Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife जोश मलीहाबादी के क़िस्से

  


बेगम जोश की नाराज़गी

Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जोश को शराब पीने की आदत थी, लिहाज़ा शाम होते ही उनकी बेगम अंदर से पैग बना-बना कर भिजवातीं जिन्हें वो चार घंटे में ख़त्म कर देते और इस काम से फ़ारिग़ हो कर खाना खाते। एक शाम आज़ाद अंसारी भी उनके साथ थे। बेगम जोश को आज़ाद से हद दर्जा कराहत थी और उनकी मौजूदगी से वो सख़्त आज़ुर्दा-ए-ख़ातिर हो रही थीं। जोश के तक़ाज़ों के बाद बेगम ने अंदर से पूरी बोतल बाहर भिजवा दी। जोश साहब सोडा आने के मुंतज़िर रहे। आधा घंटे बाद भी जब सोडा न मिला तो बेगम को बाहर तलब किया। वो बाहर आईं तो जोश साहब ने नर्मी से ये शे’र पढ़ा,


कशती-ए-मय को हुक्म रवानी भी भेज दो

जब आग भेज दी है तो पानी भी भेज दो


बेगम भी शे’र शनास थीं। सुना तो मुस्कराकर मोम हो गईं और बोतल के साथ लवाज़मात भी भेजवा दिये।




फिर किसी और वक़्त मौलाना

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जोश मलीहाबादी एक बार गर्मी के मौसम में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से मुलाक़ात की ग़रज़ से उनकी कोठी पर पहुंचे। वहाँ मुलाक़ातियों का एक जम-ए-ग़फ़ीर पहले से मौजूद था। काफ़ी देर तक इंतज़ार के बाद भी जब मुलाक़ात के लिए जोश साहब की बारी न आई तो उन्होंने उकता कर एक चिट पर ये शे’र लिख कर चपरासी के हाथ मौलाना की ख़िदमत में भेजवा दिया,


नामुनसिब है ख़ून खौलाना

फिर किसी और वक़्त मौलाना


मौलाना ने ये शे’र पढ़ा तो ज़ेर-ए-लब मुस्कुराए और फ़िल-फ़ौर जोश साहब को अंदर तलब कर लिया।




बहरे का चंदा

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

हफ़ीज़ जालंधरी शेख़ सर अब्दुल क़ादिर की सदारत में अंजुमन हिमायत-ए-इस्लाम के लिए चंदा जमा करने की ग़रज़ से अपनी नज़्म सुना रहे थे,


मिरे शेख़ हैं शेख़ अब्दुल क़ादिर

हुआ उनकी जानिब से फ़रमां सादिर

नहीं चाहते हमसुख़न के नवादिर

है मतलूब हमको न गिर्या न ख़ंदा

सुना नज़्म ऐसी मिले जिससे चंदा


जलसे के इख्तिताम पर मुंतज़िम ने बताया कि आज के जलसे में पौने तीन सौ रुपये चंदा जमा हुआ है।


हफ़ीज़ जालंधरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “सब हमारी नज़्म का ए’जाज़ है जनाब!”


“लेकिन हुज़ूर...” मुंतज़िम ने बहुत मतानत से बताया, “दो सौ रुपया एक ऐसे शख़्स ने दिया है जो बहरा है।”




शौहर की गुमराही

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

यूनुस सलीम साहब की अहलिया कराची गईं तो जोश साहब से मिलने के लिए तशरीफ़ ले गईं। जोश साहब ने पहले तो यूनुस साहब की ख़ैर-ओ-आफ़ियत दरियाफ़्त की और उसके बाद कहने लगे कि यूनुस आदमी तो अच्छा है लेकिन आजकल उसमें नुक़्स पैदा हो गया है। एक तो नमाज़ बहुत पढ़ने लगा है और दूसरे अच्छी भली सूरत को दाढ़ी रखकर बिगाड़ रहा है। इस पर बेगम यूनुस ने अर्ज़ किया कि दाढ़ी रखने का मश्वरा तो यूनुस साहब को मैंने ही दिया था। इस पर जोश साहब ने फ़ौरन जवाब दिया कि “आदम को भी तो हव्वा ने ही गुमराह किया था।”




