Asrarul Haq Majaz ke kisse latife असरार-उल-हक़ मजाज़

  बस एक ही बुरी आदत है, साहब!

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife फ़िल्मी अख़बार के एडिटर मजाज़ से इंटरव्यू लेने के लिए मजाज़ के होटल पहुँच गए... उन्होंने मजाज़ से उनकी पैदाइश, उम्र, तालीम और शायरी वग़ैरा के मुताल्लिक़ कई सवालात करने के बाद दबी ज़बान में पूछा, “मैंने सुना है क़िबला, आप शराब बहुत ज़्यादा पीते हैं। आख़िर इसकी क्या वजह है?” “किस नामाक़ूल ने आप से ये कहा कि मैं शराब पीता हूँ।” मजाज़ ने कहा। “तो फिर आप सिगरेट कसरत से पीते होंगे?” “नहीं मैं सिगरेट भी नहीं पीता, शराबनोशी और सिगरेट नोशी दोनों ही बुरी आदतें हैं और मैं ऐसी किसी बुरी आदत का शिकार नहीं।” मजाज़ ने जवाब दिया। एडिटर ने संजीदा लहजे में पूछा, “तो आप में कोई बुरी आदत नहीं है?” मजाज़ ने उतनी ही संजीदगी से जवाब दिया, “मुझमें सिर्फ़ एक ही बुरी आदत है... कि मैं झूट बहुत बोलता हूँ।”

अहमक़ों की आमद

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ तन्हा काफ़ी हाउस में बैठे थे कि एक साहब जो उनके रुशनास नहीं थे, उनके साथ वाली कुर्सी पर आ बैठे। काफ़ी का आर्डर देकर उन्होंने अपनी कनसुरी आवाज़ में गुनगुनाना शुरू किया, अहमक़ों की कमी नहीं ग़ालिब एक ढूंढ़ो हज़ार मिलते हैं मजाज़ ने उनकी तरफ़ देखते हुए कहा, “ढ़ूढ़ने की नौबत ही कहाँ आती है हज़रत, ख़ुद ब ख़ुद तशरीफ़ ले आते हैं।”

मजाज़, शराब, औरत और क़द्र-दान

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ से किसी ने पूछा, “मजाज़ साहब, आपको औरतों ने खाया या आपके क़द्र-दानों ने, या शराब ने?” शराब का गिलास मुँह से लगाते हुए मजाज़ बोले, “हमने सबको बराबर का हिस्सा दिया है।”

अमाँ सदर जाओगे?

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife रात का वक़्त था। मजाज़ किसी मयख़ाने से निकल कर यूनीवर्सिटी रोड पर तरंग में झूमते हुए चले जा रहे थे। इसी बीच उधर से एक ताँगा गुज़रा। मजाज़ ने उसे आवाज़ दी। ताँगा रुक गया। आप उसके क़रीब आए और लहरा कर बोले, “अमाँ सदर जाओगे?” “हाँ जाऊँगा।” “अच्छा तो जाओ।” कह कर मजाज़ लुढ़कते हुए आगे बढ़ गए।

राजा महमूदाबाद की नसीहत और मजाज़ का जवाब

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक बार राजा महमूदाबाद ने मजाज़ को नसीहत करते हुए बड़े प्यार से समझाया, “देखो मियां! अगर तुम शराब पीना छोड़ दो तो मैं तुम्हारे गुज़ारे के लिए चार सौ रुपये माहवार वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दूंगा।” मजाज़ ने बड़े अदब से जवाब दिया, “मगर राजा साहब, ये तो सोचिए कि अगर मैं शराब ही पीना छोड़ दूँ तो फिर चार सौ रूपों का क्या करूँगा?”

जोश की घड़ी मजाज़ का घड़ा

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife जोश मलीहाबादी आमतौर पर शराब पीते वक़्त टाइम पीस सामने रख लेते और हर पंद्रह मिनट के बाद नया पैग बनाते थे लेकिन ये पाबंदी अक्सर तीसरे चौथे पैग के बाद “नज़र-ए-जाम” हो जाती थी। एक सोहबत में उन्होंने पहला पैग हलक़ में उंडेलने के बाद अपने टाइम पीस की तरफ़ इशारा करते हुए मजाज़ से कहा, “देखो मजाज़, मैं कितनी बाक़ाएदगी से शराब पीता हूँ। अगर तुम भी घड़ी सामने रखकर पिया करो, तो बद एहतियाती से महफ़ूज़ रहोगे।” मजाज़ उसी वक़्त चहकते हुए बोले, “घड़ी तो क्या जोश साहब, मेरा बस चले तो घड़ा सामने रखकर पिया करूँ।”

