Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife फ़िराक़ गोरखपुरी के क़िस्से

 गंवार की राय

Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife

एक बार फ़िराक़ कुछ हिन्दी के लेखकों की महफ़िल में पहुंचे, इधर-उधर की बातों के बाद गुफ़्तगू का रुख़ हिन्दी और उर्दू की तरफ़ मुड़ गया। हिन्दी के एक अदीब ने कहा, “फ़िराक़ साहब! उर्दू भी कोई ज़बान है। इसमें गुल-ओ-बुलबुल के अलावा और है ही क्या? हल्की-फुल्की और गुदगुदी पैदा करने के अलावा संजीदा और ऊँचे क़िस्म की फ़िलासफ़ी से मुताल्लिक़ बातें इस ज़बान में अदा नहीं की जा सकतीं। आप बड़े शायर ज़रूर हैं, लेकिन उर्दू एक घटिया ज़बान है।”


फ़िराक़ बहुत संजीदगी से ये सब सुनते रहे फिर एक सिगरेट सुलगाते हुए कहने लगे,


“हर गंवार इंसान, ख़ूबसूरत चीज़ के बारे में वही कहता है, जो आपने उर्दू के बारे में फ़रमाया।”




फ़िराक़ का अकेलापन और चोर की आमद

Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife

फ़िराक़ साहब की सारी ज़िंदगी तन्हाई में गुज़री। आख़िरी ज़माने में तो घर में नौकरों के सिवा और कोई नहीं रहता था। कभी कभी तो तन्हा इतने बड़े घर में ख़ामोश बैठे हुए सिगरेट पिया करते थे। ख़ासतौर से शाम को ये तन्हाइयाँ दर्दनाक हद तक गहरी हो जाती थीं।


एक ऐसी ही शाम को नौकर बाज़ार गया हुआ था। एक ग़ुंडा मौक़ा ग़नीमत समझ कर दबे पाँव घर में घुस आया। उसने चाक़ू निकाल कर फ़िराक़ साहब के सीने पर रख दिया और रक़म का तलबगार हुआ।


फ़िराक़ साहब उसको चुपचाप देखते रहे फिर बोले,


“अगर तुम जान लेना चाहते हो तो मैं कुछ नहीं कहना चाहता। अगर रुपया चाहते हो तो वो मेरे पास नहीं है। नौकर बाज़ार गया हुआ है... बैठ जाओ... अभी आजाएगा तो तुम्हें रुपया दिला दूंगा।”


हमला-आवर बैठ गया फ़िराक़ साहब ने एक नज़र उसकी तरफ़ देखा और फिर बोले,


“अच्छा हुआ तुम आगए। मैं बड़ी तन्हाई महसूस कर रहा था।”




फ़िराक़ के बाद का शायर

Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife

एक मुशायरे में फ़िराक़ के बाद सुनने वालों की तरफ़ से एक नौजवान शायर ज़ुबैर रिज़वी से कलाम सुनाने की फ़रमाइश की गयी।


मुशायरे के सेक्रेटरी ने ज़ुबैर को माइक पर बुलाया तो वो निहायत नियाज़मंदी से झिजकते हुए कहने लगा, “क़िबला, फ़िराक़ साहब के बाद में क्यूँ-कर शे’र पढ़ सकता हूँ?”


फ़िराक़ ने ये सुनकर बड़ी नियाज़मंदी से फ़रमाया,


“वाह मियां! तुम अगर मेरे बाद पैदा हो सकते हो तो मेरे बाद शे’र क्यों नहीं पढ़ सकते?”




फ़िराक़ का नाड़ा

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एक मुशायरे में हर शायर अपना कलाम खड़े हो कर सुना रहा था। फ़िराक़ साहब की बारी आई तो वो बैठे रहे और माइक उनके सामने लाकर रख दिया गया।


मजमे से एक शोर बुलंद हुआ, “खड़े हो कर पढ़िए... खड़े हो कर पढ़िए।”


जब शोर ज़रा थमा तो फ़िराक़ साहब ने बहुत मासूमियत के साथ माइक पर ऐलान किया,


“मेरे पायजामे का डोरा टूटा हुआ है (एक क़हक़हा पड़ा) क्या आप अब भी बज़िद हैं कि मैं खड़े हो कर पढ़ूं?”


