उद्धव-शतक : जगन्नाथदास 'रत्नाकर' : Udhav Shatak Jagannath Ratnakar Rachit
मंगलाचरण / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जासौं जाति विषय-विषाद की विवाई बेगि
चोप-चिकनाई चित चारु गहिबौ करै ।
कहै रतनाकर कवित्त-बर-व्यंजन मैं
जासौ स्वाद सौगुनौ रुचिर रहिबौ करै॥
जासौं जोति जागति अनूप मन-मंदिर मैं
जड़ता-विषम-तम-तोम-दहिबौ करै ।
जयति जसोमति के लाड़िले गुपाल, जन
रावरी कृपा सौं सो सनेह लहिबौ करै॥
न्हात जमुना मैं जलजात एक दैख्यौ जात / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
न्हात जमुना मैं जलजात एक दैख्यौ जात
जाको अध-उरध अधिक मुरझायौ है ।
कहै रतनाकर उमहि गहि स्याम ताहि
बस-बासना सों नैंकु नासिका लगायो हैं ॥
त्यौं हीं कछु घूमि झूमि बेसुध भये कै हाय
पाय परे उखरि उभाय मुख छायौ है ।
पाए घरी द्वैक मैं जगाइ ल्याइ ऊधौ तीर
राधा-नाम कीर जब औचक सुनायौ है ॥1॥
आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध
डग-मग पाय मग धरत धराये हैं ।
कहै रतनाकर न बूझैं कछु बोलत औ,
खोलत न नैन हूँ अचैन चित छाए हैं ॥
पाइ बहै कंच मैं सुगंध राधिका को मंजु
ध्याए कदली-बन मतंग लौ मताये हैं।
कान्ह गये जमुना नहान पै नए सिर सौं
नीकै तहाँ नेह का नदी मैं न्हाइ आए हैं ॥२॥
देखि दूरि ही तैं दौरि पौरि लगि भेंटि ल्याइ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
देखि दूरि ही तैं दौरि पौरि लगि भेंटि ल्याइ,
आसन दै साँसनि समेटि सकुचानि तैं ।
कहै रतनाकर यौं गुनन गुबिंद लागे,
जौलौं कछू भूले से भ्रमे से अकुलानि तैं ॥
कहा कहैं ऊधौ सौं कहैं हूँ तो कहाँ लौं कहैं,
कैसे कहैं कहैं पुनि कौन सी उठानि तैं ।
तौलौं अधिकाई तै उमगि कंठ आइ भिंचि,
नीर ह्वै बहन लागी बात अँखियानि तैं ॥3||
विरह-बिथा की कथा अकथ अथाह महा / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
विरह-बिथा की कथा अकथ अथाह महा,
कहत बनै न जो प्रबीन सुकबीनि सौं ।
कहैं रतनाकर बुझावन लगे ज्यौं कान्ह,
ऊधौ कौं कहन-हेतु ब्रज-जुवतीनि सौं ॥
गहबरि आयौ गरौ भभरि अचानक त्यौं,
प्रेम परयौ चपल चुचाइ पुतरीनि सौं ।
नैंकु कही बैननि, अनेक कही नैननि सौं,
रही-सही सोऊ कहि दीनी हिचकीनिं सौं ॥4॥
चलत न चारयौ भाँति कोटिनि बिचारयौ तऊ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चलत न चारयौ भाँति कोटिनि बिचारयौ तऊ,
दाबि दाबि हारयौ पै न टारयौ टसकत है ।
परम गहीली बसुदेव-देवकी की मिली,
चाह-चिमटी हूँ सौं न खैंचौं खसकत है ॥
कढ़त न काढ़्यौ हाय बिथके उपाय सबै,
धीर-आक-छीर हूँ न धारैं धसकत है ।
ऊधौ ब्रज-बास के बिलासनि कौ ध्यान धँस्यौ,
निसि-दिन काटैं लौं करेजें कसकत है ॥6॥
रूप-रस पीवत अघात ना हुते जो तब / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
रूप-रस पीवत अघात ना हुते जो तब,
सोई अब आँस ह्वै उबरि गिरिबौ करैं ।
कहै रतनाकर जुड़ात हुते देखैं जिन्हें,
याद किएँ तिनकौं अँवां सौं घिरिबौ करैं ॥
दिननि के फेर सौं भयो है हेर-फेर ऐसौ,
जाकौं हेरि-फेरि हेरिबौई हिरिबौ करैं ।
फिरति हुते हु जिन कुंजन में आठौं जाम,
नैननि मैं अब सोई कुंज फिरिबौ करैं ॥7॥
गोकुल की गैल-गैल गोप ग्वालिन कौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
गोकुल की गैल-गैल गोप ग्वालिन कौ,
गोरस के काज लाज-बस कै बहाइबौ ।
कहैं रतनाकर रिझाइबो नवेलिनि कौं,
गाइबौ गवाइबौ औ नाचिबौ नचाइबौ ॥
कीबौं स्रमहार मनुहार कै बिबिध विधि,
मोहिनी मृदुल मंजु बाँसुरी बजाइबौ ।
ऊधौ सुख-संपति-समाज ब्रज-मंडल के,
भूलैं हूँ न भूलै, भूलैं हमकौं भुलाइबौ ॥8॥
मोर के पखौवनि को मुकुट छबीलौ छोरि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
मोर के पखौवनि को मुकुट छबीलौ छोरि,
क्रीट मनि-मंडित घराइ करिहैं कहा ।
कहै रतनाकर त्यौं माखन सनेही बिनु,
षट रस व्यंजन चबाइ करिहैं कहा ॥
गोपी ग्वाल बालनि कौं झोंकि बिरहानल मैं,
हरि सुर बृंद की बलाइ करिहैं कहा ।
प्यारौ नाम गोबिंद गुपाल कौ बिहाइ हाय,
ठाकुर त्रिलोक के कहाइ करिहैं कहा ॥9॥
कहत गुपाल माल मंजुमनि पुंजनि की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कहत गुपाल माल मंजुमनि पुंजनि की,
गुंजनि की माला की मिसाल छवि छावै ना ।
कहै रतनाकर रतन मैं किरीट अच्छ,
मोर-पच्छ-अच्छ-लच्छ असहू सु-भावै ना ॥
जसुमति मैया की मलैया अरु माखन कौ,
कामधेनु गोरस हूँ गूढ़ गुन आवै ना ।
गोकुल की रज के कनूका औं तिनूका सम,
संपति त्रिलोक की बिलोकन मैं आवै ना ॥10॥
राधा मुख-मंजुल सुधाकर के ध्यान ही सौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
राधा मुख-मंजुल सुधाकर के ध्यान ही सौं,
प्रेम रतनाकर हियैं यौं उमगत है ।
त्यौं ही बिरहातप प्रचंड सौं उमंडि अति,
उरध उसास कौ झकोर यौं जगत है ॥
केवट विचार कौ बिचारौं पचि हारि जात,
होत गुन-पाल ततकाल नभ-गत है ॥
करत गँभीर धीर लंगर न काज कछू,
मन कौ जहाज डगि डूबन लगत है ॥11॥
सील सनी सुरुचि सु बात चलै पूरब की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सील सनी सुरुचि सु बात चलै पूरब की,
औरे ओप उमगी दृगनि मिदुराने तैं ।
कहै रतनाकर अचानक चमक उठी,
उर घनश्याम कैं अधीर अकुलाने तैं ॥
आसाछन्न दुरदिन दीस्यौ सुरपुर माँहिं,
ब्रज में सुदिन बरि बूँद हरियाने तैं,
नीर कौ प्रवाह कान्ह नैननि कैं तीर बह्यै,
धीर बह्यै ऊधौ उर अचल रसाने तैं ॥12॥
प्रेम-भरी कातरता कान्ह की प्रगट होत / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रेम-भरी कातरता कान्ह की प्रगट होत,
ऊधव अवाइ रहे ज्ञान-ध्यान सरके ।
कहै रतनाकर धरा कौं धीर धूरि भयौ,
भूरि भीति भारनि फनिंद-फन करके ॥
सुर सुर-राज सुद्ध-स्वारथ-सुभाव सने,
संसय समाये धाए धाम विधि हर के ।
आइ फिरि ओप ठास-ठाम ब्रज-गामनि के,
बिरहिनि बामनि के बाम अंग फरके ॥13॥
हेत खेत माँहि खोदि खाईं सुद्ध स्वारथ की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
हेत खेत माँहि खोदि खाईं सुद्ध स्वारथ की,
प्रेम-तृन गोपिं राख्यौ तापै गमनौ नहीं ।
करनी प्रतीति-काज करनी बनावट की,
राखी ताति हेरि हियँ हौंसनि सनौ नहीं ॥
घात में लगे हैं ये बिसासी ब्रजवासी सबै,
इनके अनोखै छल-छंदनि छनौ नहीं ।
बारनि कितेक तुम्हें बारनि कितेक करैं,
बारन उबारन ह्वै बारन बनौ नहीं ॥14॥
पाँचौ तत्व माहिं एक तत्व ही की सत्ता सत्य / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
पाँचौ तत्व माहिं एक तत्व ही की सत्ता सत्य,
याही तत्त्व-ज्ञान कौ महत्व स्रुति गायौ है ।
तुम तौ बिवेक रतनाकर कहौ क्यों पुनि,
