Sudama Panday Dhumil ki Kavita / सुदामा पांडेय धूमिल की कविताएँ

धूमिल - 1936 - 1975 वाराणसी, उत्तर प्रदेश | ‘अकविता’ आंदोलन के समय उभरे हिंदी के चर्चित कवि। मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

रोटी और संसद/ धूमिल

एक आदमी
रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ—
‘यह तीसरा आदमी कौन है?’

मेरे देश की संसद मौन है।


मोचीराम  / धूमिल

राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला

और फिर
जैसे पतियाए हुए स्वर में

वह हँसते हुए बोला—
बाबूजी सच कहूँ—मेरी निगाह में

न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है

मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने

मरम्मत के लिए खड़ा है।
और असल बात तो यह है

कि वह चाहे जो है
जैसा है, जहाँ कहीं है

आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से

बाहर नहीं है
फिर भी मुझे ख़्याल रहता है

कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच
कहीं न कहीं एक आदमी है

जिस पर टाँके पड़ते हैं,
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर

हथौड़े की तरह सहता है।
यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं

और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’
बतलाते हैं

सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है

मसलन एक जूता है :
जूता क्या है—चकतियों की थैली है

इसे एक आदमी पहनता है
जिसे चेचक ने चुग लिया है

उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है
जैसे ‘टेलीफ़ून‘ के खंभे पर

कोई पतंग फँसी है
और खड़खड़ा रही है

‘बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?’
मैं कहना चाहता हूँ

मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है
मैं महसूस करता हूँ—भीतर से

एक आवाज़ आती है—’कैसे आदमी हो
अपनी जाति पर थूकते हो।’

आप यक़ीन करें, उस समय
मैं चकतियों की जगह आँखें टाँकता हूँ

और पेशे में पड़े हुए आदमी को
बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।

एक जूता और है जिससे पैर को
‘नाँधकर’ एक आदमी निकलता है

सैर को
न वह अक्लमंद है

न वक़्त का पाबंद है
उसकी आँखों में लालच है

हाथों में घड़ी है
उसे जाना कहीं नहीं है

मगर चेहरे पर
बड़ी हड़बड़ी है

वह कोई बनिया है
या बिसाती है

मगर रौब ऐसा कि हिटलर का नाती है
‘इशे बाँद्धो, उशे काट्टो, हियाँ ठोक्को, वहाँ पीट्टो

घिश्शा दो, अइशा चमकाओ, जूत्ते को ऐना बनाओ
…ओफ़्फ़! बड़ी गर्मी है’ रूमाल से हवा

करता है, मौसम के नाम पर बिसूरता है
सड़क पर ‘आतियों-जातियों’ को

बानर की तरह घूरता है
गरज़ यह कि घंटे भर खटवाता है

मगर नामा देते वक़्त
साफ ‘नट’ जाता है

'शरीफ़ों को लूटते हो’ वह गुर्राता है
और कुछ सिक्के फेंककर

आगे बढ़ जाता है
अचानक चिंहुककर सड़क से उछलता है

और पटरी पर चढ़ जाता है
चोट जब पेशे पर पड़ती है

तो कहीं-न-कहीं एक चोर कील
दबी रह जाती है

जो मौक़ा पाकर उभरती है
और अँगुली में गड़ती है

मगर इसका मतलब यह नहीं है
कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुझे हर वक़्त यह ख़्याल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच

कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं

जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट
छाती पर

हथौड़े की तरह सहता है
और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िंदा रहने के पीछे

अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर या रंडियों की

दलाली करके रोज़ी कमाने में
कोई फ़र्क़ नहीं है

और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी
अपने पेशे से छूटकर

भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है
सभी लोगों की तरह

भाषा उसे काटती है
मौसम सताता है

अब आप इस बसंत को ही लो,
यह दिन को ताँत की तरह तानता है

पेड़ों पर लाल-लाल पत्तों के हज़ारों सुखतल्ले
धूप में, सीझने के लिए लटकाता है

सच कहता हूँ—उस समय
राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना

मुश्किल हो जाता है
आँख कहीं जाती है

हाथ कहीं जाता है
मन किसी झुँझलाए हुए बच्चे-सा

काम पर आने से बार-बार इंकार करता है
लगता है कि चमड़े की शराफ़त के पीछे

कोई जंगल है जो आदमी पर
पेड़ से वार करता है

और यह चौंकने की नहीं, सोचने की बात है
मगर जो ज़िंदगी को किताब से नापता है

जो असलियत और अनुभव के बीच
ख़ून के किसी कमज़ात मौके पर कायर है

वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं, शायर है

असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का
शिकार है

जो यह सोचता कि पेशा एक जाति है
और भाषा पर

आदमी का नहीं, किसी जाति का अधिकार है
जबकि असलियत यह है कि आग

सबको जलाती है सच्चाई
सबसे होकर गुज़रती है

कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं
कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अंधे हैं

वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं

जबकि मैं जानता हूँ कि ‘इनकार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’

दोनों का मतलब एक है—
भविष्य गढ़ने में, ’चुप’ और ‘चीख़’

अपनी-अपनी जगह एक ही क़िस्म से
अपना-अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं।


देश-प्रेम : मेरे लिए / धूमिल

एक बीमार आदमी का वक्तव्य
दिन भर के बाद

भोजन कर लेने पर
देश-प्रेम से मस्त एक गीत

गुनगुनाता हूँ
जिसे अमीर ख़ुसरो ने लिखा है :

अन्य लोगों की तरह
मैं इतना कृतघ्न नहीं कि उस ज़मीन को धिक्कार दूँ

जिस पर मेरा जन्म खड़ा है
मेरे लिए मेरा देश—

जितना बड़ा है : उतना बड़ा है।
वह दिन बीत गया

जब किसी ने रिपब्लिक की जिल्द पर
सुकरात की अत्यंत कामातुर तस्वीर चिपका दी

और मैं दुखी हो गया।
वह दिन भी बीत गया—

जब ज़मीन पर देशों की सीमाएँ खिंचते ही
मेरे मुख पर झुर्रियाँ बढ़ जाती थीं।

किंतु जो कभी नहीं किया—
वही मैंने कब सीखा

रोना—और भूख के लिए
निरा पागलपन है

देश-प्रेम मेरे लिए—
अपनी सुरक्षा का

सर्वोत्तम साधन है।
सच्चाई अब मुझसे इतनी क़रीब है

कि रोशनी का होना भी
मेरे लिए केवल तहज़ीब है।

(हर चीज़ साफ़ है—
अपने हैं आप तो

सौ ख़ून माफ़ है।)
नेकर के नीचे का सारा नंगापन

कॉलर के ऊपर उग आया है :
चेहरे बड़े घिनौने लगते,

पर इससे क्या फ़र्क़ पड़ गया
अगर बड़ी छायाओं वाले बौने लगते

और अंत में—
सबकी सुनकर सब कुछ गुनकर

मैंने भी नक़्शे के ऊपर
लाल क़लम से जगह घेर दी

और उसी सीमा के भीतर
अपने घायल कबूतरों को

फिर से उड़ना सिखा रहा हूँ।


पटकथा / धूमिल

जब मैं बाहर आया
मेरे हाथों में

एक कविता थी और दिमाग़ में
आँतों का एक्स-रे।

वह काला धब्बा
कल तक एक शब्द था;

ख़ून के अँधेरे में
दवा का ट्रेडमार्क

बन गया था।
औरतों के लिए गै़र-ज़रूरी होने के बाद

अपनी ऊब का
दूसरा समाधान ढूँढ़ना ज़रूरी है।

मैंने सोचा!
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच

अपनी भूख को ज़िंदा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की

वाजिब मजबूरी है।
मैंने सोचा और संस्कार के

वर्जित इलाक़ों में
अपनी आदतों का शिकार

होने के पहले ही बाहर चला आया।
बाहर हवा थी

धूप थी
घास थी

मैंने कहा आज़ादी…
मुझे अच्छी तरह याद है—

मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली

दौड़ रही थी
उत्साह में

ख़ुद मेरा स्वर
मुझे अजनबी लग रहा था

मैंने कहा—आ-ज़ा-दी
और दौड़ता हुआ खेतों की ओर

गया। वहाँ कतार के कतार
अनाज के अँकुए फूट रहे थे

मैंने कहा—जैसे कसरत करते हुए
बच्चे। तारों पर

चिड़ियाँ चहचहा रही थीं
मैंने कहा—काँसे की बजती हुई घंटियाँ…

खेत की मेड़ पार करते हुए
मैंने एक बैल की पीठ थपथपाई

सड़क पर जाते हुए आदमी से
उसका नाम पूछा

और कहा—बधाई…
घर लौटकर

मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं
पुरानी तस्वीरों को दीवार से