इक़बाल की रूह को तकलीफ़

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife किसी जलसे में सरदार जाफ़री इक़बाल की शायरी पर गुफ़्तगू कर रहे थे। इधर-उधर की बातों के बाद जब सरदार ने ये इन्किशाफ़ किया कि इक़बाल बुनियादी तौर पर इश्तिराकी नुक़्ता-ए-नज़र के शायर थे तो मजमे में से कोई “मर्द-ए-मोमिन” चीख़ते हुए बोला, “जाफ़री साहब, आप ये क्या कुफ़्र फ़र्मा रहे हैं। शायर-ए-मशरिक़ और इश्तिराकियत ला-हौल वला क़ुव्वा। आप अपनी इस ख़ुराफ़ात से इक़बाल की रूह को तकलीफ़ पहुंचा रहे हैं।” जलसे की पहली सफ़ों से मजाज़ फुलझड़ी की तरह छुटते हुए बोले, “हज़रत! तकलीफ़ तो आपकी अपनी रूह को पहुँच रही है जिसे आप ग़लती से इक़बाल की रूह समझ रहे हैं।”

ये नक़्श-ए-फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife किसी मुशायरे में मजाज़ अपनी ग़ज़ल पढ़ रहे थे। महफ़िल पूरे रंग पर थी और सुनने वाले ख़ामोशी के साथ कलाम सुन रहे थे, कि इतने में किसी ख़ातून की गोद में उनका शीर-ख़्वार बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। मजाज़ ने अपनी ग़ज़ल का शे’र अधूरा छोड़ते हुए हैरान हो कर पूछा, “भई, ये नक़्श-ए-फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का।”

बाप का बिगड़ना

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife शौकत थानवी ने एक दफ़ा मजाज़ के वालिद की बड़ी तारीफ़ की, मगर साथ ही ये भी कह दिया कि, “मजाज़ को शराबनोशी की बुरी आदत पड़ गयी है, किसी तरह ये आदत उनसे छुड़वाइए।” ये ख़बर जब मजाज़ तक पहुंची तो बहुत ख़फ़ा हुए और उनसे कहा, “या मुझसे दोस्ती रखिए या मेरे वालिद साहब से। ब-यक वक़्त बाप-बेटे से दोस्ती रखने में बेटा तो बेटा, बाप तक के बिगड़ जाने का ख़तरा है।”

हैदराबादी का ‘क़’

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife हैदराबाद दक्कन में “क़ाफ़” की जगह आम तौर पर लोग “खे़” बोलते हैं। किसी हैदराबादी ने मजाज़ को एक दावत पर मदऊ करते हुए कहा, “मजाज़ साहब!,कल मेरी फ़ुलां अ’ज़ीज़ा की तख़रीब (तक़रीब) है। ग़रीब-ख़ाने पर तशरीफ़ लाइए।” मजाज़ ने ख़ौफ़-ज़दा हो कर जवाब दिया, “नहीं साहब, मुझसे ये दर्दनाक मंज़र नहीं देखा जा सकेगा।”

शराब से तौबा

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife जिगर मुरादाबादी ने निहायत हमदर्दाना अंदाज़ में शराब की ख़राबियाँ बयान करते हुए मजाज़ से कहा, “मजाज़ शराब वाक़ई ख़ाना-ख़राब है। ख़ुम के ख़ुम लुंढाने के बाद अंजाम-कार मुझे तौबा ही करनी पड़ी। मैं तो दुआ’ करता हूँ कि ख़ुदा तुम्हें तौफ़ीक़ दे कि तुम भी मेरी तरह तौबा कर सको।” मजाज़ ये सुनकर निहायत मासूमियत से कहने लगे, “जिगर साहब, आपने तो एक बार तौबा की लेकिन मैं सैंकड़ों बार तौबा कर चुका हूँ।”

साग़र का अँगूठा

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक मुशायरे के इख्तिताम पर जब साग़र निज़ामी को असल तय-शुदा मुआवज़े से कम रक़म दी गई और उसकी रसीद उनके सामने रखी गई तो वो उसे देखते ही एक दम फट पड़े, “मैं इस पर दस्तख़त नहीं कर सकता।” इतने में मजाज़ वहाँ आए। उन्होंने ये जुमला सुना तो निहायत मासूमियत से मुंतज़िम को मशवरा देने लगे, “अगर दस्तख़त नहीं कर सकते तो साग़र साहब से अँगूठा ही लगवा लीजिए।”