भेद पंचभौतिक के रूप में रचायौ है ॥
गोपिनि मैं, आप मैं बियोग औ’ संयोग हूँ मैं,
एकै भाव चाहिये सचोप ठहरायौ है ।
आपु ही सौं आपु कौ मिलाप औ’ बिछोह कहा,
मोह यह मिथ्या सुख दुख सब ठायौ है ॥15॥
दिपत दिवाकर कौं दीपक दिखावै कहा / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
दिपत दिवाकर कौं दीपक दिखावै कहा,
तुम सन ज्ञान कहा जानि कहिबौ करैं ।
कहै रतनाकर पै लौकिक लगाव मानि,
परम अलौकिक की थाह थहिबौ करैं ॥
असत असार या पसार मैं हमारी जान,
जन भरमाये सदा ऐसैं रहिबौ करैं ।
जागत और पागत अनेक परपंचनि मैं,
जैसें सपने मैं अपने कौं लहिबौ करैं ॥16॥
हा! हा! इन्हैं रोकन कौं टोक न लगावौ तुम / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
हा! हा! इन्हैं रोकन कौं टोक न लगावौ तुम,
बिसद-बिबेक ज्ञान गौरव-दुलारे ह्वै ।
प्रेम रतनाकर कहत इमि ऊधव सौं,
थहरि करेजौ थामि परम दुखारे ह्वै ॥
सीतल करत नैंकु हीतल हमारौ परि,
बिषम-बियोग-ताप-समन पुचारे ह्वै ।
गोपिनि के नैन-नीर ध्यान-नलिका ह्वै धाइ,
दृगनि हमारै आइ छूटत फुहारे ह्वै ॥17॥
प्रेम-नेम निफल निवारि उर-अंतर तैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रेम-नेम निफल निवारि उर-अंतर तैं,
ब्रह्मज्ञान आनंद-निधान भरि लैहैं हम ।
कहै रतनाकर सुधाकर-मुखीन-ध्यान,
आँसुनि सौ धोइ जोति जोइ जरि लैहै हम ॥
आवो एक बार धारि गोकुल-गलि की धूरि,
तब इहिं नीति को प्रतीत धरि लैहैं हम ।
मन सौं, करेजै सौं, स्रवन-सिर आँखिनि सौं,
ऊधव तिहारी सीख भीख करि लैं ह्वैं हम ॥18॥
बात चलैं जिनकी उड़ात धीर धूरि भयौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
बात चलैं जिनकी उड़ात धीर धूरि भयौ,
ऊधौ मंत्र फूँकन चले हैं तिन्हें ज्ञानी ह्वै ।
कहै रतनाकर गुपाल के हिये मैं उठी,
हूक मूक भायनि की अकह कहानी ह्वै ॥
गहबर कंठ ह्वै न कढ़न संदेश पायौ,
नैन मग तौलौं आनि बैंन अगवानी ह्वै ।
प्राकृत प्रभाव सौ पलट मनमानी पाइ,
पानी आज सकल संवारयौ काज बांनी ह्वै ॥19॥
ऊधव कैं चलत गुपाल उर माहिं चल / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ऊधव कैं चलत गुपाल उर माहिं चल,
आतुरी मची सो परै कही न कबीनि सौं ।
कहै रतनाकर हियौ हूँ चलिबै कौ संग,
लाख अभिलाख लै उमहि बिकलीनि सौं ॥
आनि हिचकी ह्वै गरै बीच सकस्यौई परै,
स्वेद ह्वैं रस्यौई परै रोम झंझारीनि सौं ।
आनन दुवार तैं उसास ह्वै बढ़्यौई परै,
आँसू ह्वै कढ़्यौई परै नैन खिरकीनि सौं ॥20॥
आइ ब्रज-पथ रथ ऊधौ कौं चढ़ाइ कान्ह / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आइ ब्रज-पथ रथ ऊधौ कौं चढ़ाइ कान्ह,
अकथ कथानि की व्यथा सौं अकुलात हैं ।
कहै रतनाकर बुझाइ कछु रोकै पाय,
पुनि कछु ध्यान उर धाइ उरझात हैं ॥
उसीस उसांसनि सौं बहि बहि आंसनि सौं,
भूरि भरे हिय के हुलास न उरात हैं ।
सीरे तपे विविध संदेसनि सो बातनि की,
घातनि की झोंक मैं लगेई चले जात हैं ॥21॥
लै कै उपदेश-औ-संदेस पन ऊधौ चले / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
लै कै उपदेश-औ-संदेस पन ऊधौ चले,
सुजस-कमाइबैं उछाह-उदगार मैं ।
कहै रतनाकर निहारि कान्ह कातर पै,
आतुर भए यौं रह्यौ मन न सँभार मैं ॥
ज्ञान-गठरी की गाँठि छरकि न जान्यौ कब,
हरैं-हरैं पूँजी सब सरकि कछार मैं ।
डार मैं तमालनि की औअर कछु बिरमानी अरु,
कछु अरुझानी है करीरनि के झार मैं ॥22॥
हरैं-हरैं ज्ञान के गुमान घटि जानि लगे / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
हरैं-हरैं ज्ञान के गुमान घटि जानि लगे,
जोग के विधान ध्यान हूँ तैं टरिबै लगे ।
नैननि मैं नीर सकल शरीर छयौ,
प्रेम-अदभुत-सुख सूक्ति परिबै लगे ॥
गोकुल के गाँव की गली में पग पारत ही,
भूमि कैं प्रभाव भाव औरै भरिबै लगे ।
ज्ञान मारतंड के सुखाये मनु मानस कौं,
सरस सुहाये घनश्याम करिबै लगे ॥२३॥
दुख-सुख ग्रीषम और सिसिर न ब्यापै जिन्हें / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
दुख-सुख ग्रीषम और सिसिर न ब्यापै जिन्हें,
छापै छाप एकै हिये ब्रह्म-ज्ञान साने मैं ।
कहै रतनाकर गम्भीर सोई ऊधव कौ,
धीर उधरान्यौ आनि ब्रज के सिवाने मैं ॥
औरे मुख-रंग भयौ सिथिलित अंग भयौ,
बैन दबि दंग भयौ गर गरुवाने मैं ।
पुलकि पसीजि पास चाँपि मुरझाने कांपि,
जानैं कौन बहति बयारि बरसाने मैं ॥24॥
धाईं धाम-धाम तैं अवाई सुनि ऊधव की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
धाईं धाम-धाम तैं अवाई सुनि ऊधव की,
बाम-बाम लाख अबिलाषनि सौं म्वै रहीं ।
कहै रतनाकर पै विकल बिलोकि तिन्है,
सकल करेजौ थामि आपुनपौ ख्वै रहीं ॥
लेखि निज-भाग-लेख रेख तिन आनन की,
जानन की ताहि आतुरी सौं मन म्वै रहीं ।
आँस रोकि साँस रोकि पूछन-हुलास रोकि,
मूरति निरासा की-सी आस-भरी ज्वै रहीं ॥25॥
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की,
सुधि ब्रज-गाँवनि मैं पावन जबै लगीं ।
कहै रतनाकर गुवालिनि की झौरि-झौरि,
दौरि-दौरि नन्द पौरि आवन तबै लगीं ॥
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै,
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छवै लगीं ।
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
हमकौं लिख्यौ है कहा कहन सबैं लगीं ॥26॥
देखि-देखि आतुरी बिकल-ब्रज-बारिन की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
देखि-देखि आतुरी बिकल-ब्रज-बारिन की,
उद्धव की चातुरी सकल बहि जात है ।
कहै रतनाकर कुशल कहि पूछि रहे,
अपर सनेह की न बातैं कहि जात हैं ॥
मौन रसना ह्वै जोग जदपि जमायो सबै,
तदपि निरास-बासना न गहि जाति हैं ।
साहस कै कछुक उमाहि पूछिबै कौं ठाहि,
चाहि उत गोपिका कराहि रहि जाति हैं ॥27॥
दीन दशा देखि ब्रज-बालनि की उद्धव कौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
दीन दशा देखि ब्रज-बालनि की उद्धव कौ,
गरिगौ गुमान ज्ञान गौरव गुठाने से ।
कहै रतनाकर न आये मुख बैन नैन,
नीर भरि ल्याए भए सकुचि सिहाने से ॥
सूखे से स्रमे से सकबके से सके से थके,
भूले से भ्रमे से भभरे से भकुवाने से,
हौले से हले से हूल-हूले से हिये मैं हाय,
हारे से हरे से रहे हेरत हिराने से ॥28॥
मोह-तम-राशि नासिबे कौं स-हुलास चले / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
मोह-तम-राशि नासिबे कौं स-हुलास चले,
करिकै प्रकास पारि मति रति-मांति पर ।
कहै रतनाकर पै सुधि उधिरानी सबै,
धुरि परीं वीर जोग-जुगति संघाति पर ॥
चलत विषम ताती वात ब्रज-बारिनि की,
विपति महान परी ज्ञान-बरी बाती पर ।
