Mubarak ke Dohe Kavit Savaiyya शृंगारी कवि मुबारक के दोहे सवैया कवित्त

 मुबारक के दोहे Mubarak ke DOhe 


गोरे मुख पर तिल लसे ताहि करौ परनाम। 
मानहु चंद बिछाइकै बैठे सालिगराम॥ 

गोरे मुख पर तिल लसत मेटत है दुख द्वंद। 
मानहु बेटा भानु को रह्यो गोद लै चंद॥ 

तिय निहात जल अलक ते, चुवत नयन की कोर। 
मनु खंजन मुख देत अहि, अमृत पोंछि निचोर॥ 

विधि कपोल टिकिया करी, तहँ तिल धरो बनाय। 
यह मन छधित फकीर ज्यों, रहैं टकटकी लाय॥ 

छूटो चंदन भाल तें, अलक ऊपर छबि देत। 
डसी उलटि मनु नागिनी उदर बिराजत सेत॥ 

तिय नहात जल अलक ते चुअत नयन की कोर। 
मनु खंजन मुख देत अहि अमृत पोंछि निचोर॥ 

तेरे मुख कौ देख ससि कारिस लई लगाय। 
नाम कलंकी ह्वै गयो घटै बढ़ै पछताए॥ 

छत्र तरयोना लट चमर गाल सिंहासन राज। 
सोहत तिल राजाधि सम अंग सुदेसर साज॥ 

बदन चंद मंगल अधर बुध बानी गुरु अंग। 
सुक्र दसन तिल सनि लसे अंबर पिय रवि संग॥ 

बेसरि मोती मीत मन काँप दियो लटकाय। 
तिल हबसी लट ताजियो कहै अनत क्यों जाय॥ 

अलक भाल केसरि सनी घूंघट हरित सोहात। 
मनु पुर इन के पात पर उरग सारदू न्हात॥ 

निछुटो टीको भाल तें अटक्यो लट के छोर। 
मनो फिरावत मोहियो चंद लए चक डोर॥ 

चिबुक कूप में मन फँस्यो, छबि जल तृषा बिचारी। 
कढ़त मुबारक ताहि तिय अलक डोर सो डारि॥ 

चिबुक रूप रसरी अलक तिल सुचरस दृग बैल। 
बारी बार सिंगार की सींचत मन मथ छैल॥ 

मुबारक के कवित्त Mubarak ke Kavitt


कनक वरन बाल नगन लसत भाल मुबारक

Kanak varan baal nagan lasat bhaal Mubarak,


कनक वरन बाल नगन लसत भाल, 

मोतिन के माल उर सोहैं भली भाँति है। 

चंदन चढ़ाई चारु चंद्रमुखी मोहिनी सी, 

प्रात ही अन्हाइ पगुधारे मुसकाति है॥ 

चूनरी विचित्र स्याम सजि कै मुबारक जू, 

ढाकि नख सिख तें निपट सकुचाति है। 

चंद में लपेटि कै समेटि के नखत मानो, 

दिन को प्रनाम किये राति चली जाति है॥ 


पानिप के पुंज सुघराई के सदन सुख मुबारक

Paani ke punj sughrayi ke sadan sukh Mubarak


पानिप के पुंज सुघराई के सदन सुख, 

शोभा के समुद्र साव धान मन मौज के। 

लाजन के वोहित पुरोहित प्रमोदन के, 

नेह के नकीब चक्रवती चित्त चोज के॥ 

दया के निधान पतिव्रत के प्रधान युग, 

नैन ये मुबारक विधान नव रोज के। 

मीनन के सिरताज मृगन के महाराज, 

साहिब सरोज के मुसाहिब मनोज के॥ 

बाजत नगारे घन ताल देत नदी नारे मुबारक
Baajat nagare ghan taal det nadhi naare Mubarak