मुशायरा क़हक़हों में डूब गया।




माज़ी-परस्त की हिमाक़त

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एक माज़ी परस्त अदीब किसी जगह फ़ख़्रिया अंदाज़ में बयान कर रहे थे,


“पिछले दिनों अपने मकान की तामीर के लिए मुझे अपने गाँव जाना पड़ा। जब ज़मीन खुदवाई गयी तो बिजली की तारें दस्तियाब हुईं और बिजली की वो तारें अंदाज़न दो तीन हज़ार साल पुरानी थीं। इससे अंदाज़ा होता है कि दो तीन हज़ार साल पहले भी हमारे मुल्क में बिजली मौजूद थी।”


फ़िराक़ गोरखपुरी भी वहीं मौजूद थे। जब ये बात सुनी तो कमाल-ए-मतानत से कहने लगे,


“जी हाँ, और मैंने अपना मकान बनवाने के लिए जब ज़मीन खुदवाई तो कुछ भी नहीं मिला। इस से अंदाज़ा होता है कि पुराने वक़्तों में हमारे मुल्क में वायरलैस भी राइज था।”




फ़िज़िक्स में फ़ेल होना

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फ़िराक़ गोरखपुरी आगरा यूनिवर्सिटी में इंटर साइंस के तालिब इल्म थे। तमाम मज़ामीन में तो वो अच्छे नंबर हासिल करते लेकिन फ़िज़िक्स में अक्सर फ़ेल होजाते। एक रोज़ कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें बुलाकर पूछा, “भई क्या बात है, बाक़ी मज़ामीन में तो तुम्हारा नतीजा बहुत अच्छा रहता है। लेकिन फ़िज़िक्स में क्यों फ़ेल हो जाते हो?”


फ़िराक़ ने बरजस्ता जवाब देते हुए कहा, “जनाब इसलिए कि मैं फ़िज़िकली कमज़ोर हूँ।”




क़व्वाली और शेर का फ़र्क़

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इलाहाबाद के मुशायरे में फ़िराक़ साहब को अपनी आदत के ख़िलाफ़ काफ़ी देर बैठना पड़ा और दूसरे शायरों को सुनना पड़ा। फ़िराक़ साहब की मौजूदगी में जिन शायरों ने पढ़ा वो सब इत्तिफ़ाक़ से पाटदार आवाज़ और गलेबाज़ थे। वो बारी-बारी आए और फीकी ग़ज़लों को सुरताल पर गा कर चले गए। जब फ़िराक़ साहब माइक पर आए। उन शायरों की तरफ़ एक उचटती हुई निगाह डाली और ऐलान किया,


“हज़रात! आप अब तक क़व्वाली सुन रहे थे अब शे’र सुनिए।”




फ़िराक़ और झा साहब

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इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में कुछ लोग फ़िराक़ और डाक्टर अमरनाथ झा को लड़ाने की कोशिश में लगे रहते थे। एक बार एक महफ़िल में फ़िराक़ और झा दोनों मौजूद थे। दोनों को तक़रीर भी करना था। इंग्लिश डिपार्टमेंट के एक लेक्चरर ने जिसकी मुस्तक़ली का मुआमला ज़ेर-ए-ग़ौर था, कहना शुरू किया कि फ़िराक़ साहब अपने को क्या समझते हैं। डाक्टर झा उनसे ज़्यादा अंग्रेज़ी, उर्दू नीज़ हिन्दी जानते हैं। फ़िराक़ साहब ने खड़े हो कर कहा, “भाई, मैं झा साहब को एक ज़माने से जानता हूँ। उनको अपनी झूटी तारीफ़ क़तअन पसंद नहीं है।”




किस से झगड़ें?

