चाचा हितवृंदावनदास के पद | Chacha Hit Vrindavandas Ji ke Pad Kavya

1708 - 1793 अजमेर, राजस्थान
'राधावल्लभ संप्रदाय' से संबंधित। भाव-वैचित्र्य और काव्य-प्रौढ़ता के लिए विख्यात।

चाचा हितवृंदावनदास के पद

 यह छबि बाढ़ो री रजनी/चाचा हितवृंदावनदास

यह छबि बाढ़ो री रजनी, खेलत रास रसिकमनी माई।
कानन वर की महकनि, तैसिय सरद-जुन्हाई॥

पुलिन प्रकास मध्य मनि-मंडल तहँ राजत हरि-राधा।
प्रतिबिंबित तन दुरनि-मुरनि में तब छबि बढ़त अगाधा॥

गौर-स्याम छबि-सदन बदन पर फूबि रहे स्रम-कन ऐसे।
नील कनक-अंबुज अंतर धरे, ओपि जलज-मनि जैसे॥

झलकत हार, चलत कल कुंडल, मुख मंयक-ज्यौं सौहैं।
वारों सरद निसा ससि केतिक, नैन कटाच्छनि मोहैं॥

थेई-थेई बचन बदति पिय प्यारी प्रगटति नृत्य नई गति।
बृंदावन हित, तान-गान-रस, अलि हित रूप कुसल अति॥


देखा-देखी रसिक न ह्वैहै/चाचा हितवृंदावनदास


देखा-देखी रसिक न ह्वैहै, रस-मारग है बंगा।

कहा सिंह की सरवर करिहैं, गीदर फिरै जु रंका?
असहन निंदा करत पराई, कबौं न मानी संका।

‘बृंदावन हितरूप’, रसिक जिन, दिय अनन्य-पथ डंका॥


 हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास/चाचा हितवृंदावनदास

 

हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास।
जहाँ त्रिभुवन-रूप सोभा, रीझि कियौ निवास॥

प्रतिबिंब तरल कपोल कमनी जुग तरौना कान।
सुधा-सागर मध्य बैठे, मनों रबि जुग न्हान॥

छबि-भरे नवकंज-दल से, नेह-पूरित नैन।
पूतरी मधु मधुप-छौना, बैठि भूले गैन॥

कुटिल भृकुटि अनूप सोभा, कहा कहौ बिसेख।
मनहुँ ससि पर स्याम बदरी जुगल किंचित रेख॥

लसतमाल बिलास ऊपर, तिलक नगनि जराय।
मनहुँ चढ़ै बिमान ग्रहगन, ससिहिं भेंटत जाय॥

मंद मुसुकनि, दसन दमकनि दामिनी दुति हरी।
‘बृंदावन हित’ रूप स्वामिनी कौन विधि रचि करी॥


प्रीतम, तुम तो दृगनि बसत हौ/चाचा हितवृंदावनदास


 
प्रीतम, तुम तो दृगनि बसत हौ।

कहा भरोसे ह्वै पूछत हौ, कै चतुराई करि जू हँसत हौ?
लीजै परखि स्वरूप आपनो, पुतरिन में जु लसत हौ।

बृंदावन हितरूप, रसिक तुम, कुंज लड़ावत हिय हुलसत हौ॥




सोभा केहि बिधि बरनि सुनाऊँ/चाचा हितवृंदावनदास


 

सोभा केहि बिधि बरनि सुनाऊँ।
इक रसना, सोउ लोचन-हानी, कहौ पार क्यों पाऊँ॥

अंग-अग लावन्य-माधुरी, बुधि-बल किती बताऊँ।
अतुलित सुनति कहि गये क्यों, दृग पल रजि धरि जू उचाऊँ॥

नव वय-संधि दुहुनि नित उलहत, जब देखौ तब औरे।
यहि कौतुक मेरी सुनि सजनी, चित न रहत इक ठौरे॥

लोक न सुनी दृग नहिं देखी, ऐसी रूप निकाई।
मेरी तेरी कहा चलो, खग-मृग-मति प्रेम बिकाई॥

कबहूँ गौर स्याम तन कबहूँ लोचन प्यासे धावैं।
कह घटि जात सिंध कौ, पंक्षी जो चोंचन भरि लावैं॥

सुन्दरता की हद मुरलीधर, बेहद छबि श्रीराधा।
गावैं बपु अनंत धरि सारद, तऊँ न पूजै साधा॥

न्याइ काम करवट ह्वै निकसत, पिय अरु रूप गुमानी।
वृंदावन हितरूप कियों बस, सो कानन की रानी॥




भजन भावना होय न परसी/चाचा हितवृंदावनदास


 
भजन भावना होय न परसी, प्रेम नहीं उर कपटी।

कुआँ पर्यौ आकाश उड़त खग, ताकों करत जु झपटी॥
रसिक कहावैं, कोई जिनके जुगल मिलन चीतपटी।

‘बृंदावन हितरूप’ कहाँ लगि बरनाँ सृष्टि अटपटी॥

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