यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते / गोपालप्रसाद व्यास

 यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते तो जो होता वह तो होता, लेकिन मथुरा की भूमि में पैर रखने से पूर्व ही वह नीलाम अवश्य कर दिए जाते। कारण कि काला हो या गोरा, पतला हो या मोटा, अकेले हो या गृहस्थी के साथ, जो भी मथुरा की ओर मुंह करता है, उसे अपनी नीलामी के लिए तैयार रहना पड़ता है। भगवान कृष्ण भी इस सौभाग्य से वंचित नहीं रह सकते थे। मथुरा से तीन-चार स्टेशन पूर्व ही माथे पर तिलक लगाए, कंधे पर अंगोछा डाले, हाथ में लाठी लिए कोई तगड़ा-सा व्यक्ति उनसे मिलता, कुछ बातें करता और फिर अगले किसी स्टेशन पर हमारे कृष्ण-कन्हैया की बोली लगने लगती। सौदा होने लगता कि यह यात्री कितने का आसामी है? इससे कितनी भेंट-दक्षिणा मिल सकती है? उसी के आधार पर बोलियां लगतीं तथा मथुरानाथ को पता भी नहीं चलता और वह नीलाम कर दिए गए होते।


किए होंगे कभी कान्हा ने गोपियों के चीर-हरण, मथुरा स्टेशन पर आते ही इस बार उनका चीर-हरण शुरू हो जाता। कोई उनका पटुका पकड़ता तो कोई पीतांबर खींचता। कोई उनकी लकुटी की ओर लपकता तो कोई वनमाला की ओर। कोई नाम पूछता तो कोई गाम पूछता। कोई जाति पूछता तो कोई गोत पूछता। कोई कहता कि आप हमारे यजमान हैं, कोई कहता हम आपके पंडा हैं। कोई कहता कि हम आपके ही नहीं, आपकी जातिभर के पंडा हैं। कोई कहता कि गांव-भर हमारा यजमान है। कोई कहता कि आपके पिताजी ने हमें शैयादान किया था। कोई कहता कि हमारी बही में तुम्हारे दादा के दस्तख़त हैं। कोई कहता कि यह झूठा है। दूसरा कहता कि यह दग़ाबाज है। तीसरा कहता कि ये दोनों ही कंपनी वाले हैं, सनातन पंडा तो हम ही हैं। चकाचक भांग, धकाधक हलुआ, हरी-हरी पातर, पीले-पीले लडुआ। छनाछन चांदी आती रहे। ग्वाल-बाल खाते, मौज उड़ाते रहें। हाकिम की गादी पै, सूम की छाती पै। सरकार चलो हमारे यहां। जमुना किनारे ऊंची धर्मशाला, टट्टी-फिलस, बिजुरी की रोशनी चमाचम।

भगवान कृष्ण को उनकी बातों में रस आते देख, दूसरा उसे ठेलकर आगे आता। कहता, सरकार यह तो भंगेड़ी, गंजेड़ी, नशेबाज आदमी है। इनकी बातों में न आइए। हमने शास्त्री परीक्षा पास की है। हम गीता-भागवत शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुसार आपको सफल कर्मकांडों से युक्त ब्रज की यात्रा कराएंगे। इन अपठित मूर्खों में आप न फंसिए। श्रीकृष्ण इस पठित-पंडित की बात पर ठीक से ध्यान भी न दे पाते कि एक सूंड-सूंडार, धांध, धुंधारे, तुन्दिल बदन पहलवान भीड़ चीरते हुए उन तक पहुंचते और भगवान कृष्ण को लगता कि कंस के मल्ल अभी तक नहीं मरे। मल्ल पट्ठों से कहता, "देखते क्या हो, यह हमारे जिजमान हैं। उठाओ इनका सामान और लदवाओ तांगों में। हम भी देखते हैं इन्हें कौन ले जाता है?" कि तभी कृष्ण भगवान को वहां बातों ही बातों में स्टेशन पर लाठियां चलती नज़र आतीं। कुछ फूटते, कुछ फटते। कुछ बकते, कुछ सकते। कुछ मारते, कुछ रुकते। इस हंगामे को पुलिस आकर संभालती और कृष्ण सोचते अब क्या किया जाए? कहां चला जाए? हमने तो सोचा था कि महाभारत-प्रकरण हम समाप्त कर चले। ब्रज में घुसते ही यह सूचना कैसी? भगवान कृष्ण को मथुरा एकदम बदली हुई नज़र आती। उन्हें रथों के स्थान पर रिक्शा, घोड़ों के स्थान पर आदमी, राजपथों के स्थान पर छोटी-छोटी तंग गलियां, वृदांवन की जगह मंदिर ही मंदिर और गोकुल में कपिला गायों का नाम-निशान न पाकर बड़ी हैरानी होती।