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फ़िराक़ साहब जब पाकिस्तान के दौरे से वापस आए जहाँ उनकी बड़ी आव-भगत हुई थी, तो कुछ लोग उनसे मिलने आए। उस ज़माने में दोनों मुल्कों में आमद-ओ-रफ़्त पर बड़ी पाबंदियाँ थीं और लोग एक दूसरे के बारे में जानने के बड़े ख़्वाहिशमंद रहते थे। फ़िराक़ साहब ने उन लोगों को पाकिस्तान के बारे में बहुत सी बातें बताईं, मगर लोगों को सेरी नहीं हुई। एक साहब बोले, “वैसे वहाँ आ’म लोगों का क्या हाल है?”


फ़िराक़ साहब ने जवाब दिया, “भाई लोग बहुत उदास हैं, बहुत दुखी हैं।”


उन साहब ने पूछा, “मगर क्यों उदास हैं?”


फ़िराक़ साहब ने निहायत भोलेपन से जवाब दिया, “वहाँ अब हिंदू ही नहीं रहे झगड़ें किस से?”




मिस्टर दारू वाला

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एक दफ़ा सफ़र में फ़िराक़ साहब के साथ एक पारसी नौजवान मिस्टर दारुवाला भी इत्तिफ़ाक़ से उसी कम्पार्टमंट में थे। रास्ते भर दिलचस्प बातें होती रहीं। इलाहाबाद का स्टेशन आया तो फ़िराक़ साहब उतरने की तैयारी करने लगे। मिस्टर दारूवाला ने कहा कि वो उनके घर आकर उनसे तफ़सीली बातें करना चाहते हैं और फ़िराक़ साहब से दरख़्वास्त की कि वो अपने घर का पता बता दें।


फ़िराक़ साब ने कहा, “मैं बैंक रोड पर रहता हूँ। वहाँ पहुँच कर मेरा घर पूछने के बजाय आप किसी को भी अपना नाम दारूवाला बता दीजिएगा।”


“लेकिन...”


“लेकिन कुछ नहीं। लोग इस नाम की रिआ’यत से आपको ख़ुद ही मेरे यहाँ पहुंचा देंगे।”


फ़िराक़ साहब ने बड़े इतमीनान से उन्हें समझाया।




कली का चटकना और जूती का चटख़्ना

Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife

एक बेतकल्लुफ़ महफ़िल में मजनूं गोरखपुरी ने फ़िराक़ साहब से पूछा,


“चटकना, और चटख़ना में किसका इस्तेमाल कहाँ करना मुनासिब है?”


फ़िराक़ साहब ने पहले तो क़हक़हा लगाया फिर बोले,


“चटकती है कली, और जूतियां चटख़ाई जाती हैं।”




पेंशन याफ़्ता माशूक़

Firaq Gorakhpuri Ke Kisse Latife

फ़िराक़ साहब और साहिर होशियारपुरी एक साथ अमृतसर के एक होटल में पहुंचे। साहिर ने होटल का रजिस्टर भरना शुरू किया। फ़िराक़ साहब पास की एक कुर्सी पर बैठ गए।


साहिर साहब पेशा के ख़ाना पर पहुंचे तो फ़िराक़ साहब की तरफ़ मुड़कर बोले,


“क्यों साहब, मैं अपना पेशा क्या लिख दूं?”


“मा’शूक़ लिख दो।” फ़िराक़ साहब ने उन्हें याद दिलाया।


“इस उम्र में।” साहिर बोले।


“तो क्या हुआ, आगे पेंशन याफ़्ता भी लिख दो।” फ़िराक़ साहब ने बरजस्ता कहा।




मांगे के पैसों से तवाज़ो (सत्कार)

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एक तरक़्क़ी पसंद शायर जो शराब के बेहद रसिया थे, फ़िराक़ साहब के घर पहुंचे और परेशान हाल सूरत बनाकर बोले,


“फ़िराक़ साहब! बात इज़्ज़त पर आ गई है, मैं बहुत परेशान हूँ। किसी तरह तीस रुपया उधार दे दीजिए।” फ़िराक़ साहब कुछ कहने वाले थे कि वो बोले,


“देखिए इनकार न कीजिएगा... मेरी आबरू ख़तरे में है।”