मौलाना पर संगसारी

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

एक मौलाना के जोश मलीहाबादी से बहुत अच्छे ता’ल्लुक़ात थे। कई रोज़ की गैरहाज़िरी के बाद मिलने आए तो जोश साहब ने वजह पूछी,


“क्या बताऊं जोश साहब, पहले एक गुर्दे में पथरी थी, उसका ऑपरेशन हुआ। अब दूसरे गुर्दे में पथरी है।”


“मैं समझ गया।” जोश साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “अल्लाह-तआ’ला आपको अंदर से संगसार कर रहा है।”




रंडी वाला बाग़

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जोश साहब पुल बंगश के जिस मुहल्ले में आकर रहे उसका नाम तक़्सीम-ए-वतन के बाद से नया मुहल्ला पड़ गया था। वहाँ सुकूनत इख़्तियार करने के बाद जोश साहब को मालूम हुआ कि पहले उसका नाम रंडी वाला बाग़ था। बड़ी उदासी से कहने लगे, “क्या बद मज़ाक़ लोग हैं! कितना अच्छा नाम बदल कर रख दिया।”




ऑटोग्राफ़ बुक और अस्तबल

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

बम्बई की एक मा’रूफ़ अदब परवर और बूढ़ी गायिका के यहाँ महफ़िल-ए-मुशायरा मुना’क़िद हो रही थी, जिसमें जोश, जिगर, हफ़ीज़ जालंधरी, मजाज़ और साग़र निज़ामी भी शरीक थे।


मुशायरे के इख्तिताम पर एक दुबली-पतली सी लड़की जिसकी कमसिन आँखें बजाय ख़ुद किसी ग़ज़ल के नमनाक शे’रों की तरह हसीन थीं, एक मुख़्तसर सी ऑटोग्राफ़ बुक में दस्तख़त लेने लगी।


उस जहांदीदा गायिका की मौजूदगी में ये नौ उम्र हसीना ज़िंदगी के एक तज़ाद को निहायत वाज़ेह अंदाज़ में पेश कर रही थी। चुनांचे उस तज़ाद के पेश-ए-नज़र जिगर मुरादाबादी ने ऑटोग्राफ़ बुक में लिखा,


अज़ल ही से चमन बंद मुहब्बत

यही नैरंगियां दिखला रहा है


कली कोई जहाँ पे खिल रही है

वहीं इक फूल भी मुरझा रहा है


और जब हफ़ीज़ साहब की बारी आई तो उन्होंने मासूम लड़की के चेहरे पर एक हसरत भरी निगाह डालते हुए लिखा,


मासूम उमंगें झूल रही हैं दिलदारी के झूले में

ये कच्ची कलियाँ क्या जानें कब खिलना, कब मुरझाना है


इसके बाद ऑटोग्राफ़ बुक दूसरे शायरों के पास से होती हुई जब जोश साहब के सामने आई तो उन्होंने लिखा,


“ऑटोग्राफ़ बुक एक ऐसा अस्तबल है, जिसमें गधे और घोड़े एक साथ बाँधे जाते हैं।”




अदम ये है तो वजूद क्या है?

जोश मलीहाबादी

‘अदम ये है तो वजूद क्या है?


अब्दुल हमीद ‘अदम को किसी साहब ने एक बार जोश से मिलाया।


“आप ‘अदम हैं...!”


‘अदम काफ़ी तन-ओ-तोश के आदमी थे, जोश ने उनके डील-डौल को बग़ौर देखा और कहने लगे, “‘अदम ये है तो वजूद क्या होगा?”




जोश का मुसल्ला और पानी से इस्तिंजा

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

मालिक राम पहली दफ़ा जोश मलीहाबादी साहब से मिलने गए तो जाड़ों का मौसम था। शाम के तक़रीबन छः बजे थे। इतने में क़रीब की मस्जिद से आज़ान की आवाज़ आई तो जोश साहब ने अपने बेटे सज्जाद को आवाज़ दी कि बेटे मेरा मुसल्ला लाना। मालिक राम साहब हैरान हुए कि जोश साहब और नमाज़? इतने में सज्जाद एक बड़े ट्रे में शराब की बोतल, दो गिलास, बर्फ़ और पानी ले आया। जोश साहब ने मालिक राम को पैग पेश किया तो उन्होंने मा’ज़रत की कि मैं शराब नहीं पीता। इस पर जोश साहब ने पूछा कि आप क्या पीते हैं? इस पर मालिक राम साहब ने फ़रमाया कि, “अल्लाह की बनाई हुई नेअ’मत पानी पर इक्तिफ़ा करता हूँ।” और जोश साहब से पूछा कि आप पानी का क्या करते हैं तो जोश ने फ़रमाया कि “पानी से हम तो सिर्फ़ इस्तिंजाॱ करते हैं।”