देखते कि यमुना अब वह नहीं रही। उसके कूल पर अब कंदब नहीं मिलते, झाऊ पलते हैं। कमलों की जगह यात्रियों को अब कछुए ही दिखाई देते हैं। उसके तट पर वेदपाठ के स्थान पर 'ले गया, ले गया, मारियो रे, दौड़ियो रे !' अधिक सुनाई देता है। वह देखते कि मथुरा के मनुष्य ही नहीं, यहां के बंदर भी चोरी-ठगी में बड़े-बड़ों के कान काटते हैं। कृष्ण भगवान मथुरा आते तो उन्हें भी अपने मंदिरों के दर्शन अवश्य कराए जाते और जब उन्हें टैक्स ले-लेकर यह बताया जाता कि यहां वह पैदा हुए थे, यहां उन्होंने मल्ल मारे थे, यहां कुब्जा मिली थी, यहां कंस पछाड़ा था, यहां विश्राम किया था, यहां उनके गुरु रहते थे, तो वह खुद ही अपना माथा अवश्य ठोंक लेते। मंदिरों में मूर्तियों को देखकर भी उनके होश हिरन हो जाते। अपनी ठोड़ी पर चिबुक, नाक में बेसर, कान में कुंडल, हाथ में कंगन, पहुंची और बाजूबंद तथा पैरों में नूपुर देखकर वह सोचते कि मेरे भक्तों ने मुझे क्या बना डाला? मथुरा पहुंचकर भगवान कृष्ण की यह बड़ी इच्छा होती कि तनिक माखन-मिश्री अवश्य चखी जाए और मिल जाए तो थोड़ी छाछ भी छकी जाए। लेकिन उन्हें यह जानकर हैरानी होती कि ब्रज के लोग माखन-मिश्री खाना तो दूर, उसका नाम भी भूल गए हैं। उन्हें कदम-कदम पर चाय और पान की दुकानें तो मिलतीं, मगर माखन-मिश्री की दुकान सारे शहर में एक भी नहीं दिखाई देती। बहुत खोजने पर उन्हें कागजों में लिपटा एक नमकीन-सा पदार्थ दिया जाता, लेकिन निश्चय ही कृष्ण इसे सूंघकर छोड़ देते। उनके युग में न मक्खन पीला होता था, न नमकीन, न वह कागजों में तुलकर आता था। न जाने यह क्या बला है ! अपने युग में भगवान कृष्ण ने चाहे अवश्य ही महाभारत युद्ध की अनेक गुत्थियां सुलझाई हों, लेकिन ब्रज में आकर वे खुद अपने जीवन से संबंधित इन समस्याओं को सुलझाने में अपने को असमर्थ पाते कि मथुरा से आकर वे गोकुल में पले थे, या वृदांवन में, नंदगांव में बड़े हुए थे कि मुहम्मदपुर (परासौली) में? उनकी प्यारी राधा वृदावंन की थीं या बरसाने की, या राधाकुंड की?

क्या छटीकरा में उनकी छटी हुई थी? क्या सतोहे में उन्होंने सतुआ खाया था? और दान-घाटी कौन-सी सही? चीर-घाट कौन-सा ठीक है? बंसीवट कहां है? ये सब समस्याएं भगवान कृष्ण को विकल किए बिना न रहतीं। पंडे लोग भगवान कृष्ण को गोवर्धन भी ज़रूर ले जाते। ले जाते क्या, कृष्ण वहां जाए बिना भी न रहते और निःसंदेह गिरिराज की तलहटी में जाकर वहां तृण, लता-गुल्मों, सर-सरोवरों, मानसी गंगा, चंद्र सरोवर, कुसुम सरोवर, राधा-कुंड, कृष्ण-कुंड को देखकर उनके खिन्न मन को थोड़ी प्रसन्नता भी प्राप्त होती, लेकिन "सब देवन कौ देवता गिरि गोवर्धननाथ" को देखकर वह अचंभे में पड़ जाते। यह तो मेरे ज़माने में सात कोस लंबे और सात कोस ऊंचे थे। देवता कहां बिलाय गए? और तभी उनके मन में यह विचार आता कि यदि अब कहीं फिर से गोवर्धन को उठाने का प्रसंग उपस्थित हो जाए तो इस बार उन्हें सात कोस धरती में धंसे गिरिराज महाराज को ऊपर उठाने में काफी परिश्रम करना पड़ेगा। गोवर्धन पहुंचकर उन्हें गोपियों की भी याद आए बिना न रहती, लेकिन वह यह जानकर हताश हो जाते कि ब्रज की गोपियां दही बेचने मथुरा जाती ही नहीं। अब उन्हें दूध जमाने, घी निकालने में लाभ नहीं रहता। वे तो सीधा दूध ही पानी मिलाकर दूधियों के हाथ बेच देती हैं। न दही जमे, न बेचने जाना पड़े। न माखन हो, न चोरी करने कोई आए। गोपाल को ब्रज में गायों के स्थान पर भैंसें, मयूरों के स्थान पर मुर्गे और रास-नृत्य के स्थान पर नौटंकी या सिनेमा का ही शौक अधिक प्रचलित दिखाई देता।

योगेश्वर सोचने लगते, काल बड़ी तीव्र गति से प्रवाहित हो रहा है। मधुपुरी के लोग, ब्रज के वासी नहीं जानते कि वे किस ओर जा रहे हैं? उनका इष्ट क्या है? कर्त्तव्य क्या है? कर्म क्या है? वे मुझको, मेरे स्वरूप को, मेरी लीला को, माया को एकदम भूल गए हैं। कौन्तेय, उठ और कर्त्तव्य कर !

लेकिन कृष्ण देखते हैं कि कोई अर्जुन उनके गीता-ज्ञान को सुनने इस समय उनके पास नहीं है। उनका पंडा उनसे कह रहा है- महाराज, हाथ में जल लीजिए, गोत्र का उच्चारण कीजिए। कहिए, ब्रज-यात्रा पूर्ण हुई। यमुनाजी, विश्राम घाट छोड़ देओ।

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