फ़िराक़ साहब ने तीस रुपये उनके हवाले कर दिए और वो रुपया पाते ही फ़ौरन फ़िराक़ साहब से रुख़्सत हो गए।


थोड़ी देर के बाद फ़िराक़ साहब के घर के सामने एक ताँगा आकर रुका और उसमें से वही शायर बरामद हुए। आते ही फ़िराक़ साहब से बोले, “आप फ़ौरन इस ताँगे में बैठ जाइये।”


“अरे भाई मुआ’मला क्या है?” ज़ेर-ए-लब बड़बड़ाते हुए फ़िराक़ साहब ताँगे में बैठ गए। ताँगा सीधा एक शराबख़ाने पर पहुंचा जहाँ फ़िराक़ साहब की ख़ातिर-तवाज़ो उन्हीं के रुपयों से की गई। शराब-ओ-कबाब के दौर के बाद उनको उसी ताँगे में बिठाकर वापस उनके घर पहुंचा दिया गया।


दूसरे दिन फ़िराक़ साहब ने एक क़रीबी दोस्त से बड़े मुसीबतज़दा लहजे में शिकवा किया,


“मेरे तीस रुपये गये साहब... मैं किस मुँह से उसको मांगूंगा... वो सब उसने मेरे ही ऊपर ख़र्च कर दिए।”




इकाई, दहाई, सैंकड़ा, हज़ार, दस हज़ार

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बशीर बद्र ने अपना शे’री मजमूआ’ “इकाई” इस इल्तिमास के साथ फ़िराक़ साहब को भेजा कि वो अपनी गिराँ क़दर राय से नवाज़ें। फ़िराक़ साहब ने अपनी राय लिखी,


“इकाई, दहाई, सैंकड़ा, हज़ार, दस हज़ार।”


आपका

फ़िराक़ गोरखपुरी




शैतान बोलता है

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तक़रीबन 1944 में एक बार जोश इलाहाबाद यूनीवर्सिटी गए। अदबी तक़रीब में डायस पर जोश के अलावा फ़िराक़ भी मौजूद थे। जोश ने अपनी तवील नज़्म “हर्फ़-ए-आख़िर” का एक इक़्तिबास सुनाया। उसमें तख़लीक़-ए-काइनात की इब्तिदा में शैतान की ज़बानी कुछ शे’र हैं। जोश शैतान के अक़वाल पर मुश्तमिल अशआ’र सुनाने वाले थे कि फ़िराक़ ने सुननेवालों से कहा, “सुनिए हज़रात, शैतान क्या बोलता है।” और इसके बाद जोश को बोलने का इशारा किया।




शायर बद-किरदार क्यों?

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डाक्टर एजाज़ हुसैन इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में ग़ज़ल पढ़ा रहे थे। फ़िराक़ साहब भी वहाँ बैठे थे। उन्होंने डाक्टर एजाज़ हुसैन से सवाल किया, “ऐसा क्यों कहा जाता है कि ग़ज़लगो शायर आ’म तौर से बदकिरदार होते हैं।”


एजाज़ साहब बरजस्ता बोले, “उनके सामने आपकी मिसाल रहती है।”


क्लास में एक ज़बरदस्त क़हक़हा पड़ा और फ़िराक़ साहब की आवाज़ क़हक़हों में दब गई।




प्रोफ़ेसर पुजारी की दुनियादारी

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यूनीवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर बहुत ज़्यादा पूजापाट करते थे मगर दुनयावी तरक़्क़ी के पीछे पागल भी थे। एक दिन फ़िराक़ साहब को शरारत सूझी और टहलते-टहलते उनके घर पर पहुंच गए। दस्तक दी तो नौकर बरामद हुआ। फ़िराक़ साहब ने पूछा, “प्रोफ़ेसर साहब हैं?” नौकर ने कहा, “हैं मगर पूजा कर रहे हैं।”


फ़िराक़ साहब ने कहा, “उनसे अभी कुछ न कहना जब पूजा ख़त्म कर लें तो कह देना महाराजा बड़ौदा के सेक्रेटरी बहुत ज़रूरी काम से मिलने आए थे।”


