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उद्धव-शतक : जगन्नाथदास 'रत्नाकर' : Udhav Shatak Jagannath Ratnakar Rachit

मंगलाचरण / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’ जासौं जाति विषय-विषाद की विवाई बेगि चोप-चिकनाई चित चारु गहिबौ करै । कहै रतनाकर कवित्त-बर-व्यंजन मैं जासौ स्वाद सौगुनौ रुचिर रहिबौ करै॥ जासौं जोति जागति अनूप मन-मंदिर मैं जड़ता-विषम-तम-तोम-दहिबौ करै । जयति जसोमति के लाड़िले गुपाल, जन रावरी कृपा सौं सो सनेह लहिबौ करै॥ न्हात जमुना मैं जलजात एक दैख्यौ जात / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’ न्हात जमुना मैं जलजात एक दैख्यौ जात जाको अध-उरध अधिक मुरझायौ है । कहै रतनाकर उमहि गहि स्याम ताहि बस-बासना सों नैंकु नासिका लगायो हैं ॥ त्यौं हीं कछु घूमि झूमि बेसुध भये कै हाय पाय परे उखरि उभाय मुख छायौ है । पाए घरी द्वैक मैं जगाइ ल्याइ ऊधौ तीर राधा-नाम कीर जब औचक सुनायौ है ॥1॥ आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’ आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध डग-मग पाय मग धरत धराये हैं । कहै रतनाकर न बूझैं कछु बोलत औ, खोलत न नैन हूँ अचैन चित छाए हैं ॥ पाइ बहै कंच मैं सुगंध राधिका को मंजु ध्याए कदली-बन मतंग लौ मताये हैं। कान्ह गये जमुना नहान पै नए सिर सौं नीकै तहाँ नेह का नदी मैं न्हाइ आए हैं ॥२॥ देखि ...