लच्छ दुरे सकल बिलोकत अलच्छ रहे,
एक हाथ पाती एक हाथ दिये छाती पर ॥29॥
चाहत जौ स्वबस संयोग स्याम-सुन्दर कौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चाहत जौ स्वबस संयोग स्याम-सुन्दर कौ,
जोग के प्रयोग में हियौ तो बिलस्यौ रहै ।
कहै रतनाकर सु-अंतर मुखी ह्वै ध्यान,
मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै ॥
ऐसे करौं लीन आतमा कौं परमात्मा में,
जामैं जड़-चेतन बिलस बिकस्यौ रहै ।
मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि,
सो तौ सब अंतर-निरंतर बस्यौ रहै ॥30॥
पंच तत्त्व मैं जो सच्चिदानन्द की सत्ता सो तौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
पंच तत्त्व मैं जो सच्चिदानन्द की सत्ता सो तौ,
हम तुम उनमैं समान ही समोई है ।
कहै रतनाकर विभूति पंच-भूत हूँ की,
एक ही सी सकल प्रभूतनि मैं पोई है ॥
माया के प्रंपच ही सौं भासत प्रभेद सबै,
काँच-फलकानि ज्यौं अनेक एक सोई है ।
देखौं भ्रम-पटल उघारि ज्ञान आँखिनि सौं,
कान्ह सब ही मैं कान्हा ही में सब कोई है ॥31॥
सोई कान्ह सोई तुम सोई सबही हैं लखौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सोई कान्ह सोई तुम सोई सबही हैं लखौ,
घट-घट-अन्तर अनन्त स्यामघन कौं ।
कहै रतनाकर न भेद-भावना सौं भरौ,
बारिधि और बूँद के बिचारि बिछुरन कौं ॥
अबिचल चाहत मिलाप तौ बिलाप त्यागि,
जोग-जुगती करि जुगावौ ज्ञान-धन कौं ।
जीव आत्मा कौं परमात्मा मैं लीन करौ,
छीन करौं तन कौं न दीन करौ मन कौं ॥32॥
सुनि सुनि ऊधव की अकथ कहानी कान / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सुनि सुनि ऊधव की अकथ कहानी कान,
कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी हैं ।
कहै रतनाकर रिसानी बररानी कोऊ,
कोऊ बिलखानी, बिकलानी बिथकानी हैं ॥
कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रहीं,
कोऊ घूमि-घूमि परीं भूमि मुरझानी हैं ।
कोऊ स्याम-स्याम कै बहकि बिललानी कोऊ,
कोमल करेजौ थामि सहमि सुखानी हैं ॥33॥
ऊधो कहौ सूधौ सौ सनेस पहिले तौ यह / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ऊधो कहौ सूधौ सौ सनेस पहिले तौ यह,
प्यारे परदेश तैं कबै धौ पग पारिहैं ।
कहै रतनाकर तिहारी परि बातनि मैं,
मीड़ि हम कबलौं करेजौ मन मारिहैं ॥
लाइ-लाइ पाती छाती कब लौं सिरेहैं हाय,
धरि-धरि ध्यान धीर कब लगि धारिहैं ।
बैननि उचारिहैं उराहनौं सबै धों कबै,
श्याम कौ सलौनो रूप नैननि निहारिहैं ॥35॥
षटरस-व्यंजन तौ रंजन सदा ही करें / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
षटरस-व्यंजन तौ रंजन सदा ही करें,
ऊधौ नवनीत हूँ सप्रीति कहूँ पावै हैं ।
कहै रतनाकर बिरद तौ बखानैं सब,
सांची कहौ केते कहि लालन लड़ावै हैं ॥
रतन सिंहासन बिराजि पाकसासन लौं,
जग चहुँ पासनि तो शासन चलावै हैं ।
जाइ जमुना तट पै कोऊ बट छाँह माहिं,
पांसुरी उमाहि कबौं बाँसुरी बजावै हैं ॥36॥
कान्ह-दूत कैंधौं ब्रह्म-दूत ह्वै पधारे आप / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कान्ह-दूत कैंधौं ब्रह्म-दूत ह्वै पधारे आप,
धारे प्रन फेरन को मति ब्रजवारी की ।
कहै रतनाकर पै प्रीति रीति जानत ना,
ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की ॥
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम,
तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की ।
जैहे बनि बिगरि न वारिधिता वारिधि की,
बूँदता बिलैहैं बूँद बिबस बिचारी की ॥37॥
चोप करि चंदन चढ़ायौ जिन अंगनि पै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चोप करि चंदन चढ़ायौ जिन अंगनि पै,
तिनपै बजाइ तूरि धूरि दरिबौ कहौ ।
रस रतनाकर सनेह निखारयौ जाहि,
ता कच कों हाय जटा-जूट बरिबौ कहौ ॥
चंद अरविंद लौं सराह्यौ ब्रजचंद जाहि,
ता मुख कौं काकचंचुवत करिबौ कहौ ।
छेदि-छेदि छाती छलनी कै बैन-बाननि सौं,
तामें पुनि ताइ धीर-नीर धरिबौ कहौ ॥38॥
चिंता-मनि मंजुल पँवारि धूरि-धारनि मैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चिंता-मनि मंजुल पँवारि धूरि-धारनि मैं,
कांच-मन-मुकुर सुधारि रखिबौ कहो ।
कहै रतनाकर वियोग-आगि सारन कौं,
ऊधौ हाय हमकौ बयारि भखिबौ कहौ ॥
रूप-रस-हीन जाहि निपट निरूपि चुके,
ताकौ रूप ध्वाइबौ औ’ रस चखिबौ कहौ ।
एते बड़े बिस्व माहिं हेरें हूँ न पैये जाहि,
ताहि त्रिकुटी मैं नैन मूँद लखिबौ कहौ ॥
आए हो सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै,
ऊधौ उए वियोग के बचन बतरावौ ना ।
कहै रतनाकर दया करि दरस दीन्यौ,
दुख दरिबै कौं, तोपै अधिक बढ़ावौ ना ॥
टूक-टूक ह्वै है मन-मुकुर हमारौ हाय,
चूकि हूँ कठोर-नैन पाहन चलावौ ना ।
एक मनमोहन तौ बसिकै उजारयौ मोहिं,
हिय मैं अनेक मनमोहन बसावौ ना ॥40॥
चुप रहौ ऊधौ पथ मथुरा कौ गहौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चुप रहौ ऊधौ पथ मथुरा कौ गहौ,
कहौ न कहानी जो बिविध कहि जाए हौ ।
कहै रतनाकर न बूझिहैं बुझाएँ हम,
करत उपाय बृथा भारी भरमाए हौ ॥
सरल स्वभाव मृदु जानि परौ ऊपर तैं,
उर पर घाय करि लौन सौ लगाए हौ ।
रावरी सुधाई में भरि है कुटिलाई कूटि,
बात की मिठाई मैं लुनाई लै ल्याए हौ ॥41॥
नेम व्रत सजम के पींजरे परे को जब / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
नेम व्रत सजम के पींजरे परे को जब,
लाज-कुल-कानि-प्रतिबंधहिं निवारि चुकीं ।
कौन गुन गौरब कौ लंगर लगाबै जब,
सुधि बुधि ही कौ भार टेक करि टारि चुकीं ॥
जोग रतनाकर मैं सांस घूँटि बूड़े कौन,
ऊधौ हम सूधौ यह बानक विचारि चुकीं ।
मुक्ति-मुकता कौ मोल माल ही कहा है जब,
मोहन लला पै मन-मानिक ही वारि चुकीं ॥42॥
ल्याए लादि बादि ही लगावन हमारे गरैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
ल्याए लादि बादि ही लगावन हमारे गरैं,
हम सब जानी कहौ सुजस-कहानी ना ।
कहै ’रतनाकर’ गुनाकर गुबिंद हूँ कें,
गुननि अनत बेधि सिमिटि समानी ना ॥
हाथ बिन मोल हूँ बिकी न मग हूँ मैं कहँ,
तापै बटमार-टोल लोल हूँ लुभानी ना ।
केती मिली मुकुति बधूबर के कूबर में,
ऊबर भई जौ मधुपुर में समानी ना ॥43॥
हम परतच्छ मैं प्रमान अनुमाने नाम्हि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
हम परतच्छ मैं प्रमान अनुमाने नाम्हि,
तुम भ्रम-भौंर मैं भलैं हीं बहिबौ करौ ।
कहै रतनाकर गुबिंद-ध्यान धारैं हम,
तुम मनमानौ ससा-सिंग गहिबौ करौ ॥
देखति सो मानति हैं सूधो न्याव जानति हैं,
ऊधो ! तुम देखि हूँ अदेख रहिबौ करौ ।
लखि ब्रज-भूप अलख अरूप ब्रह्म,
हम न कहैंगी तुम लाख कहिबौ करौ ॥44॥