ख़ालिस ‘ज़बान’ के शे’र

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक बार दिल्ली में एक मुशायरा हो रहा था, मजाज़ लखनवी भी मौजूद थे। दिल्ली के एक मुअ’म्मर शायर जब कलाम सुनाने लगे तो कहा, “हज़रात मैं दिल्ली के क़िला-ए-मुअल्ला की ज़बान में शे’र अर्ज़ करता हूँ।” उनके दाँत बनावटी थे। चुनांचे एक दो शे’र सुनाने के बाद जब ज़रा जोश में आकर पढ़ना चाहा तो मस्नूई दाँत निकल कर स्टेज पर गिर पड़े। मजाज़ फ़ौरन बोले कि हज़रात पहले तो आप क़िला-ए-मुअल्ला की ज़बान के शे’र सुन रहे थे। अब ‘ख़ालिस ज़बान’ के शे’र सुनिए।

मजलिस-ए-वा’ज़ में मजाज़

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ अपनी नीम दीवानगी की हालत में एक-बार किसी मजलिस-ए-वा’ज़ में पहुँच गए। उनके किसी जानने वाले ने हैरत-ज़दा हो कर पूछा, “हज़रत मजाज़, आप और यहाँ?” “जी हाँ।” मजाज़ ने बहुत संजीदगी से जवाब दिया, “आदमी को बिगड़ते क्या देर लगती है भाई।”

नक़्क़ादों पर लानत!

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife

“मैं मुतवातिर कई सालों से शे’र कह रहा हूँ और उर्दू शायरी में कामयाब तजरबे कर चुका हूँ। मेरे मुतअद्दिद मंजूम शाहकार उर्दू अदब में एक तारीख़ी इज़ाफे़ की हैसियत रखते हैं। लेकिन इसके बावजूद जब ये नक़्क़ाद हज़रात उर्दू शायरों का जाइज़ा लेते हैं तो मुझे नज़र अंदाज कर देते हैं।” सलाम मछली-शहरी ने बहुत ही जज़्बाती अंदाज़ में उदास हो कर मजाज़ से गिला करते हुए कहा, “तुम कोई ग़म न करो डियर सलाम।” मजाज़ ने उसे ढारस देते हुए कहा, “तुम्हारी एक एक नज़्म दुनियाभर की कई ज़बानों जैसे रूसी, चीनी, जापानी, अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी में तर्जुमा की जाएगी और फिर...” “और फिर...?” “और फिर...” मजाज़ के चेहरे पर मुस्कुराहट की झालर सी तन गई। “और फिर मैं उन ज़बानों से तुम्हारी नज़्मों का उर्दू ज़बान में तर्जुमा करूँगा... और फिर ये दुनियाए अदब और ये तमाम नक़्क़ाद तुम्हारे सही मर्तबा और अ’ज़मत को तस्लीम करेंगे।”

मजाज़ का वुज़ू

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक अदब नवाज़ मजिस्ट्रेट ने मजाज़ को बस्ती आने की दावत दी। मजाज़ ने कहा, “कुछ काम की बात भी होगी।” उसने जवाब दिया, “तुम आओ तो नहला दूंगा।” मजाज़ मुस्कुरा कर बोले, “ख़ैर वहाँ तो नहला दोगे। यहाँ कम-अज़-कम वुज़ू तो करवा ही दो।”

हिन्दुस्तान के आम, रूस के अवाम

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife आमों की एक दावत में आम चूसते-चूसते सरदार जाफ़री ने मजाज़ से कहा, “कैसे मीठे आम हैं मजाज़, रूस में और हर चीज़ मिल जाती है लेकिन ऐसे मीठे आम वहाँ कहाँ।” “रूस में आमों की क्या ज़रूरत है?” मजाज़ ने बिला ताम्मुल जवाब दिया, “वहाँ अ’वाम जो हैं।”

