भक्त रूपकला के दोहे (रसिक भक्त कवि) Bhakt Rupkala ke Dohe

 श्री जानकि-पद-कंज सखि, करहि जासु उर ऐन।

बिनु प्रयास तेहि पर द्रवहि, रघुपति राजिव नैन॥



खात पियत बीती निसा, अँचवत भा भिनुसार।

रूपकला धिक-धिक तोहि, गर न लगायो यार॥



देह खेह बद्ध कर्म महँ, पर यह मानस नेम।

कर जोड़े सन्मुख सदा, सादर खड़ा सप्रेम॥



धन्य-धन्य जे ध्यावही, चरण-चिन्ह सियराम के।

धनि-धनि जन जे पूजही, साधु संत श्रीधाम के॥



तजि कुसंग सत्संग नित, कीजिय सहित विवेक।

संप्रदाय निज की सदा, राखिये सादर टेक॥



दोष-कोष मोहि जानि पिय, जो कुछ करहू सो थोर।

अस विचारि अपनावहु, समझि आपुनी ओर॥


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