रंग-रूप रहित सबही लखात हमें / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
रंग-रूप रहित लखात सबही हैं हमै,
वैसो एक और ध्याइ धीर धरिहैं कहा ।
कहै रतनाकर जरी हैं बिरहानल मैं,
और अब जोति कौं जगाइ जरिहैं कहा ॥
राखौ धरि ऊधौ उतै अलख अरूप ब्रह्म,
तासौं काज कठिन हमारे सरिहैं कहा ।
एक ही अनंग साधि साधन सब पूरीं अब,
और अंग-रहित अराधि करिहैं कहा ॥45॥
कर-बिनु कैसे गाय दुहिहैं हमारी वह / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
कर बिनु कैसे गाय दुहिहैं हमारी वह,
पद-बिनु कैसे नाचि थिरकि रिझाइहै ।
कहै रतनाकर बदन-बिनु कैसें चाखि,
माखन बजाइ बैनु गोधन गवाइहै ॥
देखि सुनि कैसें दृग-स्रवन बिनाही हाय,
भोरे ब्रजवासिनि की बिपति बराइहै ।
रावरौ अनूप कोई अलख अरूप ब्रह्म,
ऊधौ कहो कौन धौ हमारे काज आइहै ॥46॥
तो बस बसन रँगावैं मन रँगत ये / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' »
वै तो बस बसन रँगावैं मन रँगत ये,
भसम रमावैं वे ये आपुहीं भसम हैं ।
सांस-सांस माहिं बहु बासन बितावत वे
इनकै प्रत्येक सांस जात ज्यों जनम हैं ॥
ह्वै कै जग-भुक्ति सौं बिरक्त मुक्ति चाहत वे
जानत ये भुक्ति मुक्ति दोऊ विष सम हैं ।
करिकै बिचार सूधौ उधौ मन माहिं लखौ
जोगी सौं वियोग-भोग-भोगी कहा कम हैं ॥47॥
जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ
दुख-सुख साधनि सौं निपट निबेरी हैं ।
कहै रतनाकर न जानैं क्यों इतै धौं आइ
सांसनि की सासना की बासना बखेरी हैं ॥
हम जमराज की धरावतिं जमा न कछू
सुर-पति-संपति की चाहति न हेरी हैं ।
चेरी हैं न ऊधौ ! काहू ब्रह्म के बबा की हम
सूधौ कहे देति एक कान्ह की कमेरी हैं ॥48॥
सरग न चाहें अपबरग न चाहैं सुनो / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सरग न चाहैं अपबरग न चाहैं सुनो
भुक्ति-मुक्ति दोऊ सौं बिरक्ति उर आनैं हम ।
कहै रतनाकर तिहारे जोग-रोग माहि
तन मन सांसनि की सांसति प्रमानैं हम ॥
एक ब्रजचंद कृपा-मंद-मुसकानि ही मैं
लोक परलोक कौ अनंद जिय जानैं हम ।
जाके या बियोग-दुख हू में सुख ऐसो कछू
जाहि पाइ ब्रह्म-सुख हू मैं दुःख मानैं हम ॥49॥
जग सपनौ सौ सब परत दिखाई तुम्हैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जग सपनौ सौ सब परत दिखाई तुम्हैं
तातैं तुम ऊधौ हमैं सोवत लखात हौ ।
कहै रतनाकर सुनै को बात सोवत की
जोई मुँह आवत सो बिबस बयात हौ ॥
सोवत मैं जागत लखत अपने कौ जिमि
त्यौं हीं तुम आपहीं सुज्ञानी समुझात हौ ।
जोग-जोग कबहूँ न जानै कहा जोहि जकौ
ब्रह्म-ब्रह्म कबहूँ बहकि बररात हौ ॥50॥
ऊधौ यह ज्ञान कौ बखान सब बाद हमैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ऊधौ यह ज्ञान कौ बखान सब बाद हमैं
सूधौ बाद छाँड़ि बकबादहिं बढावै कौन ।
कहै रतनाकर बिलाय ब्रह्म काय माहिं
आपने सौं आपनुपौ आपुनौ नसावै कौन ॥
काहू तौ जनम मैं मिलैंगी श्यामसुन्दर कौ
याहू आस प्रानायाम-सांस मैं उड़ावै कौन ।
परि कै तिहारी ज्योति-ज्वाल की जगाजग मैं
फेरि जग जाइबे की जुगती जरावै कौन ॥51॥
वाही मुख मंजुल की चहतिं मरीचैं सदा / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
वाही मुख मंजुल की चतिं मरीचैं सदा
हमकौं तिहारी ब्रह्म-ज्योति करिबौ कहा ।
कहै रतनाकर सुधाकर-उपासिनि कौं
भानु की प्रभानि कैं जुहारि जरिबौ कहा ॥
भोगि रहीं बिरचे विरंचि के संजोग सबै
ताके सोग सारन कौं जोग चरिबौ कहा ।
जब ब्रजचंद को चकौर चित चारु भयौ
बिरह चिंगारिनि सौं फेरि डरिबौ कहा ॥52॥
ऊधौ जम-जातना की बात न चलाबौ नैकु / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ऊधौ जम-जातना की बात न चलाबौ नैकु,
अब दुख -सुख कौ बिबेक करिबौ कहा ।
प्रेम-रतनाकर-गम्भीर परे मीननि कौं,
इहिं बह्व-गोपद की भीति भरिबौ कहा ॥
एकै बार लैहैं मरि मीच की कृपा सौं हम,
रोकि-रोकि सांस बिनु मीच मरिबौ कहा ॥
छिन जिन झेली कान्ह-बिरह-बलाय तिन्हैं,
नरक-निकाय की धरक धरिबौं कहा ॥53॥
जोगिनि की भोगिनि की बिकल बियोगिनी की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जोगिनि की भोगिनि की बिकल बियोगिनि की
जग मैं न जागती जमातैं रहि जाइँगी ।
कहैं रतनाकर न सुख के रहे जो दिन
तौ ये दुख-द्वंद्व की न रातैं रहि जाइँगी ॥
प्रेम-नेम छाँड़ि ज्ञान-छेम जो बतावत सो
भीति ही नहीं तो कहा छातैं रहि जाइँगी ।
घातैं रहि जाइँगी न कान्ह की कृपा तें इती
ऊधौ कहिबै कौं बस बातैं रहि जाइँगी ॥54॥
कठिन करेजौ जो न करक्यौ बियोग होत / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कठिन करेजौ जो न करक्यौ बियोग होत
तापर तिहारौ जंत्र मंत्र खंचिहै नहीं ।
कहै रतनाकर जरी हैं बिरहानल मैं
ब्रह्म की हमारैं जिय जोति जंचिहै नहीं॥
ऊधौ ज्ञान-भान की प्रभानि ब्रजचन्द बिना
चहकि चकोर चित चोपि नचिहै नहीं ।
स्याम-रंग-रांचे साँचे हिय हम ग्वारिनि कै
जोग की भगौंहीं भेष-रेख रंचिहै नहीं ॥55॥
नैननि के नीर और उसीर सौ पुलकावलि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
नैननि के नीर औ उसीर सौ पुलकावलि
जाहि करि सीरौ सीरी बातहिं विलासैं हम ।
कहै रतनाकर तपाई बिरहातप की
आवन न देति जामैं बिषम उसासैं हम ॥
सोई मन-मन्दिर तपावन के काज आज
रावरे कहे तैं ब्रह्म-ज्योति लै प्रकासें हम ।
नन्द के कुमार सुकुमार कौं बसाइ यामैं
ऊधौ अब लाइ कै बिसास उदबासैं हम ॥56॥
जोहैं अभिराम स्याम चित की चमक ही मैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जौहैं अभिराम स्याम चित की चमक ही मैं
और कहा ब्रह्म की जगाइ जोति जौहैंगी ।
कहै रतनाकर तिहारी बात ही सौं रुकी
साँस की न साँसति कै औरौ अवरौहैंगी ॥
आपुही भई है मृगछाला ब्रजबाला सूखि
तिनपै अपर मृगछाला कहा सौहैंगी ।
ऊधौ मुक्ति-माल बृथा मढ़त हमारे गरैं
कान्ह बिना तासौं कहौ काकौ मन मोहैंगी ॥57॥
कीजै ज्ञान भानु कौ प्रकास गिरि-सृंगनि पै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कीजै ज्ञान भानु कौ प्रकास गिरि-सृंगनि पै
ब्रज मैं तिहारी कला नैंकु खटिहैं नहीं ।
कहै रतनाकर न प्रेम-तरु पैहै स्सोखि
यकी डार-पात तृन-तूल घटिहैं नहीं ॥
रसना हमारी चारु चातकी बनी हैं ऊधौ
पी-पी कौ बिहाई और रट रटिहैं नहीं ।
लौटि-पौटि बात कौ बवंडर बनाबत क्यों
हिय तैं हमारे घनश्याम हटिहैं नहीं ॥58॥
नैननि के आगे नित नाचत गुपाल रहैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
नैननि के आगै नित नाचत गुपाल रहैं,
ख्याल रहै सोई जो अनन्य-रसवारे हैं ।
कहै रतनाकर सो भावना भरीयै रहै,
