-प्रतिदान मिला,

छू सका नहीं, पर, इन्द्रधनुष

शोभित तो उसके उर में है।


सौन्दर्य / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

निस्सीम शक्ति निज को दर्पण में देख रही,

तुम स्वयं शक्ति हो या दर्पण की छाया हो?

(२)

तुम्हारी मुस्कुराहट तीर है केवल?

धनुष का काम तो मादक तुम्हारा रूप करता है।

(३)

सौन्दर्य रूप ही नहीं, अदृश्य लहर भी है।

उसका सर्वोत्तम अंश न चित्रित हो सकता।

(४)

विश्व में सौन्दर्य की महिमा अगम है

हर तरफ हैं खिल रही फुलवारियाँ।

किन्तु मेरे जानते सब से अपर हैं

रूप की प्रतियोगिता में नारियाँ।

(५)

तुम्हारी माधुरी, शुचिता, प्रभा, लावण्य की समता

अगर करते कभी तो एक केवल पुष्प करते हैं।

तुम्हें जब देखता हूँ, प्राण, जानें, क्यो विकल होते,

न जानें, कल्पना से क्यों जुही के फूल झरते हैं।

(६)

रूप है वह पहला उपहार

प्रकृति जो रमणी को देती,

और है यही वस्तु वह जिसे

छीन सबसे पहले लेती।


वातायन / नये सुभाषित / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना


निज वातायन से तुम्हें देखता मैं बेसुध,

जब-जब तुम रेलिंग पकड़ खड़ी हो जाती हो,

चाँदनी तुम्हारी खिड़की पर थिरकी फिरती,

तुम किसी और के सपने में मँडराती हो।


नर-नारी / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

क्या पूछा, है कौन श्रेष्ठ सहधर्मिणी?

कोई भी नारी जिसका पति श्रेष्ठ हो।

(२)

कई लोग नारी-समाज की निन्दा करते रहते हैं।

मैं कहता हूँ, यह निन्दा है किसी एक ही नारी की।

(३)

पुरुष चूमते तब जब वे सुख में होते हैं,

हम चूमती उन्हें जब वे दुख में होते हैं।

(४)

तुम पुरुष के तुल्य हो तो आत्मगुण को

छोड़ क्यों इतना त्वचा को प्यार करती हो?

मानती नर को नहीं यदि श्रेष्ठ निज से

तो रिझाने को किसे श्रृंगार करती हो?

(५)

कच्ची धूप-सदृश प्रिय कोई धूप नहीं है,

युवती माता से बढ़ कोई रूप नहीं है।

(६)

अच्छा पति है कौन? कान से जो बहरा हो।

अच्छी पत्नी वह, न जिसे कुछ पड़े दिखायी।

(७)

नर रचते कानून, नारियाँ रचती हैं आचार,

जग को गढ़ता पुरुष, प्रकृति करती उसका श्रृंगार।

(८)

रो न दो तुम, इसलिये, मैं हँस पड़ी थी,

प्रिय! न इसमें और कोई बात थी।

चाँदनी हँस कर तुम्हें देती रही, पर,

जिन्दगी मेरी अँधेरी रात थी।

(९)

औरतें कहतीं भविष्यत की अगर कुछ बात,

नर उन्हें डाइन बताकर दंड देता है।

पर, भविष्यत का कथन जब नर कहीं करता,

हम उसे भगवान का अवतार कहते हैं।


निःशब्दता / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना


शब्द जो निःशब्द, नीरव हैं,

समय पाकर वही परिपक्व होते हैं।

घूर्णि जब आती नहीं दिन भर ठहरती है।

और वह वर्षा नहीं भरती सरोवर को,

पटपटा कर जो बहुत आवाज करती है।


परोपदेश / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

औरों को उपदेश सुनाना चुम्बन-सा ही है यह काम,

खर्च नहीं इसमें कुछ पड़ता, मन को मीठा लगता है।

(२)

आयु के दो भाग हैं, पहली उमर में

आदमी रस-भोग में आनन्द लेता है।

और जब पिछ्ली उमर आरम्भ हो जाती,

वह सभी को त्याग का उपदेश देता है।

विज्ञान / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना


बढ़ गया है दूर तक विज्ञान,

बढ़ गयी है शक्ति यातायात की।

किन्तु, क्या गन्तव्य कोई स्थान

है बढ़ा सारे जगत में एक भी?


गाँधी / नये सुभाषित / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

छिपा दिया है राजनीति ने बापू! तुमको,

लोग समझते यही कि तुम चरखा-तकली हो।

नहीं जानते वे, विकास की पीड़ाओं से

वसुधा ने हो विकल तुम्हें उत्पन्न किया था।

(२)

कौन कहता है कि बापू शत्रु थे विज्ञान के?

वे मनुज से मात्र इतनी बात कहते थे,

रेल, मोटर या कि पुष्पक-यान, चाहे जो रचो, पर,

सोच लो, आखिर तुम्हें जाना कहाँ है।

(३)

सत्य की संपूर्णता देती न दिखलाई किसी को,

हम जिसे हैं देखते, वह सत्य का, बस, एक पहलू है।

सत्य का प्रेमी भला तब किस भरोसे पर कहे यह

मैं सही हूँ और सब जन झूठ हैं?