उतारकर
उन्हें साफ़ किया

और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)
पोंछकर टाँग दिया।

मैंने दरवाज़े के बाहर
एक पौधा लगाया और कहा—

वन-महोत्सव…
और देर तक

हवा में गर्दन उचका-उचकाकर
लंबी-लंबी साँस खींचता रहा

देर तक महसूस करता रहा—
कि मेरे भीतर

वक़्त का सामना करने के लिए
औसतन, जवान ख़ून है

मगर, मुझे शांति चाहिए
इसलिए ख़ाली दड़बे में

एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया
‘गूँ... गुटरगूँ… गूँ… गुटरगूँ…’

और चहकते हुए कहा—
यही मेरी आस्था है

यही मेरा क़ानून है
इस तरह जो था उसे मैंने

जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था

उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया—

अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जाएगा

अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।

अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा

अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा

अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा

अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है

जैसा पहले हुआ करता था—
सूर्य, हमारा सपना है

मैं इंतज़ार करता रहा...
इंतज़ार करता रहा…

इंतज़ार करता रहा…
जनतंत्र, त्याग, स्वतंत्रता…

संस्कृति, शांति, मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे

सुनहरे वादे थे
ख़ुशफ़हम इरादे थे

सुंदर थे
मौलिक थे

मुखर थे
मैं सुनता रहा…

सुनता रहा…
सुनता रहा…

मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे

उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा

जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का

एक ही जवाब था
यानी कोट के बटन-होल में

महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।

वह हमें विश्वशांति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं ख़ुद को

समझाता रहा—’जो मैं चाहता हूँ—
वही होगा। होगा—आज नहीं तो कल

मगर सब कुछ सही होगा।'
भीड़ बढ़ती रही।

चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज

खाकर—निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।

योजनाएँ चलती रहीं
बंदूक़ों के कारख़ानों में

जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम उतार पर

होता था। हमारा संशय
हमें कोंचता था। हम उत्तेजित होकर

पूछते थे—यह क्या है?
ऐसा क्यों है?

फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में

हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को

ज़ुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे

कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…

इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…

मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज

युद्ध की आग से पिघलती हुई बर्फ़ में
बह गया।

मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह

मरे हुए साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़—

टूटे हुए रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक

कोई मौसम नहीं है
लोग—

घरों के भीतर नंगे हो गए हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं

विधवाएँ तमग़ा लूट रही हैं
सधवाएँ मंगल गा रही हैं

वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं

जगह-जगह तख़्तियाँ लटक रही हैं—
‘यह श्मशान है, यहाँ की तस्वीर लेना

सख़्त मना है।’
फिर भी उस उजाड़ में

कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है

मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध-मठ

बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अख़बार के मटमैले हाशिए पर

लेटे हुए, एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद, नाम है

यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…

हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ

जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी ज़ुबान का मतलब—

नफ़रत है।
साज़िश है।

अंधेर है।
यह मेरा देश है

और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?

एक शब्द… सिर्फ़ एक शब्द है :
कुहरा, कीचड़ और काँच से

बना हुआ…
एक भेड़ है

जो दूसरों की ठंड के लिए
अपनी पीठ पर

ऊन की फ़सल ढो रही है।
एक पेड़ है

जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की ज़ुबान में

हाँऽऽ... हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से

डरता है।
गाँवों में गंदे पनालों से लेकर

शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अमूर्त मुद्रा है

यह जनता…
जनतंत्र में

उसकी श्रद्धा
अटूट है

उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतंत्र है जिसमें

ज़िंदा रहने के लिए
घोड़े और घास को

एक जैसी छूट है
कैसी विडंबना है

कैसा झूठ है
दरअस्ल, अपने यहाँ जनतंत्र

एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान

मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआँ है

हर तरफ कुहासा है
जो दाँतों और दलदलों का दलाल है

वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है—

तटस्थता। यहाँ
कायरता के चेहरे पर

सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है

हर भूखा आदमी
उसके लिये, सबसे भद्दी

गाली है
हर तरफ कुआँ है

हर तरफ खाई है
यहाँ, सिर्फ़, वह आदमी, देश के क़रीब है

जो या तो मूर्ख है
या फिर ग़रीब है

मैं सोचता रहा
और घूमता रहा—

टूटे हुए पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आँखों के

अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुए पालों की

अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीज़ों के ढेर में

मैं खोई हुई आज़ादी का अर्थ
ढूँढ़ता रहा।

अपनी पसलियों के नीचे
अस्पतालों के बिस्तरों में

नुमाइशों में
बाज़ारों में

गाँवों में
जंगलों में

पहाड़ों पर
देश के इस छोर से उस छोर तक

उसी लोक-चेतना को
बार-बार टेरता रहा

जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शांति दे और

मेरे भीतर-बाहर का ज़हर
ख़ुद पी सके।

—और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमांत
…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वांत…ध्वांत…