जाके चाव भाव रचैं उर मैं अखारे हैं ॥
ब्रह्म हूँ भए पै नारि ऐसियै बनी जौ रहैं,
तौ तौ सहै सीस सबै बैन जो तिहारे हैं ।
यह अभिमान तौ गवैहैं ना गये हूँ प्रान,
हम उनकी हैं वह प्रीतम हमारे हैं ॥59॥
सुनीं गुनीं समझी तिहारी चतुराई जिती / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सुनीं गुनीं समझी तिहारी चतुराई जिती
कान्ह की पढ़ाई कविताई कुबरी की हैं ।
कहै रतनाकर त्रिकाल हूँ त्रिलोक हूँ मैं
आनैं हम नैकु ना त्रिवेद की कही की हैं ॥
कहहि प्रतीति प्रीति नीति हूँ त्रिबाचा बांधि
ऊधौ सांच मन की हिये की अरु जी की हैं ।
वे तो हैं हमारे ही हमारे ही हमारे ही औ
हम उनहीं की उनहीं की उनहीं की हैं ॥60॥
नेमु ब्रत संजम के आसन अखंड लाइ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
नेम ब्रत संजम कै आसन अखंड लाइ
साँसनि कौं घूँटिहैं जहाँ लौं गिलि जाइगौ ।
कहै रतनाकर धरैंगी मृगछाला अरु
धूरि हूँ दरैंगी जऊ अंग छिलि जाइगौ ॥
पांच आंच हूँ की झार झेलिहैं निहारि जाहि
रावरौ हू कठिन करेजौ हिलि जाइगौ ।
सहिहैं तिहारे कहैं सांसति सबै पै बस
एती कहि देहु कै कन्हैया मिलि जाइगौ ॥61॥
साधि लैहैं जोग के जटिल जे बिधान ऊधौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
साधि लैहैं जोग के जटिल जे बिधान ऊधौ
बाँधि लैहैं लंकनि लपेटि मृगछाला हू ।
कहै रतनाकर सु मेलि लैहैं छार अंग
झेलि लैहैं ललकि घनेरे घाम पाला हू ॥
तुम तौ कही औ' अनकही कहि लीनी सबै
अब जौ कहौ तो कहै कचु ब्रज-बाला हू ।
ब्रह्म मिलिबै तै कहा मिलिबै बतावौ हमें
ताकौ फल जब लौं मिलै ना नन्दलाला हू ॥62॥
साधिहैं समाधि औ’ अराधिहैं सबै जो कहो / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
साधिहैं समाधि औ अराधिहैं सबै जो कहौ
आधि-व्याधि सकल स-साध सहि लैहैं हम ।
कहै रतनाकर पै प्रेम-प्रन-पालन कौ
नेम यह निपट सछेम निरबैहैं हम ॥
जैहैं प्रान-पट लै सरूप मनमोहन कौ
तातें ब्रह्म रावरे अनूप कौम मिलैंहैं हम ।,
जौंपे मिल्यौ तौ धाइ चाय सौं मिलैगी पर
जौ न मिल्यौ तो पुनि इहाँ ही लौटि एहैं हम ॥63॥
कान्ह हूँ सौं आन ही विधान करिबै कौं ब्रह्म / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कान्ह हूँ सौं आन ही विधान करिबे कौं ब्रह्म
मधुपुरियान की चपल कँखियाँ चहैं ।
कहैं रतनाकर हसैं कै कहौं रोवैं अब
गगन-अथाह-थाह लेन मखियाँ चहैं ॥
अगुन-सगुन-फंद-बन्द निरवारन कौं
धारन कौं न्याय की नुकीली नखियाँ चहैं ॥
मोर-पँखियाँ कौ मौर-वारौ चारुं चाहन कौ
ऊधौ अँखियाँ चहैं न मोर-पँखियाँ चहैं ॥64॥
ढोंग जात्यौ ढरकि परकि उर सोग जात्यौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ढोंग जात्यौ ढरकि परकि उर सोग जात्यौ
जोग जात्यौ सरकि स-कंप कँखियानि तैं ।
कहै रतनाकर न लेखते प्रपञ्च ऐंठि
बैठि धरा न लेखते कहूँधौं नखियानि तैं ॥
रहते अदेख नाहिं वेष वह देखत हूँ
देखत हमारी जान मोर पँखियानि तैं ।
ऊधौ ब्रह्म-ज्ञान कौ बखान करते न नैंकु
देख लेते कान्ह जौ हमारी अँखियानि तैं ॥65॥
चाव सौं चले हौं जोग-चरचा चलाइबै कौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चाव सौं चले हौ जोग-चरचा चलाइबै कौं
चपल चितौनी तैं चुचात चित-चाह है ।
कहै रतनाकर पै पार न बसैहै कछु
हेरत हिरैहैं भरयौ जो उर उछाह है ॥
अंडे लौं टिटहरी के जहै जू बिबेक बहि
फेरि लहिबै की ताके तनक न राह है ।
यह वह सिंधु नाहिं सोखि जो अगस्त्य लियौ
ऊधौ यह गोपिन के प्रेम कौ प्रबाइ है ॥66॥
धरि राखौ ज्ञान-गुन गौरव गुमान गोइ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
धरि राखौ ज्ञान गुन गौरव गुमान गोइ
गोपिन कौं आवत न भावत भड़ंग है ।
कहै रतनाकर करत टांय-टांय वृथा
सुनत न कौ इहाँ यह मुहचंग है ॥
और हूँ उपाय केते सहज सुढंग ऊधौ
साँस रोकिबै कौं कहा जोग ही कुढंग है ।
कुटिल कटारी है अटारी है उतंग अति
जमुना-तरंग है, तिहारौ सतसंग है ॥67॥
प्रथम भुराई चाह-नाय पै चढ़ाइ नीकै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रथम भुराई चाह-नाय पै चढ़ाई नीकै
न्यारी करौ कान्ह कुल-कूल हितकारी तैं ।
प्रेम-रतनाकर की तरह तरंग पारि
पलटि पराने पुनि प्रन-पतवारी तैं ॥
और न प्रकार अब पार लहिबै कौ कछु
अटकि रही हैं एक आस गुनवारी तैं ।
सोऊ तुम आइ बात विषम चलाइ हाय
काटन चहत जोग कठिन कुठारी तैं ॥68॥
प्रेम-पाल पलटि उलटि पतवारि-पति / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रेम-पाल पलटि उलटि पतवारी-पति
केवल परान्यौ कूब-तूँबरी अधार लै ।
कहै रतनाकर पठायौं तुम्हैं तापै पुनि
लादन कौं जोग कौ अपार अति भार लै ॥
निरगुन ब्रह्म कहौ रावरौ बनैहै कहा
ऐहै कछु काम हूँ न लंगर लगार लै ।
विषम चलावौ ज्ञान-तपन-तपी ना बात
पारी कान्ह तरनी हमारी मँझधार लै ॥69॥
प्रथम भुराई प्रेम-पाठनि पढ़ाइ उन / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रथम भुराई प्रेम-पाठनि पढ़ाई उन
तन-मन कीन्हें बिरहागि के तपेला हैं ।
कहै रतनाकर त्यौं आप अब तापै आइ
सांसनि की सांसति के झारत झमेला हैं ॥
ऐसे-ऐसे सुभ उपदेश के दिवैयनि की
ऊधौ ब्रजदेश मैं अपेल रेल-रेला हैं ॥
वे तौ भए जोगी जाइ पाइ कूबरी कौ जोग
आप कहैं उनके गुरु हैं किधौं चेला हैं ॥70॥
एते दूरि देसनि सौं सखनि-सँदेसनि सौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
एते दूरि देसनि सौं सखनि-सन्देसनि सौं
लखन चहैं जो दसा दुसह हमारी है ।
कहै रतनाकर पै विषम बियोग-बिथा
सबद-बिहीन भावना की भाववारी है ॥
आनैं उर अन्तर प्रतीति यह तातैं हम
रीति नीति निपट भुजंगनि की न्यारी है ।
आँखिनि तैं एक तो सुभाव सुनिबै कौ लियौ
काननि तैं एक देखिबै की टेक धारी है ॥71॥
द्रौनाचल कौ ना यह छटकयौ कनुका जाहि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
द्रौनाचल कौ ना यह छटक्यौ कनूका जाहि
छाइ छिगुनी पै छेम-छत्र छिति छायौ है ।
कहै रतनाकर न कूबर बधू-वर कौ
जाहि रंच राँचे पानि परस गँवायौ है ॥
यह गरु प्रेमाचल दृढ़-ब्रत-धारिनि कौ
जाकै भार भाव उनहूँ की सकुचायौ है ।
जानै कहा जानि कै अजान ह्वै सुजान कान्ह
ताहि तुम्हैं बात सौं उड़ावन पठायौ है ॥72॥
सुधि-बुधि जाति उड़ि जिनकी उसाँसनि सौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सुधि-बुधि जाति उड़ी जिनकी उसाँसनि सौं
तिनकौं पठायौ कहा धीर धरि पाती पर ।
कहै रतनाकर त्यौं बिरह-बलाय ढाइ
मुहर लगाइ गए सुख-थिर-थाती पर ।
और जो कियौ सौ कियौ ऊधौ पै न कोऊ बियौ
ऐसी घात घूनी करै जनम-संघाती पर ।
कूबरी की पीठ तैं उपारि भार भारी तुम्हैं