 
बाजत नगारे घन ताल देत नदी नारे, 

झींगुरन झांझ भेरी भृंगन बजाई है। 

कोकिल अलापचारी, नील ग्रीव नृत्यकारी, 

पाँव बीनधारी चारी चातक लगाई है॥ 

मनि भाल जुगुनूँ मुबारक तिमिर थार, 

चौमुख चिराग चारु चपला जराई है॥ 

बालम बिदेस नए दुख को जनम भयो 

पावस हमारे लायो बिरह बधोई है॥ 


मुबारक के सवैया Mubarak ke Sawaiya


बंसी बजावत आनि कढ़ो वा मुबारक
Bansi bajaavat aani kadho va Mubarak

बंसी बजावत आनि कढ़ो वा गली में छली कछु जादू सो डारे। 

नेकु चितै तिरछी करि भौंह चलो गयो मोहन मूठी सो मारे। 

वाही घरीक डरी वह सेज पै नेकु न आवत प्रान सँभारे। 

जी है तौ जीहै न जीहै सखी न तो पीहै सबै बिष नंद के द्वारे॥ 


खेली कहा अलबेली इतै उत मुबारक
Kheli kaha albeli itai ut Mubarak

 
खेली कहा अलबेली इतै उत तेरे समय की सहेली मिलाइहौं। 

गाइहौं गीत बनाइहौं स्वाँग मुबारक अपने संग सुवाइहौं॥ 

प्रौढ़ी सो प्रान की प्यारी चली प्रिय देखि कह्यौ चल मै फिर आइहौं। 

जानि सयानप की बतियाँ यह कोहि लगै डर आगे न जाइहौं॥ 


कौल से पानि कपोल धरे वर मुबारक
Kaul se paani kapole dhare var Mubarak

कौल से पानि कपोल धरे वर वारि लौ वारि भरे हिय हारे। 

चित्र विचित्र भई सी भई है नई भृकुटी गई नींद निवारे। 

रावरी लागी है दीठि मुबारक ताते कहैं हम बात पुकारे। 

जागि है जीहै तो जीहै सबै विष पीहै न तो सब नंद के द्वारे॥ 


गूजेंगे भोंर पराग भरे बन मुबारक
Goojenge bhon parag bharay ban Mubarak

 गूजेंगे भोंर पराग भरे बन बोलेंगे चातक औ पिक गाइकें। 

फूलेंगे टेसू कुसुंभ जहाँ लग दौरेगो काम कमान चढ़ाइकें॥ 

पौन बहेगी सुगंध मुबारक लागे गी ही में सलाग सी आइकें। 

मोरो मनायो न मानेगी भामिनी ऐहै बसंत लै जैहै मनाइके॥ 


एक ही सेज में राधिका मोहन मुबारक
Ek hi sej mein Radhika Mohan Mubarak

 
एक ही सेज में राधिका मोहन धाइ लई सोइ सोबा सलोनी। 

स्वावै ‘मुबारक’ मद्ध में कानकों राधे कहै यह बात न होनी॥ 

साँवरे सों मिली साँवरी होहि न बावरी बान सिखाई है कोनीं। 

सोनीं को रंग कसौटो लगै रे कसौटी को रंग लगै नहिं सोनीं॥ 

आई सुहाई नई बरखा रितु मुबारक
Aayi suhai nayi barkha ritu Mubarak

 
आई सुहाई नई बरखा रितु रीझि हमारी कही पिय कीजिए। 

जैसे ही रंग लसै चुनरी पिय तैसी ही पाग तुहूँ रंग लीजिए॥ 

झूला पै झूलहि एकहि संग ‘मुबारक’ एतो कह्यो पुन कीजिए। 

जैसे लसै घनस्याम सौं दामिनी तैसें तुम्हारे हिये लगि भीजिए॥ 



जाल सी चूनरी चीकनौ गात मुबारक
Jaal si chunari cheekanau gaate Mubarak

 
जाल सी चूनरी चीकनौ गात चकोर छके मुख चंद के धोखे। 

लांबी लटैं लटकैं कटि खीन पयोधर द्वै मन मोहन पोखे॥ 

वेधै मुबारक के हिय में सर, एकौ सहै न कटाछ के चोखे। 

बाकी न राखी अजा की कछू जब बांकी चितौन ते झांकी झरोखे॥ 


हमको तुम एक अनेक तुम्हें मुबारक
Hamko tum ek anek tumhein Mubarak

हमको तुम एक अनेक तुम्हें उनहीं के विवेक बनाय बहो। 

इत आस तिहारी बिहारी उतै सरसाय के नेह सदा निबहो। 

करनी है मुबारक सोई करौ अनुराग लता जिन बोय दहो। 

घनश्याम सुखी रहो आनंद सों तुम नीके रहो उनहीं के रहो॥ 

संग सखी के गई अलबेली मुबारक
Sang sakhi ke gayi albeli Mubarak

संग सखी के गई अलबेली महासुख सोवन बाग बिहारन। 

बाढ़े बियोग बिलास गये सब देखत ही व पलास की डारन। 

जानि वसंत औ कंत विदेस सखी लगी बावरी सी वै पुकारन। 

च्वै चलि है चुरिया चलि आवरी आँगुरी अंजनु लाव अँगारन॥ 


kavi poet mubarak ki rachnaen




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