मैं दोबारा चौंककर खड़ा हो गया
जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में

कंधों पर लुढ़क रहा था,
किसी झनझनाते हुए चाकू की तरह

खुलकर, कड़ा हो गया…
अचानक, अपने-आपमें ज़िंदा होने की

यह घटना
इस देश की परंपरा की—

एक बेमिसाल कड़ी थी
लेकिन इसे साहस मत कहो।

दरअस्ल, यह पुट्ठों तक चोट खाई हुई
गाय की घृणा थी

(ज़िंदा रहने की पुरज़ोर कोशिश)
जो उस आदमख़ोर की हविस से

बड़ी थी।
मगर उसके तुरंत बाद

मुझे झेलनी पड़ी थी—सबसे बड़ी ट्रैजेडी
अपने इतिहास की

जब दुनिया के स्याह और सफ़ेद चेहरों ने
विस्मय से देखा कि ताशकंद में

समझौते की सफ़ेद चादर के नीचे
एक शांति-यात्री की लाश थी

और अब यह किसी पौराणिक कथा के
उपसंहार की तरह है कि इसे देश में

रोशनी उन पहाड़ों से आई थी
जहाँ मेरे पड़ोसी ने मात

खाई थी।
मगर फिर मैं वहीं चला गया

अपने जुनून के अँधेरे में
फूहड़ इरादों के हाथों

छला गया।
वहाँ बंजर मैदान

कंकालों की नुमाइश कर रहे थे
गोदाम अनाजों से भरे पड़े थे और लोग

भूखों मर रहे थे
मैंने महसूस किया कि मैं वक़्त के

एक शर्मनाक दौर से गुज़र रहा हूँ
अब ऐसा वक़्त आ गया है जब कोई

किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का ख़ाली पेट

देखता है, न थरथराती हुई टाँगें
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कंधा’ देखता है

हर आदमी, सिर्फ़, अपना धंधा देखता है
सबने भाईचारा भुला दिया है

आत्मा की सरलता को भुलाकर
मतलब के अँधेरे में (एक राष्ट्रीय मुहावरे की बग़ल में)

सुला दिया है।
सहानुभूति और प्यार

अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिए
एक आदमी दूसरे को,अकेले—

अँधेरे में ले जाता है और
उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है

ठीक उस मोची की तरह जो चौक से
गुज़रते हुए देहाती को

प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर
रबर के तल्ले में

लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ
ठोंक देता है और उसके नहीं-नहीं के बावजूद

डपटकर पैसा वसूलता है
गरज़ यह है कि अपराध

अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर

लाल-भड़क फूलता है
मैंने देखा कि इस जनतांत्रिक जंगल में

हर तरफ़ हत्याओं के नीचे से निकलते है
हरे-हरे हाथ, और पेड़ों पर

पत्तों की ज़ुबान बनकर लटक जाते हैं
वे ऐसी भाषा बोलते हैं जिसे सुनकर

नागरिकता की गोधूलि में
घर लौटते मुसाफ़िर

अपना रास्ता भटक जाते हैं
उन्होंने किसी चीज़ को

सही जगह नहीं रहने दिया
न संज्ञा

न विशेषण
न सर्वनाम

एक समूचा और सही वाक्य
टूटकर

‘बि ख र’ गया है
उनका व्याकरण इस देश की

शिराओं में छिपे हुए कारकों का
हत्यारा है

उनकी सख़्त पकड़ के नीचे
भूख से मरा हुआ आदमी

इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय

सबसे सटीक नारा है
वे खेतों में भूख और शहरों में

अफ़वाहों के पुलिंदे फेंकते हैं
देश और धर्म और नैतिकता की

दुहाई देकर
कुछ लोगों की सुविधा

दूसरों की ‘हाय’ पर सेंकते हैं
वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं—

