शंभुनाथ सिंह के गीत / Shambhunath Singh Ke Geet

शंभुनाथ सिंह

shambhunath singh


जन्म–निधन
1916 - 1991
जन्म स्थान
देवरिया, उत्तर प्रदेश
प्रमुख रचनाएँ
रूप रश्मि (1941) ,माता भूमिः, छायालोक (1945), उदयाचल (1946), मनवन्तर (1948), समय की शिला पर (1968) दिवालोक, जहाँ दर्द नीला है(1977) , वक़्त की मीनार पर (1986), माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या: (1991) -- (सभी गीत संग्रह), दो कहानी संग्रह -- ‘रातरानी’ (1946) और ‘विद्रोह’ (1948), नव नाटक ‘धरती और आकाश’ (1950) और ‘अकेला शहर’ (1975)।

विविध
नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि। नवगीत के तीन ’दशकों’ का सम्पादन, ’नवगीत अर्द्धशती’ का सम्पादन तथा 'नवगीत सप्तक' का सम्पादन।
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समय की शिला पर / शंभुनाथ सिंह

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी श्रृंखला साधना की।
नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाए, उषा ने सुलाए।

सुरभि की अनिल-पंख पर मोर भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
तुहिन-बिन्दु बनकर बिखर पर गए स्वर
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।
किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाए, लहर ने बहाए।

आदमी का ज़हर / शंभुनाथ सिंह

एक जलता शहर
हो गई ज़िन्दगी !
आग का गुलमोहर
हो गई ज़िन्दगी !

हर तरफ हैं अन्धेरी
सुरंगें यहाँ
है भटकती हुई
सिर्फ़ ! रूहें यहाँ
जादुई तलघरों से
गुज़रती हुई

है तिलिस्मी सफ़र
हो गई ज़िन्दगी।

भागकर जाएँ भी
तो कहाँ जाएँ हम
कब तलक यह मिथक
और दुहराएँ हम
है दवा ही न जिसकी
अभी तक बनी

आदमी का ज़हर
हो गई ज़िन्दगी !

जंगलों में सुखी
और ख़ुशहाल था
आदमी नग्न था
पर न कंगाल था
बदबुओं का न
अहसास अब रह गया

सभ्यता का गटर
हो गई ज़िन्दगी !

चान्द-तारे सभी
आज झूठे हुए
हर तरफ घिर उठे
हैं ज़हर के धुएँ
आँख की रोशनी को
बुझाती हुई

रोशनी की लहर
हो गई ज़िन्दगी


विश्व मेरे / शंभुनाथ सिंह

विश्व मेरे, मैं मिटा अस्तित्व अपना
चाहता हूँ भूल जाना वह तड़पना,

चाहता हूँ आज मैं स्पंदन तुम्हारा
चाहता बन जाए सत्य अतीत सपना।

विश्व मेरे, मत सुनो मेरी कहानी,
मैं न कहना चाहता बातें पुरानी,

चाहता हूँ छोड़ना केंचुल पुराना,
चाहता जीवन नया, नूतन जवानी।

विश्व मेरे, मैं बदलता जा रहा हूँ,
काट सब बंधन निकलता जा रहा हूँ,

चाहता मैं 'तुम' बनूँ, इससे तुम्हारे—
रूप में मैं आज ढलता जा रहा हूँ।

विश्व मेरे, लो मुझे निज में मिला लो!
सिंधु तुम, मैं बूँद, लो मुझको सँभालो!

विश्व मेरे, मैं तुम्हारा हो गया हूँ,
मैं मिटा निज को तुम्हीं में खो गया हूँ,

तुम गगन-विस्तार मैं झंकार बनकर
अब तुम्हारी ही लहर में सो गया हूँ।

विश्व मेरे, अब तुम्हीं हो, मैं नहीं हूँ,
मैं न कोई और, जो तुम हो, वही हूँ,

पास की दूरी मिटाकर मुक्त निज से
आ गया मैं, तुम जहाँ मैं भी वहीं हूँ।

विश्व मेरे, मिट गई मेरी व्यथा है,
एक ही मेरी तुम्हारी अब कथा है,

एक ही सुख और दुख मेरे-तुम्हारे
मन हुआ तुममय, नहीं अब अन्यथा है।

विश्व मेरे, रिक्त मैं तुमसे भरा हूँ!
मर गया मैं, हो गया अब दूसरा हूँ।

विश्व मेरे, स्वप्न मैं बुनता नया हूँ,
आँसुओं के अग्नि-कण चुनता नया हूँ,

जो अनागत की कथा सौ-सौ लिए उन
आँधियों में गीत सुनता नया हूँ।

स्वर-सुरभि उठती लपट की क्यारियों से,
छंद बनते जा रहे चिनगारियों से,

है ध्वनित आकाश जिसके घोर रव से,
गीत गूंजित नग्न तन नर-नारियों से।

चाँदनी बेबस पिघलती जा रही है
रूप की दुनिया बदलती जा रही है।

सत्य के निष्करुण विद्युज्जाल से घिर
कल्पना सुकुमार जलती जा रही है।

उठ रहा जीवन मरण-परिधान लेकर
स्वप्न यह कितना सुखद कितना भयंकर?

