स्वर्णधूलि : सुमित्रानंदन पंत Swarndhuli Sumitranandan Pant




1. मुझे असत् से


मुझे असत् से ले जाओ हे सत्य ओर
मुझे तमस से उठा, दिखाओ ज्योति छोर,
मुझे मृत्यु से बचा, बनाओ अमृत भोर!
बार बार आकर अंतर में हे चिर परिचित,
दक्षिण मुख से, रुद्र, करो मेरी रक्षा नित!

2. स्वर्णधूलि


स्वर्ण बालुका किसने बरसा दी रे जगती के मरुथल मे,
सिकता पर स्वर्णांकित कर स्वर्गिक आभा जीवन मृग जल में!

स्वर्ण रेणु मिल गई न जाने कब धरती की मर्त्य धूलि से,
चित्रित कर, भर दी रज में नव जीवन ज्वाला अमर तूलि से!

अंधकार की गुहा दिशाओं में हँस उठी ज्योति से विस्तृत,
रजत सरित सा काल बह चला फेनिल स्वर्ण क्षणों से गुंफित!

खंडित सब हो उठा अखंडित, बने अपरिचित ज्यों चिर परिचित,
नाम रूप के भेद भर गए स्वर्ण चेतना से आलिंगित!

चक्षु वाक् मन श्रवण बन गए सूर्य अग्नि शशि दिशा परस्पर,
रूप गंध रस शब्द स्पर्श की झंकारों से पुलकित अंतर!

दैवी वीणा पुनः मानुषी वीणा बन नव स्वर में झंकृत,
आत्मा फिर से नव्य युग पुरुष को निज तप से करती सर्जित!

बीज बनें नव ज्योति वृत्तियों के जन मन में स्वर्ण धूलि कण,
पोषण करे प्ररोहों का नव अंध धरा रज का संघर्षण!

चीर आवरण भू के तम का स्वर्ण शस्य हों रश्मि अंकुरित,
मानस के स्वर्णिम पराग से धरणी के देशांतर गर्भित!

3. पतिता


रोता हाय मार कर माधव
वॄद्ध पड़ोसी जो चिर परिचित,
‘क्रूर, लुटेरे, हत्यारे... कर गए
बहू को, नीच, कलंकित!’

‘फूटा करम! धरम भी लूटा!’
शीष हिला, रोते सब परिजन,
‘हा अभागिनी! हा कलंकिनी!’
खिसक रहे गा गा कर पुरजन!

सिसक रही सहमी कोने में
अबला साँसों की सी ढेरी,
कोस रहीं घेरी पड़ोसिनें,
आँख चुराती घर की चेरी!

इतने में घर आता केशव,
‘हा बेटा!’ कर घोरतर रुदन
माँथा लेते पीट कुटुंबी,
छिन्नलता सा कँप उठता तन!

‘सब सुन चुका’ चीख़ता केशव,
‘बंद करो यह रोना धोना!
उठो मालती, लील जायगा
तुमको घर का काला कोना!

‘मन से होते मनुज कलंकित,
रज की देह सदा से कलुषित,
प्रेम पतित पावन है, तुमको
रहने दूँगा मैं न कलंकित!’

4. परकीया


विनत दृष्टि हो बोली करुणा,
आँखों में थे आँसू के घन,
‘क्या जाने क्या आप कहेंगे,
मेरा परकीया का जीवन!’

स्वच्छ सरोवर सा वह मानस,
नील शरद नभ से वे लोचन
कहते थे वह मर्म कथा जो
उमड़ रही थी उर में गोपन!

बोला विनय, ‘समझ सकता हूँ,
मैं त्यक्ता का मानस क्रंदन,
मेरे लिए पंच कन्या में
षष्ट आप हैं, पातक मोचन!

यदपि जबाला सदृश आपको
अर्पित कर अपना यौवन धन
देना पड़ा मूल्य जीवन का
तोड़ वाह्य सामाजिक बंधन!’

‘फिर भी लगता मुझे, आपने
किया पुण्य जीवन है यापन,
बतलाती यह मन की आभा,
कहता यह गरिमा का आनन!

‘पति पत्नी का सदाचार भी
नहीं मात्र परिणय से पावन,
काम निरत यदि दंपति जीवन,
भोग मात्र का परिणय साधन!

‘प्राणों के जीवन से ऊँचा
है समाज का जीवन निश्वय,
अंग लालसा में, समाजिक
सृजन शक्ति का होता अपचय!

‘पंकिल जीवन में पंकज सी
शोभित आप देह से ऊपर,
वही सत्य जो आप हृदय से,
शेष शून्य जग का आडंबर!

‘अतः स्वकीया या परकीया
जन समाज की है परिभाषा,
काम मुक्त औ’ प्रीति युक्त
होगी मनुष्यता, मुझको आशा!’

5. ग्रामीण


‘अच्छा, अच्छा,’ बोला श्रीधर
हाथ जोड़ कर, हो मर्माहत,
‘तुम शिक्षित, मैं मूर्ख ही सही,
व्यर्थ बहस, तुम ठीक, मैं ग़लत!

‘तुम पश्चिम के रंग में रँगे,
मैं हूँ दक़ियानूसी भारत,’
हँसा ठहाका मार मनोहर,
‘तुम औ’ कट्टर पंथी? लानत!’

‘सूट बूट में सजे धजे तुम
डाल गले फाँसी का फंदा,
तुम्हें कहे जो भारतीय, वह
है दो आँखोंवाला अंधा!

‘अपनी अपनी दृष्टि है,’ तुरत
दिया क्षुब्ध श्रीधर ने उत्तर,
‘भारतीय ही नहीं, बल्कि मैं
हूँ ग्रामीण हृदय के भीतर!

‘धोती कुरते चादर में भी
नई रोशनी के तुम नागर,
मैं बाहर की तड़क भड़क में
चमकीली गंगा जल गागर!’

‘यह सच है कि,’ मनोहर बोला,
‘तुम उथले पानी के डाभर,
मुझको चाहे नागर कह लो
या खारे पानी का सागर!’

‘तुमने केवल अधनंगे
भारत का गँवई तन देखा है,
श्रीधर संयत स्वर में बोला,
मैंने उसका मन देखा है!’

‘भारतीय भूसा पिंजर में
तुम हो मुखर पश्चिमी तोते
नागरिकों के दुराग्रहों
तर्कों वादों के पंडित थोथे!

‘मैं मन से ग्रामों का वासी
जो मृग तृष्णाओं से ऊपर
सहज आंतरिक श्रद्धा से
सद् विश्वासों पर रहते निर्भर!

‘जो अदृश्य विश्वास सरणि से
करते जीवन सत्य को ग्रहण,
जो न त्रिशंकु सदृश लटके हैं,
भू पर जिनके गड़े हैं चरण!

‘उस श्रद्धा विश्वास सूत्र में
बँधा हुआ मैं उनका सहचर
भारत की मिट्टी में बोए
जो प्रकाश के बीज हैं अमर!’
 सुमित्रानंदन पंत कविता संग्रह (मुख्य पृष्ठ देखें ) / Sumitranandan Pant Poem Introduction & Collection

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