उसकी रीढ़ की हड्डी ग़ायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और

दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा
करवट बदलकर

सो जाती है
मैं देखता रहा…

देखता रहा…
हर तरफ ऊब थी

संशय था
नफ़रत थी

मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे
असहाय था। उसमें

सारी चीज़ों को नए सिरे से बदलने की
बेचैनी थी, रोष था

लेकिन उसका ग़ुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था :

आग और आँसू और हाय का।
इस तरह एक दिन—

जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे ख़ून में एक काली आँधी—

दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोए हुए

वहसी इरादों को
झकझोर कर जगा रही थी

अचानक, नींद की असंख्य पर्तों में
डूबते हुए मैंने देखा

मेरी उलझनों के अँधेरे में
एक हमशक्ल खड़ा है

मैंने उससे पूछा—’तुम कौन हो?
यहाँ क्यों आए हो?

तुम्हें क्या हुआ है?’
‘तुमने पहचाना नहीं—मैं हिंदुस्तान हूँ

हाँ—मैं हिंदुस्तान हूँ’,
वह हँसता है—ऐसी हँसी कि दिल

दहल जाता है
कलेजा मुँह को आता है

और मैं हैरान हूँ
‘यहाँ आओ

मेरे पास आओ
मुझे छुओ।

मुझे जियो। मेरे साथ चलो
मेरा यक़ीन करो। इस दलदल से

बाहर निकलो!
सुनो!

तुम चाहे जिसे चुनो
मगर इसे नहीं। इसे बदलो।'

मुझे लगा—आवाज़
जैसे किसी जलते हुए कुएँ से

आ रही है।
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट

जैसे कोई मादा भेड़िया
अपने छौने को दूध पिला रही है

साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है
मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था

उसकी आवाज़ में
असंख्य नरकों की घृणा भरी थी

वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर
बोल रहा था। मगर उसकी आँख

ग़ुस्से में भी हरी थी
वह कह रहा था—

‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में
वक़्त की बदरंग छायाएँ उल्टी कर रही हैं

और तुम पेड़ों की छाल गिनकर
भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो

तुम एक ऐसी ज़िंदगी से गुज़र रहे हो
जिसमें न कोई तुक है

न सुख है
तुम अपनी शापित परछाईं से टकराकर

रास्ते में रुक गए हो
तुम जो हर चीज़

अपने दाँतों के नीचे
खाने के आदी हो

चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो
अचानक, इस तरह, क्यों चुक गए हो

वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से

रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है

जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गई है
या कि शर्म

अब तुम्हारी सहूलियत बन गई है
नहीं—सरलता की तरफ़ इस तरह

मत दौड़ो
उसमें भूख और मंदिर की रोशनी का

रिश्ता है। वह बनिए की पूँजी का
आधार है

मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई
दुनिया में

आसानी से समझ में आने वाली चीज़
सिर्फ़ दीवार है।

और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का
हिस्सा बन गई है

इसे झटक कर अलग करो
अपनी आदतों में

फूलों की जगह पत्थर भरो
मासूमियत के हर तकाज़े को

ठोकर मार दो
अब वक़्त आ गया है तुम उठो

और अपनी ऊब को आकार दो।
सुनो !

आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ
जिसके आगे हर सच्चाई

छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क

रोटी है।
मगर तुम्हारी भूख और भाषा में

यदि सही दूरी नहीं है
तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो

क्योंकि पशुता—
सिर्फ़ पूँछ होने की मजबूरी नहीं है

वह आदमी को वहीं ले जाती है
जहाँ भूख

सबसे पहले भाषा को खाती है
वक़्त सिर्फ़ उसका चेहरा बिगाड़ता है

जो अपने चेहरे की राख
दूसरों के रूमाल से झाड़ता है

जो अपना हाथ
मैला होने से डरता है

वह एक नहीं ग्यारह कायरों की
मौत मरता है

और सुनो! नफ़रत और रोशनी
सिर्फ़ उसके हिस्से की चीज़ हैं

जिसे जंगल के हाशिए पर
जीने की तमीज़ है

इसलिए उठो और अपने भीतर
सोए हुए जंगल को

आवाज़ दो
उसे जगाओ और देखो—

कि तुम अकेले नहीं हो
और न किसी के मुहताज हो

लाखों हैं जो तुम्हारे इंतज़ार में खडे़ हैं
वहाँ चलो। उनका साथ दो

और इस तिलस्म का जादू उतारने में
उनकी मदद करो और साबित करो

कि वे सारी चीज़ें अंधी हो गई हैं
जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’