ये कह कर फ़िराक़ साहब चले आए। पूजा के बाद प्रोफ़ेसर साहब को बताया गया तो वो क़रीब-क़रीब पागल हो गए।


“उल्लू के पट्ठे मुझसे फ़ौरन क्यों नहीं बताया गया।”


उन लोगों ने कहा, “आप ही का हुक्म है कि पूजा में आप को डिस्टर्ब न किया जाए।”


 


किलोमीटर का ज़माना

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कानपुर के एक मुशायरे में जब एक शायर अपना कलाम पढ़ रहे थे तो नुशूर वाहिदी ने टोका, “शे’र मीटर से बेनियाज़ हैं।” फ़िराक़ ने जवाब दिया, “पढ़ने दो ये ज़माना मीटर का नहीं किलोमीटर का है।”




ख़ालिस घी का पकवान

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एक मर्तबा जगन्नाथ आज़ाद इलाहाबाद में फ़िराक़ गोरखपुरी के हाँ ठहरे हुए थे। जब खाना लाया गया तो फ़िराक़ ने आज़ाद से मुख़ातिब हो कर कहा, “खाइये आज़ाद साहब! निहायत लज़ीज़ गोश्त है।”


आज़ाद ने मज़ाक़ से काम लेते हुए एक आ’म सा फ़िक़रा चुस्त कर दिया, “आप खाइए, हम तो रोज़ ही खाते हैं।”


फ़िराक़ ने फ़िल-फ़ौर आज़ाद की बात काटते हुए जवाब दिया, “लेकिन ये ख़ालिस घी में पका हुआ है।”




मगर ग़ज़ल मरी तो नहीं

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दिल्ली के एक शायर जो एक सरकारी अफ़सर भी थे, एक बार इलाहाबाद तशरीफ़ लाए और फ़िराक़ साहब से फ़रमाइश की कि वो उनके नए मजमूआ’-ए-कलाम पर कुछ लिख दें। फ़िराक़ ने मुरव्वत में चंद रस्मी कलिमात लिख दिए। मसलन ये कि,


“ये शायर हैं... शे’र कहते हैं... दिल्ली में रहते हैं... सरकारी मुलाज़िम हैं... मजमूआ’-ए-कलाम छपवा रहे हैं... वग़ैरा।”


शायर ने ख़ुशी-ख़ुशी लेकर पढ़ा मगर पढ़ने के बाद कुछ तसल्ली नहीं हुई बोले,


“फ़िराक़ साहब इसमें बस एक जुमला और बढ़ा दीजिए।” उन्होंने क़रीब-क़रीब गिड़गिड़ाते हुए कहा कि “... ने उर्दू ग़ज़ल को नया मोड़ दिया है।”


फ़िराक़ साहब बोले, “मगर ग़ज़ल मरी तो नहीं।”




हाली की पैदाइश

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नुशूर वाहिदी ने फ़िराक़ से कहा कि पिछले हफ़्ते मैं उर्दू की कापियां देख रहा था। एक साहबज़ादे ने जो हाली की सवानेह हयात लिखना चाहते थे, लिखा था कि हाली पानीपत के मैदान में पैदा हुए। फ़िराक़ साहब बहुत हँसे कहने लगे, “हिस्ट्री का तालिब इल्म होगा शायद।”

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फ़िराक़ गोरखपुरी
जन्म28 अगस्त 1896
गोरखपुरउत्तर प्रदेशभारत
मौत03 मार्च 1982
नई दिल्‍लीभारत
पेशाकवि,लेखककविआलोचक, विद्‍वान
राष्ट्रीयताभारतीय
उच्च शिक्षाइलाहाबाद विश्वविद्यालय
विधाकविताउर्दू शायरी, साहित्यिक आलोचक
उल्लेखनीय कामगुल–ए–नग़मा
(1970 मे साहित्य अकादमी पुरस्कार)
खिताबपद्म भूषण (1968)
ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969)
साहित्य अकादमी पुरस्कार
(1970)

हस्ताक्षर

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