भेज्यौ ताहि थापन हमारी दीन छाती पर ॥73॥
सुघर सलोने स्यामसुन्दर सुजान कान्ह / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सुघर सलोने स्यामसुन्दर सुजान कान्ह
करुना-निधान कें बसीठ बनि आए हौ ।
प्रेम-प्रनधारी गिरधारी को सनेसौ नाहिं
होत हैं अंदेस झूठ बोलत बताए हौ ॥
ज्ञान-गुन गौरव-गुमान-भरे फूले फिरौ
बंचक के काज पै न रंचक बराए हौ ।
रसिक सरौमनि कौ नाम बदनाम करौ
मेरी जान ऊधौ कूर-कूबरी-पठाए हौ ॥74॥
कान्ह कूबरी के हिये हुलसे-सरोजनि तैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कान्ह कूबरी के हिए हुलसे-सरोजनि तैं
अमल अनन्द-मकरन्द जो ढरारै है ।
कहै रतनाकर यौं गोपी उर संचि ताहि
तामैं पुनि आपनौ प्रपंच रंच पारै है ॥
आइ निरगुन-गुन गाइ ब्रज मैं जो अब
ताकौ उदगार ब्रह्मज्ञान-रस गारै है ।
मिलि सो तिहारौ मधु मधुप हमारैं नेह
देह मैं अछेह विष विषम बगारै है ॥75॥
सीता असगुन कौं कटाई नाक एक बेरि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सीता असगुन कौं कटाई नाक एक बेरि
सोई करि कूब राधिका पै फेरि फाटी है ।
कहै रतनाकर परेखौं नाहिं याकौ नैंकु
ताकी तौ सदा की यह पाकी परिपाटी है ॥
सोच है यहै कै संग ताके रंगभौन माहिं
कौन धौ अनोखौ ढंग रचति निराटी है ।
छाँटि देत कूबर कै आंटि देति डाँट कोऊ
काटि देति खाट किधौं पाटि देति माटी है ॥76॥
आए कंसराइ के पठाए वे प्रतच्छ तुम / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए कंसराइ के पठाए वे प्रतच्छ तुम
लागत अलच्छ कुबजा के पच्छवारे हौ ।
कहै रतनाकर बियोग लाइ लाई उन
तुम जोग बात के बवंडर पसारे हौ ॥
कोऊ अबलानि पै न ढरकि ढरारे होत
मधुपुरवारे सब एकै ढार ढारे हौ ।
लै गए अक्रूर क्रूर तन तैं छुड़ाइ हाय
ऊधौ तुम मन तैं छुड़ावन पधारे हौ ॥77॥
आए हौ पठाए वा छतीसे छलिया के इतै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए हौ पठाए वा छतीसे छलिया के इतै
बीस बिसै ऊधौ वीरवामन कलाँच ह्वै ।
कहै रतनाकर प्रपञ्च न पसारौ गाढ़ै
बाढ़ै पै रहौगे साढ़े बाइस ही जाँच ह्वै ॥
प्रेम अरु जोग मैं है जोग छठैं-आठैं परयौ
एक ह्वै रहैं क्यों दोऊ हीरा अरु काँच ह्वै ।
तीन गुन पाँच तत्व बहकि बतावत सो
जैहै तीन-तेरह तिहारी तीन-पाँच ह्वै ॥78॥
कंस के कहे सौं जदुबंस कौ बताइ उन्हैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कंस के कहे सौं जदुबंस कौ बताइ उन्हैं
तैसैं ही प्रसंसि कुब्जा पै ललचायौ जौ ।
कहै रतनाकर न मुष्टिक चनूर आदि
मल्लनि कौ ध्यान आनि हिय कसकायौ जौ ॥
नन्द जसुदा की सुखमूरि करि धूरि सबै
गोपी ग्वाल गैयनि पै गाज लै गिरायौ जौ ।
होते कहूँ क्रूर तौ न जानैं करते धौं कहा
एतो क्रूर करम अक्रूर ह्वै कमायौ जौ ॥79॥
चाहत निकारत तिन्हैं जो उर अन्तर तैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चाहत निकारत तिन्हैं जो उर-अन्तर तैं
ताकौ जोग नांहि जोग मन्तर तिहारे में ।
कहै रतनाकर बिलग करिबे मैं होति
नीति विपरीत महा कहति पुकारे में ॥
तातैं तिन्हैं ल्याइ लाइ हियँ तैं हमारे बेगि
सौचियै उपाय फेरि चित्त चेतवारे में ।
ज्यौं-ज्यौं बसे जात दूरि-दूरि प्रान-मूरि
त्यौं-त्यौं धँसे जात मन-मुकुर हमारे में ॥80॥
ह्याँ तो ब्रजजीवन सौ जीवन हमारौ हाय / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ह्याँ तो ब्रजजीवन सौ जीवन हमारौ हाय
जानैं कौन जीव लैं उहाँ के जन-जन में ।
कहैं रतनाकर बतावत कछू कौ कछू
ल्यावत न नैंकु हूँ बिवेक निज मन में ॥
अच्छिनि उधारि ऊधौ करहु प्रतच्छ लच्छ
इत पसु-पच्छिनि हूँ लाग है लगन में ।
वाहू की न जीह करै ब्रह्म की समीहा सुनी
पीहा-पीहा रटत पपीहा मधुवन में ॥81॥
बाढ़्यौ ब्रज पै जो ऋन मधुपुर-बासिनि कौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
बाढ़्यौ ब्रज पै जो ऋन मधुपुर-बासिनि कौ
तासौं ना उपाय काहू भाय उमहन कौं ।
कहै रतनाकर बिचारत हुतीं हीं हम
कोऊ सुभ जुक्ति तासौं मुक्त ह्वैं रहन कौं ॥
कीन्यौ उपकार दौरि दोउनि अपार ऊधौ
सोई भूरिभार सौं उबारता लहन कौं ।
लै गयौ अक्रूर क्रूर तब सुख-मूर कान्ह
आए तुम आज प्रान-ब्याज उगहन कौं ॥82॥
पुरतीं न जोपै मोर चंद्रिका किरीट-काज / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
पुरतीं न जोपै मोर चंद्रिका किरीट-काज
जुरतीं कहा न काँच किरचैं कुभाय की ।
कहै रतनाकर न भावते हमारे नैन
तौ न कहा पावते कहूँ दौ ठांय पाय की ॥
मान्यौ हम मान कै न मानती मनाएं बेगि
कीरति-कुमारी सुकुमारी चित चाय की ।
याही सोच माहिं हम होतिं कूबरी के कहा
कूबरी हू होती ना पतोहू नन्दराय की ॥83॥
हरि-तन-पानिप के भाजन दृगंचल तैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
हरि-तन-पानिप के भाजन दृगंचल तैं
उमगि तपन तैं तपाक करि धावै ना ।
कहै रतनाकर त्रिलोक-ओकमंडल में
बेगि ब्रह्मद्रव उपद्रव मचावै ना ॥
हर कौं समेत हर-गिरि के गुमान गारि
पल मैं पतालपुर पैठन पठावै ना ।
फैले बरसाने मैं न रावरी कहानी यह
बानी कहूँ राधे-आधे कान सुनि पावै ना ॥84॥
आतुर न होहु ऊधौ आवति दिबारी अवै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आतुर न होहु ऊधौ आवति दिबारी अवै
वैसियै पुरंदर-कृपा जौ लहि जाइगी ।
होत नर ब्रह्म-ज्ञान सौं बतावत जो
कछु इहि नीति को प्रतीति गहि जाइगी ॥
गिरिवर धारि जौ उबारि ब्रज लीन्यौ बलि
तौ तौ भाँति काहूँ यह बात रहि जाइगी ।
नातरु हमारी भारी बिरह-बलाय-संग
सारी ब्रह्म-ज्ञानता तिहारी बहि जाइगी ॥85॥
आवति दीवारी बिलखाइ ब्रज-वारी कहैं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आवति दीवारी बिलखाइ ब्रज-वारी कहैं
अबकै हमारै गाँव गोधन पुजैहै को ।
कहै रतनाकर विविध पकवान चाहि
चाह सौं सराहि चख चंचल चलैहै को ॥
निपट निहोरे जोरि हाथ निज साथ ऊधौ
दमकति दिव्य दीपमालिका दिखैहै को ।
कूबरी के कूबर तैं उबारि न पावैं कान्ह
इंद्र-कोप-लोपक गुबर्धन उठैहै को ॥86॥
विकसित विपिन बसंतिकावली कौ रंग / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
विकसित विपिन बसंतिकावली कौ रंग
लखियत गोपिन के अंग पियराने में ।
बौरे वृन्द लसत रसाल-बर बारिनि के
पिक की पुकार है चबाव उमगान में ॥
होत पतझार झार तरुनि-समूहनि कौ
बैहरि बतास लै उसास अधिकाने में ।
काम बिधि बाम की कला मैं मीन-मेष कहा
ऊधौ नित बसत बसंत बरसाने में ॥87॥
ठाम-ठाम जीवनबिहीन दीन दीसै सबे / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ठाम-ठाम जीवनबिहीन दीन दीसै सबे
चलति चबाई-बात तापत घनी रहै ।
कहै रतनाकर न चैन दिन-रैन परै