मैं पूरी तत्परता से उसे सुन रहा था
एक के बाद दूसरा

दूसरे के बाद तीसरा
तीसरे के बाद चौथा

चौथे के बाद पाँचवाँ…
यानी एक के बाद दूसरा विकल्प

चुन रहा था
मगर मैं हिचक रहा था

क्योंकि मेरे पास
कुल जमा थोड़ी सुविधाएँ थीं

जो मेरी सीमाएँ थीं
यद्यपि यह सही है कि मैं

कोई ठंडा आदमी नहीं हूँ
मुझमें भी आग है—

मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती

क्योंकि उसके चारों तरफ़ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’ दिमाग़ है

जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता

कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।

कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की

मुट्ठी भी तनी रहे… और यही है कि बात
फैलने की हद तक

आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार

चंद सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है

मैं ख़ुद को कुरेद रहा था
अपने बहाने उन तमाम लोगों की असफलताओं को

सोच रहा था जो मेरे नज़दीक थे।
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर

जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था, नोच रहा था

पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुए
मैंने आदमी के भीतर की मैल

देख ली थी। मेरा सिर
भिन्ना रहा था

मेरा हृदय भारी था
मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं

अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से
थोड़ी देर के लिए

बचना चाह रहा था
जो अपनी पैनी आँखों से

मेरी बेबसी और मेरा उथलापन
थाह रहा था

प्रस्तावित भीड़ में
शरीक होने के लिए

अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था
अचानक, उसने मेरा हाथ पकड़कर

खींच लिया और मैं
जेब में जूतों का टोकन और दिमाग़ में

ताजे़ अख़बार की कतरन लिए हुए
धड़ाम से—

चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर
मत-पेटियों के

गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा
नींद के भीतर यह दूसरी नींद है

और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है
सिर्फ़ एक शोर है

जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं
शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा…

राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…
सैन्यशक्ति देशभक्ति आज़ादी वीसा…

वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…
शांति क्रांति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…

एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…
झाँय-झाँय, खाँय-खाँय, हाय-हाय, साँय-साँय…

मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ
और अँधेरे में गाड़ दी है

आँखों की रोशनी।
सब कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है

मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में
मैंने देखा हर तरफ़

रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए

गुट से गुट टकरा रहे हैं
वे एक-दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं

एक दूसरे को दुर-दुर, बिल-बिल कर रहे हैं
हर तरफ़ तरह-तरह के जंतु हैं

श्रीमान किंतु हैं
मिस्टर परंतु हैं

कुछ रोगी हैं
कुछ भोगी हैं

कुछ हिजड़े हैं
कुछ जोगी हैं

तिजोरियों के
प्रशिक्षित दलाल हैं

आँखों के अंधे हैं
घर के कंगाल हैं

गूँगे हैं
बहरे हैं

उथले हैं, गहरे हैं।
गिरते हुए लोग हैं

अकड़ते हुए लोग हैं
भागते हुए लोग हैं

पकड़ते हुए लोग हैं
गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं

एक दूसरे से नफ़रत करते हुए वे
इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में

असंख्य रोग हैं
और उनका एकमात्र इलाज—

चुनाव है।
लेकिन मुझे लगता कि एक विशाल दलदल के किनारे

बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है

जिससे लगातार—भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है

उसमें जाति और धर्म और संप्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े

किलबिला रहे हैं और अंधकार में
डूबी हुई पृथ्वी

(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है

मगर आपस में नफ़रत करते हुए वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि

‘चुनाव’ ही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से

किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुए
न उन्हें मलाल है, न भय है

न लाज है
दरअस्ल, उन्हें एक मौक़ा मिला है

और इसी बहाने
वे अपने पड़ोसी को पराजित कर रहे हैं

मैंने देखा कि हर तरफ़
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है

जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं

लीद रहे हैं
चर रहे हैं

मैंने ऊब और ग़ुस्से को
ग़लत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुए देखा

मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुए देखा

मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुए देखा

मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुए देखा…

मैं यह सब देख ही रहा था कि एक नया रेला आया—
उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस। वे किसी आदमी को

हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे
उसे एक दूसरे से छीन रहे थे। उसे घसीट रहे थे।

चूम रहे थे। पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।
गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत

गा रहे थे। उस पर अनगिनत झंडे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बंद

थीं। उसका चेहरा ख़ून और आँसू से तर था। ’मूर्खों!
यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने

उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?
मैं हतप्रभ-सा खड़ा था

और मेरा हमशक्ल
मेरे पैरों के पास

मूर्च्छित-सा
पड़ा था—

दुख और भय से झुरझुरी लेकर
मैं उस पर झुक गया

किंतु बीच में ही रुक गया
उसका हाथ ऊपर उठा था

ख़ून और आँसू से तर चेहरा
मुस्कुराया था। उसकी आँखों का हरापन

उसकी आवाज़ में उतर आया था—
‘दुखी मत हो। यही मेरी नियति है।

मैं हिंदुस्तान हूँ। जब भी मैंने
उन्हें उजाले से जोड़ा है

उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है
इसी तरह तोड़ा है

मगर समय गवाह है
कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’

मैंने सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है
जैसे किसी जले हुए जंगल में

पानी का एक ठंडा सोता बह रहा है
घास की की ताज़गी-भरी

ऐसी आवाज़ है
जो न किसी से ख़ुश है, न नाराज़ है।

‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है
संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है

फिर भी वे अपने हैं…
अपने हैं…

अपने हैं…
जीवित भविष्य के सुंदरतम सपने हैं

नहीं—यह मेरे लिए दुखी होने का समय
नहीं है। अपने लोगों की घृणा के

इस महोत्सव में
मैं शापित निश्चय हूँ

मुझे किसी से भय नहीं है।
‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ

चलो। इससे पहले कि वे
ग़लत हाथों के हथियार हों

इससे पहले कि वे नारों और इश्तहारों से
काले बाज़ार हों

उनसे मिलो। उन्हें बदलो।
नहीं—भीड़ के ख़िलाफ़ रुकना

एक ख़ूनी विचार है
क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी

इस हिंसक भीड़ का
अंधा शिकार है।

तुम मेरी चिंता मत करो।
मैं हर वक़्त सिर्फ़ एक चेहरा नहीं हूँ

जहाँ वर्तमान
अपने शिकारी कुत्ते उतारता है

अक्सर में मिट्टी का हरकत करता हुआ
वह टुकड़ा हूँ

जो आदमी की शिराओं में
बहते हुए खू़न को

उसके सही नाम से पुकारता हूँ
इसलिए मैं कहता हूँ, जाओ, और

देखो कि वे लोग…'
मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने

मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता
किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।

अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल
मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में

एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर
पर्दे के पीछे ढकेल दिया।

भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में
पता नहीं कब और कैसे और कहाँ—

कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को
काटते हुए मैं चीख़ पड़ा—

‘हत्यारा! हत्यारा!! हत्यारा!!!’
[ मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। मैंने यह

किसको कहा था। शायद अपने-आपको
शायद उस हमशक्ल को (जिसने ख़ुद को

हिंदुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को
मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है ]

मेरी नींद टूट चुकी थी
मेरा पूरा जिस्म पसीने में

सराबोर था। मेरे आस-पास से
तरह-तरह के लोग गुज़र रहे थे।

हर तरफ़ हलचल थी, शोर था।
कुछ लोग कह रहे थे कि इन दिनों

एक ख़ास परिवर्तन हुआ है
जनता जगी है। सब

प्रभु की माया है
एक लंबे इंतज़ार के बाद

चीज़ों का असली चेहरा
उजाले में आया है

और मैं चुपचाप सुनता हूँ
हाँ शायद—

मैंने भी अपने भीतर
(कहीं बहुत गहरे)

‘कुछ जलता हुआ-सा‘ छुआ है
लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है

नींद में हुआ है
और तब से आज तक

नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुए
मैंने कई रातें जागकर गुज़ार दी हैं

हफ़्तों पर हफ़्ते तह किए हैं
अपनी परेशानी के

निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिए हैं।

और हर बार मुझे लगा है कि कहीं
कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है

ज़िंदगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है
जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है

हाँ, यह सही है कि इन दिनों
कुछ अर्ज़ियाँ मंज़ूर हुई हैं

कुछ तबादले हुए हैं
कल तक जो थे नहले

आज
दहले हुए हैं

हाँ, यह सही है कि इन दिनों
मंत्री जब प्रजा के सामने आता है

तो पहले से ज़्यादा मुस्कुराता है
नए-नए वादे करता है

और यह सिर्फ़ घास के
सामने होने की मजबूरी है

वरना उस भलेमानुस को
यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन

और अपने निजी बिस्तर के बीच
कितने जूतों की दूरी है।

हाँ, यह सही है कि इन दिनों—चीज़ों के
भाव कुछ चढ़ गए हैं। अख़बारों के

शीर्षक दिलचस्प हैं, नए हैं।
मंदी की मार से

पट पड़ी हुई चीज़ें, बाज़ार में
सहसा उछल गई हैं

हाँ, यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ़ टोपियाँ बदल गई हैं और—

सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर

अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में

भरी हुई नाव में
हर तरफ़, विरोधी विचारों का

दलदल है
सतहों पर हलचल है

नए-नए नारे हैं
भाषण में जोश है

पानी ही पानी है
पर

की

ड़
ख़ामोश है

मैं रोज़ देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्ज़ा गरम होकर

अलग छिटक गया है और
ठंडा होते ही

फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है

न दया है
नहीं—अपना कोई हमदर्द

यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।

मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाज़ा खटखटाया है

मगर बेकार… मैंने जिसकी पूँछ
उठाई है उसको मादा

पाया है।
वे सब के सब तिजोरियों के

दुभाषिए हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।

अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं। लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।

यानी—
क़ानून की भाषा बोलता हुआ

अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
भूख और भूख की आड़ में

चबाई गई चीज़ों का अक्स
उनके दाँतों पर ढूँढ़ना

बेकार है। समाजवाद
उनकी ज़ुबान पर अपनी सुरक्षा का

एक आधुनिक मुहावरा है।
मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद

मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है

और उनमें बालू और पानी भरा है।
यहाँ जनता एक गाड़ी है

एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम

‘दया’ है
और भूख में

तनी हुई मुठ्ठी का नाम
नक्सलबाड़ी है

मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को

प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को

जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है

लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि

अपने यहां संसद—
तेली की वह घानी है

जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है

और यदि यह सच नहीं है
तो वहाँ एक ईमानदार आदमी को

अपनी ईमानदारी का
मलाल क्यों है?

जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल—क्यों है?

मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल
करता हूँ जिसका मेरे पास

कोई उत्तर नहीं है
और आज तक—

नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुए
मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं

हफ़्ते पर हफ़्ते तह किए हैं। ऊब के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण

जिए हैं।
मेरे सामने वही चिरपरिचित अंधकार है

संशय की अनिश्चयग्रस्त ठंडी मुद्राएँ हैं
हर तरफ़

शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह

उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश

पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है।


आज मैं लड़ रहा हूँ / धूमिल

फूलों की हँसी के ख़िलाफ़
ज़ंजीरें खनखना रही हैं

और रिश्ते—
मुहावरा बदलने की फ़िराक़ में हैं

आज अँधेरा है और ख़ून
लगा हुआ है हाथों में

जिसे हमने हासिल किया है
वह पालने में नहीं—रक्त लथपथ

कराहों की बग़ल में पड़ा है।
बच्चे भूखे हैं :

माँ के चेहरे पत्थर,
पिता जैसे काठ : अपनी ही आग में

जले है ज्यों सारा घर।
पेशेवर गुलाबों की हँसी ने

ख़ारिज कर दिया है वसंत
और कविता की नसों में

बहता हुआ ख़ून
ज़रूरत की जगह

ज़हमत बन गया है
अक्सर उठते हैं सवाल

कहाँ है युवा-जन?
परिवर्तन के आग्नि-चक्र?

क्षुधित इतिहास?
पीले पत्ते—

पतझड़ की ओर उड़ते गए हैं?
चुटकुलों-सी घूमती लड़कियों के स्तन

नकली है? नकली हैं युवकों के दाँत?
वे जबड़े जाम क्यों हैं

जिन्होंने ख़ून की रपट पढ़ी है?
मैं सुनता हूँ। उत्तर धीरे से

मुझमें उभरता है, जैसे काल-कोठरी की
दीवार पर उभरते हैं शब्द :

कल सुनना मुझे—
जब दूध के पौधे झर रहे हों सफ़ेद फूल

निःशब्द पीते हुए बच्चे की ज़ुबान पर
और रोटी खाई जा रही हो चौके में

गोश्त के साथ। जब
खटकर (कमाकर) खाने की ख़ुशी

परिवार और भाईचारे में
बदल रही हो—कल सुनना मुझे।

आज मैं लड़ रहा हूँ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

Amir Khusrow Dohe Kavita अमीर खुसरो के दोहे गीत कविता पहेलियाँ