मजाज़ के कबाब, फ़िराक़ का गोश्त

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ और फ़िराक़ के दरमियान काफ़ी संजीदगी से गुफ़्तगू हो रही थी। एक दम फ़िराक़ का लहजा बदला और उन्होंने हंसते हुए पूछा, “मजाज़ तुमने कबाब बेचने क्यों बंद कर दिए?” “आपके यहाँ से गोश्त आना जो बंद हो गया।” मजाज़ ने अपनी संजीदगी को बरक़रार रखते हुए फ़ौरन जवाब दिया।

मारवाड़ी सेठ और मजाज़ का तख़ल्लुस

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ बम्बई में थे। किसी मारवाड़ी सेठ ने जो मजाज़ से ग़ाइबाना अक़ीदत रखता था, मजाज़ से मुलाक़ात की और चलते वक़्त बड़े तकल्लुफ़ के साथ पूछा, “मजाज़ साहब माफ़ कीजिएगा, क्या मैं आपका तख़ल्लुस पूछ सकता हूँ?” मजाज़ ने गर्दन झुका कर चुपके से कहा, “इसरार-उल-हक़।”

गरेबाँ और चाक-ए-गरेबाँ

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife “इस्मत चुग़्ताई! तुम लखनऊ से मेरे लिए दो चीज़ें लाना मत भूलना। एक तो कुरते दूसरे मजाज़।” इस्मत लखनऊ में मजाज़ से मिलीं तो शाहिद लतीफ़ की फ़रमाइश दोहरा दी। मजाज़ ने जवाब दिया, “अच्छा गरेबाँ और चाक-ए-गरेबाँ दोनों को मंगवाया है।”

मजाज़, शायर नहीं लतीफ़ा बाज़!

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक बार किसी अदीब ने मजाज़ से कहा, “मजाज़ साहब, इधर आपने शे’रों से ज़्यादा लतीफ़े कहने शुरू कर दिए हैं।” “तो इसमें घबराने की क्या बात है?” और वो अदीब मजाज़ की इस बात पर वाक़ई घबराते हुए कहने लगा, “इसका मतलब ये होगा कि जब किसी मुशायरे में आप शे’र सुनाने के लिए खड़े होंगे तो लोग कहेंगे, शे’र नहीं अपने लतीफ़े सुनाइए।” “तो मैं उनसे कहूँगा”, मजाज़ ने निहायत सफ़ाई और सादगी से कहा, “कि शायरी भी तो फुनून-ए- लतीफ़ा में से है।”

कार में अर्श और मुअल्ला

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife लखनऊ के किसी मुशायरे में शरीक होने के लिए जब जोश मलीहाबादी कार से वहाँ पहुंचे तो मुशायरा-गाह के गेट ही पर मजाज़ ख़ैर-मक़दम के लिए मौजूद थे। जोश साहब कार से निकले तो मजाज़ ने निहायत नियाज़-मंदी से हाथ मिलाया। उसके बाद अर्श मलसियानी भी उसी कार से बाहर आए तो मजाज़ बोले, “आ हाहाहा, अर्श भी।” इतने में मौलाना बिस्मिल शाहजहाँपुरी ने भी अपना भारी भरकम व बा रेश चेहरा कार की खिड़की से बाहर निकाला तो मजाज़ ने खिलखिलाते हुए उसी सांस में जुमला मुकम्मल कर दिया, “और मुअ’ल्ला भी।”

घड़ी साज़ महबूबा

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife मजाज़ एक मुशायरे में नज़्म सुनाने के लिए खड़े हुए। बम्बई के एक सेठ जो उनके परस्तार थे, उनके ज़ेह्न में मजाज़ की नज़्म ‘नर्स’ का ये मिसरा था मगर नज़्म का उनवान याद न था। ‘कभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वो’ चुनांचे सेठ साहब ने फ़रमाइश करते हुए कहा, “मजाज़ साहब, अपनी वो नज़्म सुनाइए, Error fetching the page: Invalid URL '': No scheme supplied. Perhaps you meant https://?‘घड़ी सोज़ थी वो घड़ी साज़ थी वो’ मजाज़ ने मुस्कुराकर कहा, “हज़रात, नज़्म का उनवान है घड़ीसाज़ और नर्स।” और फिर क़हक़हों के दरमियान नज़्म सुनाना शुरू कर दी।

बम्बई ड्राई है

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक बार हैदराबाद में मजाज़ और फ़िराक़ दोनों एक साथ ठहरे हुए थे। फ़िराक़ ने मजाज़ से मशवरे के अंदाज़ में कहा, “बम्बई चले जाओ, तुम्हारे गीत फ़िल्म वाले बड़ी क़ीमत देकर ख़रीदेंगे।” मजाज़ कहने लगे, “बम्बई में रुपये किस काम आएंगे?” फ़िराक़ ने हैरत-ज़दा हो कर पूछा, “क्या मतलब?” मजाज़ ने कहा, “बम्बई ड्राई है।”