विश्व मेरे, यह नया मेरा सवेरा,
मिट गया मानस-क्षितिज का क्षीण घेरा,

ज्योति की परियाँ धरा पर मौन उतरीं,
ओस के आँसू धुले, खोया अँधेरा।

यह नए दिन की उषा मुसका रही है,
इंद्रधनुषी छवि धरा पर छा रही है,

शून्य में उड़कर गए थक पंख जिसके
कल्पना अब भूमि पर लहरा रही है।

चल पड़े नूतन डगर पर ये चरण हैं,
और पदतल में झुके जीवन-मरण हैं,

सिंधु में हरियालियों के तैरते-से
स्वप्न कल के देखते मेरे नयन हैं।

भूमि पर उर्वर उगी कविता नई है!
संधि-वेला में बनी जो रसमयी है!

विश्व मेरे, बह रही है काल-धारा
अनवरत, जिसका नहीं कोई किनारा,

तोड़ती पथ के सभी तृण-लता-पादप
पर्वतों को; नाश जिसका मंत्र प्यारा

गूँजता भू पर दिगंतों बीच; सुनकर—
डर रहे हम; बह रहे बेबस लहर पर

क्षुद्र तिनकों से। निपट अनजान मानव
हम न अब बनकर रहेंगे। हम अनश्वर

शक्ति के हैं केंद्र, जीवन के प्रणेता।
क्षुद्र तिनके काल-धारा के विजेता

अब बनेंगे, एक-एक नहीं सहस शत
एक होकर। आत्म मुक्त समष्टि-चेता—

व्यक्ति होगा, काल के रथ पर चढ़ेगा!
प्राणवंत, नई दिशाओं में बढ़ेगा!


किसे भूल जाऊँ? / शंभुनाथ सिंह

किसे भूल जाऊँ, किसे प्यार कर लूँ?
मंदिर मधु-किरण है,

मदिर स्वर्ण-घन है,
मंदिर कम न गृह-दीप

की पर शरण है,
किसे स्वप्न के इंद्र-धनु-सा मिटा दूँ

समझ सत्य लौ चूम किसके अधर लूँ?
अमर साधना-धन,

अमर प्यास के क्षण,
अमर पर न क्या

तृप्ति का एक ही कण?
किसे अर्चना की सुरभि-सा उड़ा दूँ

किसे सिद्धि-चंदन समझ भाल पर लूँ?
मधुर अश्रु-बंधन,

मधुर मौन क्रंदन,
मधुर पर न क्या

मंद मुस्कान-दंशन?
नयन-धार में प्यास किसकी बहा दूँ

तृषित बाहु में बाँध किसकी लहर लूँ?
अमिट है क्षितिज पर

रजत रात का स्वर,
अमिट प्रात का भी

कनक गान सुंदर,
किसे शापमय रागिनी-सा भुला दूँ,

किसे मान वरदान स्वर प्राण भर लूँ?
किसे भूल जाऊँ, किसे प्यार कर लूँ?


सत्य स्वप्न / शंभुनाथ सिंह

प्रात बनकर मुस्कुराती जा रही हो!
स्वप्न मेरे सच बनाती जा रही हो!

बादलों से तृप्ति की जब आश त्यागी,
बेसुधी में पत्थरों से भीख माँगी,

मिल सकीं दो बूँद प्यासे को नहीं पर
अश्रु पीकर सो गई आँखें अभागी,

पर खुली जो आँख तो क्या देखता हूँ,
उर्वशी-सी स्वप्न-सागर से निकलकर

तुम सुधा मुझको पिलाती जा रही हो!
तृप्ति-धारा में डुबाती जा रही हो!

प्रेम का था देवता बनने चला मैं,
पर गया संसार से कितना छला मैं?

आरती अपनी सँजो निज अश्रु से ही
एक जड़ पाषाण-प्रतिमा-सा गला मैं,

पर हुआ जब चेत तो क्या देखता हूँ,
तुम पुजारिन बन खड़ीं मेरे भवन में

दीप साँसों के जलाती जा रही हो!
फूल प्राणों के चढ़ाती जा रही हो!