सूखी पत-छिन भई तरुनि अनी रहै ॥
जारयौ अंग अब तौ बिधाता है इहां कौ भयौ
तातैं ताहि जारन की ठसक ठनी रहै ।
बगर-बगर बृषभान के नगर हित
भीषम-प्रभाव ऋतु ग्रीष्म बनी रहै ॥88॥
रहति सदाई हरियाई हिय-घायनि में / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
रहति सदाई हरियाई हिय-घायनि में
ऊरध उसास सौ झकोर पुरवा की है ।
पीव-पीव गोपी पीर-पूरित पुकारति है
सोई रतनाकर पुकार पपिहा की है ॥
लागी रहै नैननि सौं नीर की झरी औ
उठै चित मैं चमक सो चमक चपला की है ।
बिनु घनश्याम धाम-धाम ब्रज-मंडल में
उधौ नित बसंति बहार बरसा की है ॥89॥
जात घनश्याम के ललात दृग कंज-पाँति / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जात घनश्याम के ललात दृग कंज-पाँति
घेरि दिख-साध-भौंर भीरि की अनी रहै ।
कहै रतनाकर बिरह बिधु बाम भयौ
चन्द्रहास ताने घात घायल घनी रहै ॥
सीत-घाम बरषा-बिचार बिनु आने ब्रज
पंचवान-बानि की उमड़ ठनी रहै ।
काम बिधना सौं लहि फरद दवामी सदा
दरद दिवैया ऋतु सरद बनी रहै ॥90॥
रीते परे सकल निषंग कुसुमायुध के / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
रीते परे सकल निषंग कुसुमायुध के
दूर दुरे कान्ह पै न तातै चालै चारौ है ।
कहै रतनाकर बिहाइ बर मानस कौं
लीन्यौ हे हुलास हंस बास दूरिवारौ है ॥
पाला परै आस पै न भावत बतास बारि
जात कुम्हिलात हियौ कमल हमारौ है ।
षट ऋतु ह्वै है कहूँ अनत दिगंतनि मैं
इत तौ हिमंत कौ निरंतर पसारौ है ॥91॥
कांपि-कांपि उठत करेजौ कर चांपि-चांपि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कांपि-कांपि उठत करेजौ कर चांपि-चांपि
उर ब्रजवासिनि के ठिठुर ठनी रहै ।
कहै रतनाकर न जीवन सुहात रंच
पाला की पटास परी आसनि घनी रहै ॥
वारिनि में बिसद बिकास न प्रकास करै
अलिनि बिलास में उदासता सनी रहै ।
माधव के आवन की आवतिं न बातैं नैकु
नित प्रति तातैं ऋतु सिसिर बनी रहै ॥92॥
माने जब नैकु ना मनाएं मन-मोहन के / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
माने जब नैकु ना मनाएं मन-मोहन के
तोपै मन-मोहिनि मनाए कहा मानौ तुम ।
कहै रतनाकर मलीन मकरी लौं नित
आपुनौंहीं जाल अपने हीं पर तानौ तुम ॥
कबहुँ परे न नैन-नीर हूँ के फेर माहिं
पैरिबौ सनेह-सिंधु माहिं कहा ठानौ तुम ।
जानत न ब्रह्म हूँ प्रामानत अलच्छ ताहि
तोपै भला प्रेम कौं प्रतच्छ कहा जानौ तुम ॥93॥
हाल कहा बूझत बिहाल परी बाल सबै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
हाल कहा बूझत बिहाल परी बाल सबै
बसि दिन द्वैक देखि दृगनि सिधाइयौ ।
रोग यह कठिन न ऊधौ कहिबै के जोग
सूधो सौ संदेस याहि तू न ठहराइयौ ॥
औसर मिलै और सर-राज कछू पूछहिं तौ
कहियौ कछू न दसा देखी सो दिखाइयौ ।
आह के कराहि नैन नीर अवगाहि कछू
कहिबौ कौं चाहि हिचकी लैं रहि जाइयौ ॥94॥
नंद जसुदा औ गाय गोप गोपिका की कछु / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
नंद जसुदा औ गाय गोप गोपिका की कछु
बात बजभान-भौन हूँ की जनि कीजियौ ।
कहै रतनाकर कहतिं सब हा-हा खाइ
ह्याँ के परपंचनि सौं रंच न पसीजियौ ॥
आँस भरि ऐहैं और उदास मुख ह्वै हैं हाय
ब्रज-दुःख त्रास की न तातैं साँस लीजियौ ।
नाम कौ बताइ और जताइ गाम ऊधौ बस
स्याम सौ हमारी राम-आम कहि दीजियौ ॥95॥
ऊधौ यहै सूधौ सौ संदेश कहि दीजौ एक / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ऊधौ यहै सूधौ सौ संदेश कहि दीजौ एक
जानति अनेक न विवेक ब्रज-बारी हैं ।
कहै रतनाकर असीम रावरी तौ क्षमा
क्षमता कहाँ लौं अपराध की हमारी हैं ॥
दीजै और ताडन सबै जो मन भावै पर
कीजै न दरस-रस बंचित बिचारी हैं ।
भली हैं बुरी हैं और सलज्ज निरलज्ज हू हैं
को कहै सौ हैं पै परिचारिका तिहारी हैं ॥96॥
धाई जित-तित तैं विदाई-हेत ऊधव की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
धाई जित-तित तैं विदाई-हेत ऊधव की
गोपीं भरीं आरति सम्हारति न सांसुरी ।
कहै रतनाकर मयूर-पच्छ कोऊ लिए
कोऊगुंझ-अंजलीं उमाहे प्रेम-आंसुरी ॥
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पांसुरी ।
पीत-पट नन्द जसुमति नवनीत नयौ
कीरति कुमारी सुरबारी दई बांसुरी ॥97॥
कोऊ जोरि हाथ कोइ नम्रता सौं नाइ माथ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कोऊ जोरि हाथ कोइ नम्रता सौं नाइ माथ
भाषना की लाख लालस सौं नहिं जात है ।
कहै रतनाकर चलत उठि ऊधव के
कातर ह्वै प्रेम सौं सकल महि जात है ॥
सबद न पावत सौ भाव उमगावत जों
ताकि-ताकि आनन ठगे से ठहि जात हैं ।
रंचक हमारी सुनौ रंचक हमारी सुनौ
रंचक हमारी सुनौ कहि रहि जात है ॥98॥
दाबि-दाबि छाती पाती-लिखन लगायौं सबै / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
दाबि-दाबि छाती पाती-लिखन लगायौं सबै
ब्यौंत लिखिबै को पैं न कोऊ करि जात है ।
कहै रतनाकर फुरति नाहिं बात कछु
हाथ धरयौ हीतल थहरि थरि जात है ॥
ऊधौ के निहोरैं फेरि नैंकु धीर जोरैं पर
ऐसे अंत ताप कौ प्रताप भरि जात है ।
सूखि जाति स्याही लेखिनी कै नैंकु डंक लागै
अंक लागैं कागर बररि बरि जात है ॥99॥
कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले
कोऊ चले कछुक अलापि हलबल से ।
कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चलै
कोऊ चले कहत संदेश अबिरल से ॥
आंस चले काहू के सु काहू के उसांस चले
काहू के हियै पै चंद्रहास चले हल से ।
ऊधव के चलत चलाचल चली यौं चल
अचल चले और अचले हूँ भये चल से ॥100॥
दीन्यौ प्रेम-नेम-गरुवाई-गुन ऊधव कौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
दीन्यौ प्रेम-नेम-गरुवाई-गुन ऊधव कौं
हिय सौं हमेव-हरुवाई बहिराइ कै ।
कहै रतनाकर त्यौं कंचन तनाई काय
ज्ञान-अभिमान की तमाई बिनसाइ कै ॥
बातनि की धौंक सौं धमाई चहुँ कोदनि सौं
निज बिरहानल तपाइ पघिलाइ कै ।
गोप की बधूटी प्रेम-बूटी के सहारे मारे
चल-चित पारे की भसम भुरुकाइ कै ॥101॥
गोपी, ग्वाल, नंद, जसुदा सौं तौं विदा ह्वै उठे / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
गोपी, ग्वाल, नंद, जसुदा सौं तौं विदा ह्वै उठे
उठत न पाँय पै उठावत डगत हैं ।
कहै रतनाकर संभारि सारथी पै नीठि
दीठिन बचाइ चल्यौ चोर ज्यौं भगत हैं ॥
कुंजनि की कूल की कलिंदी की रूएँदी दसा
देखि-देखि आँस औ उसाँस उमगत हैं ।
रथ तैं उतरि पथ पावत जहाँ ही तहाँ
बिकल बिसूरि धूरि लोटन लगत हैं ॥102॥
भूले जोग-छेम प्रेमनेमहिं निहारि ऊधौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
भूले जोग-छेम प्रेमनेमहिं निहारि ऊधौ
सँकुचि समाने उर-अंतर हरास लौं ।
