बुल्ला साहब के दोहे (संत यारी के शिष्य) Bulla Sahab ke Dohe
आठ पहर चौंसठ घरी, जन बुल्ला घर ध्यान।
नहिं जानो कौनी घरी, आइ मिलैं भगवान॥
अछै रंग में रंगिया, दीन्ह्यो प्रान अकोल।
उनमुनि मुद्रा भस्म धरि, बोलत अमृत बोल॥
जग आये जग जागिये, पागिये हरि के नाम।
बुल्ला कहै बिचारि कै, छोड़ि देहु तन धाम॥
बिना नीर बिनु मालिहीं, बिनु सींचे रंग होय।
बिनु नैनन तहँ दरसनो, अस अचरज इक सोय॥
बोलत डोलत हँसि खेलत, आपुहिं करत कलोल।
अरज करों बिन दामहीं, बुल्लहिं लीजै मोल॥
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