शक्ति, विथकित पाँव की जब डगमगाई,
ठीकरों ने भी मुझे ठोकर लगाई,

पाश में विषधर विषम-तम के बँधा फिर
काल ने पहचान जीवन की मिटाई,

पर हुआ जब होश तो क्या देखता हूँ,
तुम उषा की अप्सरा बनकर गगन में

रात के परदे उठाती जा रही हो!
राह में कुमकुम बिछाती जा रही हो!

दूर मुझसे विश्व का रंगीन मेला
था, बना जीवन अमा की मौन वेला,

छूटकर रसमय धरा की तान लय से
खो गया नभ-बीच मेरा स्वर अकेला,

पर हुआ जब ध्यान तो क्या देखता हूँ,
तुम खड़ीं साकार पूनम-रागिनी बन

गीत मेरे साथ गाती जा रही हो!
सृष्टि-स्वर में स्वर मिलाती जा रही हो!

स्वप्न मेरे सच बनाती जा रही हो!

तमसो मा ज्योतिर्गमय / शंभुनाथ सिंह

बुझी न दीप की शिखा अनंत में समा गई।
अमंद ज्योति प्राण-प्राण-बीच जगमगा गई!

अथाह स्नेह के प्रवाह में पली,
अमर्त्य वर्त्तिका नहीं गई छली,

असंख्य दीप एक दीप बन गया
कि खिल उठी प्रकाश की कली-कली,

घनांधकार जल गया स्वयं नहीं हिली शिखा,
प्रकाश-धार में तमस् भरी धरा नहा गई!

अकंप ज्योति स्तंभ वह पुरुष बना,
कि जड़ प्रकृति बनी विकास-चेतना,

न सत्य-बीज मृत्तिका छिपा सकी
उगी, बढ़ी, फली अरूप कल्पना,

न बँध सका असत्-प्रमाद-पाश में प्रकाश-तन,
विमुक्त सत्-प्रभा दिगंत बीच मुस्करा गई!

मरा न काम रूप कवि बना अमर,
कि कोटि-कोटि कंठ में हुआ मुखर,

मिटा न, काल का प्रवाह बन घिरा
असीम अंतरिक्ष में अनंत स्वर,

न मंत्र-स्वर अमृत सँभाल मृण्मयी धरा सकी,
त्रिकाल-रागिनी अनंत सृष्टि बीच छा गई!

अनेकता अखंड एक हो गई,
अभेद बीच भेद-भ्रांति खो गई,

अंध-गंध बँध सकी न कूल में
समष्टि बीच पूर्ण व्यष्टि खो गई,

जिसे न पाश तन बना, न छू सका मरण चरण,
विराट् चेतना अरूप न स्वरूप पा गई!

बुझी न दीप की शिखा, असीम में समा गई!

स्वप्न और सत्य / शंभुनाथ सिंह

स्वप्न की रात है, सत्य का प्रात क्षण!
हासमय गान हैं,

मुग्ध मुसकान है,
भीगते जा रहे

किंतु मन-प्राण हैं,
प्राण मैं स्नेह-सर का कुमुद हूँ, मुझे

हासमय नींद है, अश्रुमय जागरण!
रंगमय कल्पना,

ज्योतिमय अर्चना,
छल रही प्राण को

पर जतन-साधना,
प्रिय, मिलन-रात का दीप मैं हूँ, मुझे

है सुधामय तिमिर है गरलमय किरण!
चाँदनी पास है,

तृप्त हर साँस है,
बढ़ गई किंतु

अनजान में प्यास है,
प्राण के सिंधु का ज्वार मैं हूँ, मुझे

शूलमय है धरा, फूलमय है गगन!
आँकता रंग भर

मैं तुम्हें प्राण पर,
अश्रु में किंतु ये

चित्र जाते बिखर,
दूर तुमसे हुआ यक्ष मैं हूँ, मुझे

शापमय याद, वरदानमय विस्मरण।
स्वप्न की रात है, सत्य के प्रात क्षण!


कर्म-पथ / शंभुनाथ सिंह

पथ को करो प्यार,
होंगे सुमन तप्त अंगार!

पथ पर रुदन-हास,
कंटक सुमन-लास,

सुख-दुख सदा पास,
पथ ही अखिल सत्य का द्वार!

पथ को करो प्यार!
यह है मिलन राह,

मिलतीं बढ़ा बाँह,
संध्या-उषा-छाँह,

पथ मुक्ति-साधन, न भ्रम-भार!
पथ को करो प्यार!

हो ध्येय का ध्यान,
दिन-रात सम मान,

मन मत करो म्लान,
बढ़ते चलो, तट कि मझधार!

पथ को करो प्यार!
गति मुक्ति-अभियान,

गति विश्व वरदान,
गति का करो गान,

गति ही विजय है, अगति हार!
पथ को करो प्यार!