कहै रतनाकर प्रभाव सब ऊने भए
सूने भए नैन बैन अरथ-उदास लौं ॥
माँगी बिदा माँगत ज्यौं मीच उर भीचि कोऊ
कीन्यौं मौन गौन निज हिय के हुलास लौं ।
बिथकित साँस-लौं चलत रुकि जात फेरि
आँस लौं गिरत पुनि उठत उसास लौं ॥103॥
चल-चित-पारद की दंभ केंचुली कै दूरि / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
चल-चित-पारद की दंभ केंचुली कै दूरि
ब्रज-मग धूरि प्रेम-मूरि सुभ-सीली लै ।
कहै रतनाकर सु जोगनि बिधान भावि
अमित प्रमान ज्ञान-गंधक गुनीली लै ॥
जारि घट अन्दर हीं आह-धूम धारि सबै
गोपी बिरहागिनि निरन्तर जगीली लै ।
आए लौटि ऊधव भव्य बिभूति भायनि की
कायनि की रुचिर रसायन रसीली लै ॥104॥
आए लौटि लज्जित नवाए नैन ऊधौ अब / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए लौटि लज्जित नवाए नैन ऊधौ अब
सब सुख-साधन कौ सूधौ सौ जतन लै ।
कहै रतनाकर गँवाए गुन गौरव औ
गरब-गढ़ी कौ परिपूरन पतन लै ॥
छाए नैन नीर पीर-कसक कमाए उर
दीनता अधीनता के भार सौं नतन लै ।
प्रेम-रस रुचिर बिराग-तूमड़ी में पूरि
ज्ञान-गूदड़ी में अनुराग सौ रतन लै ॥105॥
आए दौरि पौरि लौं अबाई सुन ऊधव की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आए दौरि पौरि लौं अबाई सुन ऊधव की
और ही विलोकि दसा दृग भरि लेत हैं ।
कहै रतनाकर बिलोकि बिलखात उन्हैं
येऊ कर काँपत करेजै धरि लेत हैं ॥
आवंति कछूक पूछिबे और कहिबे की मन
परत न साहस पै दोऊ दरि लेत हैं ।
आनन उदास सांस भरि उकसौहैं करि
सौहैं करि नैननि निचौहैं करि लेत हैं ॥106॥
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहौ
थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है ।
कहै रतनाकर यौं आवत चकात ऊधौ
मानौ सुधियात कोऊ भावना भुलाई है ॥
धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
सारत बँहोलिनी जो आँस-अधिकाई है ।
एक कर राजै नवनीत जसुदा को दियौ
एक कर बंशी वर राधिका पठाई है ॥107॥
ब्रज-रजरंजित सरीर सुभ ऊधव कौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ब्रज-रजरंजित सरीर सुभ ऊधव कौ
धाइ बलबीर ह्वै अधीर लपटाए लेत ।
कहै रतनाकर सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत ॥
कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत ।
परन न देत एक बूँद पुहुमी की कौंछि
पौंछि-पौंछि पट निज नैननि लगाए लेत ॥108॥
आँसुनि कि धार और उभार कौं उसांसनि के / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
आँसुनि कि धार और उभार कौं उसांसनि के
तार हिचकीनि के तनक टारि लैन देहु ।
कहै रतनाकर फुरन देहु बात रंच
भावनि के विषम प्रपंच सरि लेन देहु ॥
आतुर ह्वै और हू न कातर बनावौ नाथ
नैसुक निवारि पीर धीर धरि लेन देहु ।
कहत न आबै हैं कहि आवत जहाँ लौं सबै
नैकु थिर कढ़त करेजौ करि लेन देहु ॥109॥
रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते
ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार में ।
कहै रतनाकर पै चातुरी हमारी सबै
कित धौं हिरानी दसा दारुन अपार में ॥
उड़ि उधिरानी किधौं ऊरध उसासनि में
बहि धौं बिलानी कहूँ आँसुनि की धार में ।
चूर ह्वै गई धौं भूरि दुख के दरेरनि में
छार ह्वै गई धौं बिरहानल की झार में ॥110॥
सीत-घाम-भेद खेद-सहित लखाने सब / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
सीत-घाम-भेद खेद-सहित लखाने सब
भूले भाव भेदता-निषेधन बिधान के ।
कहै रतनाकर न ताप ब्रजबालनि के
काली-मुख ज्वालना दवानल समान के ॥
पटकि पराने ज्ञान-गठरी तहाँ ही हम
थमत बन्यौ न पास पहुँचि सिवान के ।
छाले परे पगनि अधर पर जाले परे
कठिन कसाले परे लाले परे प्रान के ॥111॥
ज्वालामुखी गिरि तैं गिरत द्रवे द्रव्य कैधौं / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ज्वालामुखी गिरि तैं गिरत द्रवे द्रव्य कैधौं
बारिद पियौ है बारि बिष के सिवाने में ।
कहै रतनाकर कै काली दाँव लेन-काज
फेन फुफकारै उहि गाँव दुख-साने में ॥
जीवन बियोगिनी कौ मेघ अँचयौ सो किधौं
उपच्यौ पच्यौ न उर ताप अधिकाने में ।
हरि-हरि जासौं बरि-बरि सब बारी उठैं
जानै कौन बारि बरसत बरसाने में ॥112॥
लैके पन सूछम अमोल जो पठायौ आप / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
लैके पन सूछम अमोल जो पठायौ आप
ताकौ मोल तनक तुल्यौ न तहाँ सांठी तैं ।
कहै रतनाकर पुकारे ठौर-ठौर पर
पौरि वृषभान की हिरान्यौ मति नांठी तैं ॥
लीजै हरि आपुहीं न हेरि हम पायौ फेरि
याही फेर माहि भए माठी दधि आंठी तैं ।
ल्याए धूरि पूरि अंग अंगनि तहाँ की जहाँ
ज्ञान गयौ सहित गुमान गिरि गांठी तैं ॥113॥
ज्यौंही कछु कहन संदेश लग्यौ त्यौंही लख्यौ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
ज्यौंही कछु कहन संदेस लग्यौ त्यौंही लख्यौ
प्रेम-पूर उमंगि गरे लौं चढ्यौ आवै है।
कहै रत्नाकर न पाँव टिकि पावैं नैंकु ।
एसौ दृग- द्वारनि स -वेग कढ़यौ आवै है।
मधुपुर राखन कौ वेगि कछु ब्यौंत गढौ
धाइ चढ़ौ वट कै न जोपै गढ़यौ आवै है ।
आयौ भज्यौ भूपति भागीरथ लौं हौं तौ नाथ
साथ लायौ सोई पुन्य- पाथ बढयौ आवै है ।।
जैहै व्यथा विषम बिलाइ तुम्हें देखत ही / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
जैहै व्यथा विषम बिलाइ तुम्हैं देखत ही
ताते कही मेरी कहूँ झूठ ठहरावौ ना ।
कहै रत्नाकर न याही भय भाषैं भूरि
याही कहैं जावौ बस बिलंब लगावौ ना ।
एतौ और करत निवेदन स वेदन है
ताकौ कछु बिलग उदार उर ल्यावौ ना ।
तब हम जानैं तुम धीरज- धुरीन जब
एक बार ऊधौ बनि जाइ पुनि आवौ ना।।
छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कै तीर / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
छावते कुटीर कहूँ रम्य यमुना के तीर
गौंन रौन -रेती सौं कदापि करते नहीं ।
कहैं रत्नाकर बिहाय प्रेम गाथा गूढ
स्रौन रसना में रस और भरते नहीं ।
गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
लेखि प्रलयागम हूँ नैकु डरते नहीं ।
होतौ चित चाव जो न रावरे चितावन क
तज ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं ।
भाठी कै बियोग जोग-जटिल लुकाठी लाइ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’
भाठी के वियोग जोग-जटिल-लुकाठी लाइ
लाग सौं सुहाग के अदाग पिघलाए हैं
कहै रत्नाकर सुवृत्त प्रेम सांचे मांहि
काँचे नेम संजम निवृति के ढराए हैं
अब परि बीच खीचि विरह-मरीचि-बिंब
देत लव लाग की गुविंद-उर लाए हैं
गोपी-ताप - तरून-तरनि-किरनावलि के
ऊधव नितांत कांत मनि बनि आए है
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