(४)

चलने दो मन में अपार शंकाओं को तुम,

निज मत का कर पक्षपात उनको मत काटो।

क्योंकि कौन हैं सत्य, कौन झूठे विचार हैं,

अब तक इसका भेद न कोई जान सका है।

(५)

सत्य है सापेक्ष्य, कोई भी नहीं यह जानता है,

सत्य का निर्णीत अन्तिम रूप क्या है? इसलिए,

आदमी जब सत्य के पथ पर कदम धरता,

वह उसी दिन से दुराग्रह छोड़ देता है।

(६)

हम नहीं मारें, न दें गाली किसी को,

मत कभी समझो कि इतना ही अलम है।

बुद्धि की हिंसा, कलुष है, क्रूरता है कृत्य वह भी

जब कभी हो क्रुद्ध चिंतन के धरातल पर

हम विपक्षी के मतों पर वार करते हैं।

(७)

शान्ति-सिद्धि का तेज तुम्हारे तन में है,

खड्ग न बाँहों को न जीभ को व्याल करो।

इससे भी ऊपर रहस्य कुछ मन में है,

चिंतन करते समय न दृग को लाल करो।

(८)

तुम बहस में लाल कर लेते दृगों को,

शान्ति की यह साधना निश्छल नहीं है।

शान्ति को वे खाक देंगे जन्म जिनकी

जीभ संकोची, हृदय शीतल नहीं है।

(९)

काम हैं जितने जरूरी, सब प्रमुख हैं,

तुच्छ इसको औ’ उसे क्यों श्रेष्ठ कहते हो?

मैं समझता हूँ कि रण स्वाधीनता का

और आलू छीलना, दोनों बराबर हैं।

(१०)

लो शोणित, कुछ नहीं अगर यह आँसू और पसीना,

सपने ही जब धधक उठें तब क्या धरती पर जीना?

सुखी रहो, दे सका नहीं मैं जो कुछ रो-समझा कर,

मिले तुम्हें वह कभी भाइयों-बहनों! मुझे गँवा कर।

(११)

जो कुछ था देय, दिया तुमने, सब लेकर भी

हम हाथ पसारे हुए खड़े हैं आशा में;

लेकिन, छींटों के आगे जीभ नहीं खुलती,

बेबसी बोलती है आँसू की भाषा में।

वसुधा को सागर से निकाल बाहर लाये,

किरणों का बन्धन काट उन्हें उन्मुक्त किया,

आँसुओं-पसीनों से न आग जब बुझ पायी,

बापू! तुमने आखिर को अपना रक्त दिया।

(१२)

बापू! तुमने होम दिया जिसके निमित्त अपने को,

अर्पित सारी भक्ति हमारी उस पवित्र सपने को।

क्षमा, शान्ति, निर्भीक प्रेम को शतशः प्यार हमारा,

उगा गये तुम बीज, सींचने का अधिकार हमारा।

निखिल विश्व के शान्ति-यज्ञ में निर्भय हमीं लगेंगे,

आयेगा आकाश हाथ में, सारी रात जगेंगे।

(१३)

बड़े-बड़े जो वृक्ष तुम्हारे उपवन में थे,

बापू! अब वे उतने बड़े नहीं लगते हैं;

सभी ठूँठ हो गये और कुछ ऐसे भी हैं

जो अपनी स्थितियों में खड़े नहीं लगते हैं।

(१४)

कुर्ता-टोपी फेंक कमर में भले बाँध लो

पाँच हाथ की धोती घुटनों से ऊपर तक,

अथवा गाँधी बनने के आकुल प्रयास में

आगे के दो दाँत डाक्टर से तुड़वा लो।

पर, इतने से मूर्तिमान गाँधीत्व न होता,

यह तो गाँधी का विरूपतम व्यंग्य-चित्र है।

गाँधी तब तक नहीं, प्राण में बहनेवाली

वायु न जबतक गंधमुक्त, सबसे अलिप्त है।

गाँधी तब तक नहीं, तुम्हारा शोणित जब तक

नहीं शुद्ध गैरेय, सभी के सदृश लाल है।

(१५)

स्थान में संघर्ष हो तो क्षुद्रता भी जीतती है,

पर, समय के युद्ध में वह हार जाती है।

जीत ले दिक में “जिना”, पर, अन्त में बापू! तुम्हारी

जीत होगी काल के चौड़े अखाड़े में।

(१६)

एक देश में बाँध संकुचित करो न इसको,

गाँधी का कर्तव्य-क्षेत्र दिक नहीं, काल है।

गाँधी हैं कल्पना जगत के अगले युग की,

गाँधी मानवता का अगला उद्विकास हैं।


अन्वेषी / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना


रोटी को निकले हो? तो कुछ और चलो तुम।

प्रेम चाहते हो? तो मंजिल बहुत दूर है।

किन्तु, कहीं आलोक खोजने को निकले हो

तो क्षितिजों के पार क्षितिज पर चलते जाओ।


कवि / रामधारी सिंह दिनकर कविता रचना

(१)

इतना भी है बहुत, जियो केवल कवि होकर;

कवि होकर जीना यानी सब भार भुवन का

लिये पीठ पर मन्द-मन्द बहना धारा में;

और साँझ के समय चाँदनी में मँडलाकर

श्रान्त-क्लान्त वसुधा पर जीवन-कण बरसाना।

हँसते हो हम पर! परन्तु, हम नहीं चिढ़ेंगे!

हम तो तुम्हें जिलाने को मरने आये हैं।

मिले जहाँ भी जहर, हमारी ओर बढ़ा दो।

(२)

यह अँधेरी रात जो छायी हुई है,

छील सकते हो इसे तुम आग से?

देवता जो सो रहा उसको किसी विध

तुम जगा सकते प्रभाती राग से?

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