स्वयं से दूर / शंभुनाथ सिंह

तुम्हारे पास ज्यों-ज्यों आ रहा मैं,
स्वयं से दूर होता जा रहा मैं!

रहे ज्वाला भरे क्षण बीत मेरे,
खिले जिनमें सुरभिमय गीत मेरे,

रहा मैं हार अपनी इस विजय से
रहे अरमान हारे जीत मेरे,

मुझे क्षण-क्षण हँसाती जा रहीं तुम,
हँसी मेरी कि रोता जा रहा मैं!

खिलीं तुम दामिनी वन प्राण-घन में,
कि जीवन-लौ जगी तममय मरण में,

कहाँ वह चाँदनी छिप-सी गई पर
कि जिसकी छाँह में सोया तपन में,

प्रभा अपनी अमित बरसा रहीं तुम,
नयन की ज्योति खोता जा रहा मैं!

चलीं उद्दाम तुम निर्भर लहर वन,
गिरा तट पर खड़ा मेरा विटप मन,

लता पर छूट वह मुझसे गई क्यों
बने वरदान जिसके बाहु-बंधन,

कहीं मुझको बहाती जा रहीं तुम,
मगर निज को डुबोता जा रहा मैं!

लिए मधु तुम मिलीं जीवन-डगर में,
उषा-सी रात के अंतिम प्रहर में,

परस से पर मिटी क्यों जलपरी वह
मिली जो स्वप्न की पहली लहर में,

मुझे बेसुध बनाती जा रहीं तुम,
मगर सुधि-भार होता जा रहा मैं!

तुम्हारे पास ज्यों-ज्यों आ रहा मैं,
स्वयं से दूर होता जा रहा मैं!


मधु ऋतु / शंभुनाथ सिंह

मधु ऋतु के कुंजों में यौवन की प्यास खिली!
सुधि के सुरभित झोंकों से जीवन-डाल हिली!

किसलय के तन में फूटी मधु की अरुणाई,
बेसुध वन की चेतना उठी ले अँगड़ाई,

मधु-स्वप्न-श्रांत मधुकर-मन को छवि-छाँह मिली,
मधु ऋतु में बनकर तृप्ति विरह की प्यास खिली!

आई सपनों के तट पर स्वर की स्वर्ण-तरी,
नीलांचल में छिप गीतों की परियाँ उतरीं,

गूँजी जीवन के गुंजन से वन-कुंज-गली,
स्वर के वृंतों पर पिक-प्राणों की प्यास खिली!

जागे धरती के दिन के सतरंगे सपने,
कल्पना उठी खोले कंचन के पर अपने,

मधु गंध-अंध मन की जागी साधें पगली,
छवि की लपटों में सुधि-वेला की प्यास खिली!

आईं नर्तन करतीं कविता की किन्नरियाँ,
मधु से पागल खुल गई हृदय की पंखुरियाँ,

मलयज-छंदों में कवि-उर की रस-धार ढली,
केसर के गीतों में पतझर की प्यास खिली!


आज / शंभुनाथ सिंह

हाल बीच सन्नाटे में ज्यों गूँज उठे आवाज़!
झपकी की दुनिया में वैसे झमक उठीं तुम आज!

भीड़ भरे मंदिर में जैसे
उठे अगरु की गंध,

धूप-छाँह की झिलमिल में त्यों गमक उठीं तुम आज!
धूल भरी आँधी-आँधी में

ज्यों बिजली की कौंध,
थकी उनींदी आँखों में त्यों चमक उठीं तुम आज!

एवरेस्ट पर, अतलांतक में चाँद,
दीप्त एक ज्यों चाँद,

मेरे माथे पर, मन में त्यों दमक उठीं तुम आज!
दोपहरी में चलते-चलते

जैसे रुके बयार,
दिवा स्वप्न में चलती-सी त्यों थमक उठीं तुम आज!


आधी रात / शंभुनाथ सिंह 

रात आधी हो चली, क्यों नींद मेरी
दूर जाकर खो गई है किसी घर के

निभृत कमरे में, जहाँ शृंगार करके
जागरण में स्वप्न-चित्रों की चितेरी

पलक मूँदे ध्यान में है मग्न बाला!
रात आधी हो गई है, ज्ञान इसका

है न उसको, कल्पना का लोक जिसका
जगमगाता, है जहाँ दिन-सा उजाला

अनवरत। वह रूप नयनों में समाया;
फूल वह अब शूल बनकर गड़ रहा है

नयन में मन में। दिखाई पड़ रहा है
मुझे तम के पार...अब वह रूप-छाया

हिल रही है, आ रही है पास मेरे।
दूर हो जा सामने से ओ अँधेरे!

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