पठान की नज़्म और सुख की दाद

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

एक बार बम्बई के मुशायरे में जोश मलीहाबादी अपनी तहलका मचा देने वाली नज़्म “गुल-बदनी” सुना रहे थे, बेपनाह दाद मिल रही थी। जब उन्होंने इस नज़्म का एक बहुत ही अच्छा बंद सुनाया तो कँवर महिंदर सिंह बेदी सिहर ने वालिहाना दाद दी और कहा कि “हज़रात मुलाहिज़ा हो, एक पठान इतनी अच्छी नज़्म सुना रहा है।”


इस पर जोश साहिब बोले कि “हज़रात ये भी मुलाहिज़ा हो कि एक सिख इतनी अच्छी दाद दे रहा है।”




तल्ख़-ओ-शीरीं

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

मनमोहन तल्ख़ ने जोश मलीहाबादी को फ़ोन किया और कहा, “मैं तल्ख़ बोल रहा हूँ।”


जोश साहब ने जवाब दिया, “क्या हर्ज है अगर आप शीरीं बोलें।”




ख़्वाहिश-ए-दीदार

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

बम्बई में जोश साहब एक ऐसे मकान में ठहरे जिसमें ऊपर की मंज़िल पर एक अदाकारा रहती थी। मकान की कुछ ऐसी साख़्त थी कि उन्हें दीदार न हो सकता था, लिहाज़ा उन्होंने ये रुबाई लिखी,


मेरे कमरे की छत पे है उस बुत का मकान

जल्वे का नहीं है फिर भी कोई इमकान

जो भूक में हो सर पे उठाए हुए ख़्वान




पिदरी ज़बान में ख़त

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जोश ने पाकिस्तान में एक बहुत बड़े वज़ीर को उर्दू में ख़त लिखा, लेकिन उसका जवाब उन्होंने अंग्रेज़ी में इर्साल फ़रमाया। जवाब-उल-जवाब में जोश ने उन्हें लिखा,


“जनाब-ए-वाला, मैंने तो आपको अपनी मादरी ज़बान में ख़त लिखा था, लेकिन आपने उसका जवाब अपनी पिदरी ज़बान में तहरीर फ़रमाया है।”




मुनाफ़िक़त का एतिराफ़

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

किसी मुशायरे में एक नौ मश्क़ शायर अपना ग़ैर मौज़ूं कलाम पढ़ रहे थे।


अक्सर शोअ’रा आदाब-ए-महफ़िल को मलहूज़ रखते हुए ख़ामोश थे। लेकिन जोश मलीहाबादी पूरे जोश-ओ-ख़रोश से एक एक मिसरे पर दाद-ए-तहसीन की बारिश किए जा रहे थे।


गोपीनाथ अम्न ने टोकते हुए पूछा, “क़िबला! ये आप क्या कर रहे हैं?”


“मुनाफ़क़त...!”