हिन्दुस्तान का एडिटर

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife ज़हरा अंसारी से एक बार मजाज़ ने हयात उल्लाह अंसारी का तआरुफ़ कराया। उस ज़माने में हयात उल्लाह अंसारी साहब “हिंदुस्तान” के एडिटर थे। मजाज़ ने कहा, “आप ‘हिंदुस्तान’ के एडिटर हैं।” ज़हरा ने ज़ोर दे कर कहा, “अच्छा, आप हिंदुस्तान के एडिटर हैं?” मजाज़ को मौक़ा मिल गया बोले, “अगर आप कातिब समझ रही थीं तो ये आपकी भूल थी।”

अदीबों की पज़ीराई

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife

1949 ई. का ज़िक्र है, जब हुकूमत तरक़्क़ी-पसंद अदीबों को यके बाद दीगरे सरकारी मेहमान बना रही थी। अली जव्वाद ज़ैदी ने मजाज़ से फ़रमाया, “हमारी हुकूमत अदीबों से बड़ा तआ’वुन कर रही है। उनके लिए एक अच्छी सी कॉलोनी बनाने की सोच रही है।” “सेंट्रल जेल में या डिस्ट्रिक्ट जेल में।” मजाज़ ने जुमला पूरा किया।

शेर से पहले शराब शेर के बाद भी शराब

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife एक मुशायरे में मजाज़ जब अपनी नीम बेहोशी के आलम में भी अपनी नज़्म, बोल री ओ धरती बोल राज-सिंघासन डाँवावाँडोल बड़ी कामयाबी के साथ पढ़ चुके तो हंसराज रहबर ने छेड़ते हुए कहा, “मजाज़ भाई, क्या ये नज़्म तुमने शराब पी कर कही थी?” “बल्कि कहने के बाद भी पी ली थी।” मजाज़ ने तुर्की ब तुर्की जवाब दिया।

शायर-ए-आज़म का इस्तिक़बाल

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife जोश मलीहाबादी सफ़र पर जा रहे थे। स्टेशन पहुंचे तो उनकी गाड़ी छूटने ही वाली थी। मजाज़ और दूसरे शायर उन्हें ख़ुदा-हाफ़िज़ कहने के लिए पहले से प्लेटफार्म पर रेलवे बुक स्टाल के सामने खड़े हुए थे कि अचानक जोश साहब तेज़ी से मुस्कुराते हुए गुज़र गए। इस पर एक शायर ने कहा, “इतना अ’ज़ीम शायर अगर किसी और मुल्क में होता तो आज उसके चाहने वाले क़तार दर क़तार स्टेशन पर उसको अलविदा कहने के लिए आते और हर शख़्स अपने महबूब शायर से हाथ मिलाने की सआदत हासिल करता।” मजाज़ ने बात काटते हुए कहा, “और इसी दौरान में शायर-ए-आ’ज़म की गाड़ी दूसरे स्टेशन तक पहुंच चुकी होती।”

मय का ग़र्क़-ए-दफ़्तर होना

Asrarul Haq Majaz ke kisse latife लखनऊ का एक अच्छा होटल जहाँ मजाज़ कभी-कभी शराबनोशी के लिए जाया करते थे, बंद हो गया। कुछ दिनों बाद मालूम हुआ कि उसकी इमारत में कोई सरकारी दफ़्तर खोला जा रहा है। ये सुनकर मजाज़ से न रहा गया, कहने लगे, “सुनते हैं पहले ज़माने में दफ़्तर-ए-बेमानी को ग़र्क़-ए-मयनाब कर दिया जाता था और अब बेमानी दफ़्तरों में मयनाब ग़र्क़ हो जाती है।”

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    असरारुल हक़ मजाज़

    असरारुल हक़ मजाज़ (१९११-१९५५) उर्दू के प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े रोमानी शायर के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं। लखनऊ से जुड़े होने से वे 'मजाज़ लखनवी' के नाम से भी प्रसिद्ध हुए। आरंभिक उपेक्षा के बावजूद कम लिखकर भी उन्होंने बहुत अधिक प्रसिद्धि पायी।


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