एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के गीत NCERT Ke Geet

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! हरिवंशराय बच्चन

वृक्ष हों भलें खड़े,

हों घने, हों बड़ें,

एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी!

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

यह महान दृश्य है—

चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

स्रोत :

पुस्तक : बच्चन के लोकप्रिय गीत (पृष्ठ 43)
रचनाकार : हरिवंशराय बच्चन
प्रकाशन : हिंद पॉकेट बुक्स
संस्करण : 2004


एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है हरिवंशराय बच्चन

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

हो जाए न पथ में रात कहीं,

मंज़िल भी तो है दूर नहीं—

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगे—

यह ध्यान परों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊँ किसके हित चंचल?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्लता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

कर चले हम फ़िदा कैफ़ी आज़मी

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जान देने की रुत रोज़ आती नहीं

हुस्न और इश्क़ दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो ख़ूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

राह क़ुर्बानियों की न वीरान हो

तुम सजाते ही रहना नए क़ाफ़िले

फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है

ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले

बाँध लो अपने सर से कफ़न साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

खींच दो अपने ख़ूँ से ज़मीं पर लकीर

इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो।

जाग तुझको दूर जाना महादेवी वर्मा

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा ग्यारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरी के ह्रदय में आज चाहे कंप हो ले,

या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;

आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,

जागकर विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफ़ान बोले!

पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!

जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?

पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?

विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,

क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!

जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,

दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?

सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?

विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?

अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?

जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,

आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,

राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!

जाग तुझको दूर जाना!


मुर्ग़ा बोला कुकड़ू-कूँ |अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा एक के पाठ्यक्रम में शामिल है।

मुर्ग़ा बोला कुकड़ू-कूँ,

चल मेरे भैया रुकता क्यूँ!

कुत्ता भौंके, भौं-भौं-भौं,

अटकी गाड़ी पौं-पौं-पौं।

बकरी आई, बिल्ली आई,

मेंऽ-मेंऽ आई, म्याऊँ-म्याऊँ आई।

धक्की गाड़ी धौं-धौं-धौं,

चल दी गाड़ी पौं-पौं-पौं।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 25)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022

चींटा | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चींटा-चींटा दूध ला,

दूध लाकर दही जमा,

बढ़िया-बढ़िया दही जमा,

खट्टा-मीठा दही जमा।

चींटा-चींटा गन्ना ला,

गन्ना लाकर शक्कर बना,

चींटी भूखी आएगी,

झटपट वो खा जाएगी।

चींटा-चींटा शक्कर ला,

शक्कर लाकर शरबत बना,

चींटी प्यासी आएगी,

झटपट वो पी जाएगी।

चींटा-चींटा घप बना,

चींटी धूप से आएगी,

देख के ख़ुश हो जाएगी,

झट-से-वो रुक जाएगी।

चींटा-चींटा बाज़ार जा,

शक्कर ला, चावल ला,

रोटी ला, पानी ला,

झटपट जा, झटपट आ।

चींटी जब घर आएगी,

देख के ख़ुश हो जाएगी,

तेरे ही गुण गाएगी,

तेरे ही गुण गाएगी।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 20)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022

कार्नेलिया का गीत | जयशंकर प्रसाद

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है। —'चंद्रगुप्त' नाटक से

अरुण यह मधुमय देश हमारा!

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।

छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकुम सारा!

लघु सुरधुन से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।

लहरें टकराती अंनत की-पाकर जहाँ किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।

टिल्लू जी | नरेश सक्सेना

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

टिल्लू जी स्कूल गए,

बस्ता घर पर भूल गए।

रस्ते भर थे डरे-डरे,

पहुँच गेट पर अरे-अरे।

छुट्टी का नोटिस चिपका,

देख ख़ुशी से फूल गए।

दोंनो बाँहें माँ के,

डाल गले में झूल गए।

देवसेना का गीत | जयशंकर प्रसाद

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है। —'स्कंदगुप्त' नाटक से

आह! वेदना मिली विदाई!

मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे संध्या के श्रमकण,

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी—

नीरवता अनंत अँगड़ाई।

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,

गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने—

यह विहाग की तान उठाई।

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,

रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह! बावली,

तूने खो दी सकल कमाई।

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,

प्रलय चल रहा अपने पथ पर।

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,

उससे हारी-होड़ लगाई।

लौटा लो यह अपनी थाती

मेरी करुणा हा-हा खाती

विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे

इससे मन की लाज गँवाई।


उत्साह | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

बादल, गरजो!—

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

ललित ललित, काले घुँघराले,

बाल कल्पना के-से पाले,

विद्युत-छवि उर में,कवि नवजीवन वाले!

वज्र छिपा, नूतन कविता

फिर भर दो—

बादल गरजो!

विकल विकल उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन,

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तृप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो—

बादल, गरजो!


चंदा मामा दूर के | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा एक के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चंदा मामा दूर के,

पुए पकाएँ बूर के;

आप खाएँ थाली में,

मुन्ने को दें प्याली में।

प्याली गई टूट,

मुन्ना गया रूठ।

लाएँगे नई प्यालियाँ,

बजा-बजा के तालियाँ,

मुन्ने को मनाएँगे,

हम दूध-मलाई खाएँगे।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 7)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022


हिंद देश के निवासी | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा तीसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

(पढ़ने के लिए)

हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं,

रंग, रूप, वेश, भाषा चाहे अनेक हैं।

बेला, गुलाब, जूही, चंपा, चमेली,

प्यारे-प्यारे फूल गूँथे माला में एक हैं।

कोयल की कूक प्यारी, पपीहे की टेर प्यारी,

गा रही तराना बुलबुल, राग मगर एक हैं।

गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी,

जाके मिलीं सागर में, हुई सब एक हैं।

स्रोत :

पुस्तक : वीणा (पृष्ठ 154)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022


आह्वान | अशफाक़उल्ला खाँ


प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखलाएँगे,

आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरखे का,
चरखे से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुँजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम
की, है जान हथेली पर, एक दम में गवाँ देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीक़ा,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फाँसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूँ से ही शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के तूने बनाए ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।

साथी हाथ बढ़ाना | साहिर लुधियानवी


प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा छठी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।

साथी हाथ बढ़ाना।

हम मेहनतवालों ने जब भी, मिलकर क़दम बढ़ाया

सागर ने रस्ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया

फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें

हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें

साथी हाथ बढ़ाना।

मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्या डरना

कल ग़ैरों की ख़ातिर की, आज अपनी ख़ातिर करना

अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक

अपनी मंज़िल सच की मंज़िल, अपना रस्ता नेक

साथी हाथ बढ़ाना।

एक से एक मिले तो क़तरा, बन जाता है दरिया

एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा

एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत

एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले क़िस्मत

साथी हाथ बढ़ाना।

हम होंगे कामयाब एक दिन  | गिरिजाकुमार माथुर

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा सातवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

हम होंगे कामयाब एक दिन

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे...

होगी शांति चारों ओर,

होगी शांति चारों ओर एक दिन,

हो हो मन में है विश्वास पूरा है विश्वास,

होगी शांति चारों ओर एक दिन।

हम होंगे...

हम चलेंगे साथ-साथ,

डाल हाथों में हाथ,

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे...

नहीं डर किसी का आज

नहीं भय किसी का आज

नहीं डर की का आज एक दिन।

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

नहीं डर किसी का आज के दिन

हम होंगे...























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