जोश ने बहुत संजीदगी से जवाब दिया और फिर दाद देने में मस्रूफ़ हो गए।




दाढ़ी का कमाल

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जिन दिनों जोश मलीहाबादी हैदराबाद में रिहाइश पज़ीर थे, फ़ानी बदायूनी भी मुस्तक़िलन वहीं रहने लगे थे। एक बार फ़ानी के साहबज़ादे भी हैदराबाद आगए। उन्हें ग़ालिबन हिक्मत से लगाव था और इसी वजह से उन्होंने दाढ़ी रखी थी। उ’मूमन यही होता रहा है कि बाप दाढ़ी रखते हैं और बेटे सफाचट होते हैं, लेकिन यहाँ मुआ’मला उल्टा था। फ़ानी साहब दाढ़ी मुंडवाते थे और उनके साहबज़ादे दाढ़ी रखते थे। एक रोज़ फ़ानी बदायूनी महाराजा किशन प्रशाद के हाँ पहली मर्तबा अपने साहबज़ादे को भी ले गए। फ़ानी से ग़लती ये हुई कि उन्होंने तआ’रुफ़ न कराया जोश भी वहीं थे। यकाय़क बोल उठे, “हुज़ूर फ़ानी साहब के वालिद बुजु़र्गवार भी वतन से तशरीफ़ ले आए हैं।” ये कह कर साहबज़ादे हकीम साहब की तरफ़ इशारा किया। महाराजा प्रशाद सादा-लौह इंसान थे। पहले तो समझ न सके फिर सूरत-ए-हाल जान कर मुस्कुरा कर रह गए।




ग़ज़ल जैसी ज़िंदगी

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

जोश मलीहाबादी एक दिन कँवर महिन्द्र सिंह बेदी साहब के हाँ मुलाक़ात के लिए आए तो कँवर साहब बटेर बाज़ों में घिरे हुए थे। थोड़ी देर के बाद एक और मुलाक़ाती आगया और उसने एक दंगल के सिलसिले में कँवर साहब से कुछ ज़रूरी मश्वरे किए। उसके बाद कँवर साहब एक क़व्वाल से मस्रूफ़ गुफ़्तगू हो गए। इतने में कुछ और लोग आगए और अपने सरकारी कामों के सिलसिले में कँवर साहब से सिफ़ारिशें करने के लिए मिन्नत समाजत करने लगे। इस दौरान में कँवर साहब टेलीफ़ोन के ज़रिए अपने दफ़्तर के हेडक्लर्क को दफ़्तरी कामों के सिलसिले में ज़रूरी हिदायात भी देते रहे। जब इस हुजूम से फ़ारिग़ हो कर कँवर साहब ने जोश साहब से रुजूअ’ किया और उनसे कोई नई नज़्म सुनाने की फ़रमाइश की तो जोश साहब ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया,


“कँवर साहिब! आप नज़्म सुनकर क्या करेंगे। आपकी ज़िंदगी तो ग़ज़ल के मिज़ाज की तरह है जिसके एक शे’र का दूसरे शे’र से कोई ता’ल्लुक़ ही नहीं है।”




हिजड़ा और कोक शास्त्र

जोश मलीहाबादी Josh Malihabadi ke Kisse Llatiife

पंडित हरीचंदा अख़्तर सूफ़ी मनिश होने के बावजूद अह्ल-ए-ख़राबात की रिफ़ाक़त का दम भरते थे।


एक रात जोश मलीहाबादी की क़ियादत में दूसरे मयगुसार शायरों के साथ आप भी एक शराब-ख़ाने में चले गए। उनके अलावा बाक़ी सब हज़रात पीने पिलाने में मसरूफ़ हो गए तो जोश साहब ने यकदम हैरान हो कर अख़्तर साहब की तरफ़ देखते हुए पूछा, “पंडित जी! आप ये क्या पढ़ रहे हैं?”


“बार का मीनू देख रहा हूँ साहब!” अख़्तर साहब ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “कम से कम शराब की क़िस्मों और उनकी क़ीमतों से तो वाक़िफ़ हो जाऊं।”


“हूँ...” जोश साहब ने व्हिस्की के घूँट हलक़ से उतारते हुए कहा, “बार का मीनू पढ़ते हुए आप ऐसे मालूम हो रहे हैं जैसे कोई हिजड़ा कोक शास्त्र पढ़ रहा हो।”

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जोश मलीहाबादी

जोश (1949)
जोश (1949)
जन्मशब्बीर हसन खान
5 दिसंबर 1898 मलिहाबाद , उत्तर-पश्चिमी प्रांत , ब्रिटिश भारत
मृत22 फरवरी 1982 (आयु 83)
इस्लामाबाद , पाकिस्तान
पेशाकवि
राष्ट्रीयतापाकिस्तानी
शिक्षाविश्वभारती विश्वविद्यालय
साहित्यिक आंदोलनप्रगतिशील लेखक आंदोलन
उल्लेखनीय पुरस्कार
अन्य नामोंशायर-ए-इंकलाब

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