कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता / गोपालप्रसाद व्यास

 कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता / गोपालप्रसाद व्यास

(महाकवि सूरदास ने स्वर्ग से फोन किया है कि मेरे साथ हिन्दी के इतिहासकारों ने भारी अन्याय किया है। उसका प्रतिकार होना चाहिए। कौन कहता है कि मैं अंधा था। मुझे तो सर्वत्र सब कुछ दिखाई देता था। हां, मेरी आंखों में मोतियाबिंद उतरा था। मथुरा के एक डॉक्टर ने मुझे चश्मा भी दिया था। वह एक दिन गिरिराज पर्वत पर गिरकर टूट गया।)



सवेरे-सवेरे हम त्रिफला से अपनी आंखें धो रहे थे कि फोन की घंटी बजी। बेटी गुड्डी ने बताया, "चाचाजी, टरंककाल है।

जल्दी-जल्दी तौलिये से अपना मुंह पोंछते-पोंछते हमने पूछा, "कहां से है? कौन बोल रहा है?”

गुड्डी बोली, "पता नहीं, कोई बुड्ढा गंवई बोली में बोल रहा है। जल्दी आइए।”

हमने रिसीवर कान पर रखते हुए कहा, "जी”!

"मैं सूरज बोल रह्‌यौ हूं !”

हमने कहा, "क्षमा कीजिए, मैंने पहचाना नहीं।”

उत्तर मिला, "मैं दिल्ली ते आठ मील उरै सीही गांव कौ रहिबै बारौ हूं। बाबूजी, मेरे संग बड़ौ अन्याय भयौ है।”

हमने अन्यमनस्कता से पीछा छुड़ाने के लिए कहा, "सीही तो गुड़गांवा जिले के अंतर्गत है। हरियाणा के मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता। आप अपने एम.एल.ए. या जिला अधिकारि से मिलिए। क्या कोई ज़मीन-ज़ायदाद या पंचायत का मामला है?”

उधर से आवाज़ आई, "नाहिं भइया, ज़मीन-ज़ायदाद तो हमारे पुरखन के ऊ नाहिं हती। जीवनभर मैं काऊ की पंचायत में नाहीं पर्‌यो।”

"तो फिर किसी से फौजदारी होगई होगी? तुम्हारे गांव का सरपंच आजकल कौन है? जाट, लाला या कोई ब्राह्‌मण देवता?”

उत्तर कुछ अजीब सा मिला, "भइया, फौज़दारी तो मेरी एक बेर बंसीवारे ई ते भई हती। वा सों मैंने स्वाफ-स्वाफ कह दई हतीः

"बांह छुड़ाए जात हौ,

निबल जानिकें मोहि।

हिरदै ते जब जाहुगे,

मरद बदोंगो तोहि॥

का तुम अबई तलक मोय नाहिं पहिचाने?”

हम एक क्षण के लिए सकते में पड़ गए। परंतु दूसरी ओर से हमें तुरंत सुनाई दिया, "मैं सूरदास हूं। गुसांई तुलसीदासजी ने मो ते कही हती कै मैं आपकूं फोन करि लऊं। फोन कौ नंबर हूं उननें कृपा करिकें बताय दियौ हो। सो तुम कृपा करिकें मेरी बात सुनौ। और कछु करि सकौ तो करौ।”

हमने प्रणाम करते हुए कहा," महाकवि, आज्ञा कीजिए ! क्या सेवा है?”

सूरदासजी बोले, "सेवा तो जीव कूं केवल श्रीनाथजी की करनी चइए। मोय तौ एक भ्रांति दूर करनी है। ताही तें आपकूं कष्ट दियौ है।”

"आज्ञा कीजिए !”विनय और पुलक भाव से हमने कहा।

"भइयाजी,”महात्मा सूरदास ने कहना प्रारंभ किया, "लोग मोहि सूरदास कहें हैं और मोहि जन्मांध मानें हैं। पै जि बात है नाहिं। थोरौ-थोरौ तो मोहि अंत समय तक दिखाई देतौ रह्‌यौ हो।

"परंतु सूरदासजी," हमने प्रश्न किया, "अष्टसखान की वार्ता में तो ऐसा लिखा है कि, "सो सूरदासजी जन्मांध हे। आंखिन के स्थान पे उनके गढेला हते!"

सूरदासजी ने बीच में ही टोककर हमसे कहा, "लिखी तौ जाने कहा-कहा है। एक सूरदास मदनमोहन हू ह्‌वै गए एं। उनके पद हू लोगन नें मेरे 'सूरसागर' में छाप दए एं। कोऊ मोय सारस्वत कहै है, कोऊ ब्रह्‌मभट्ट बतावै ऐ। कोऊ मोय आगरे को कहै है। और अब तौ खैंचि कैं मोय ग्वालियर हू लै जाय रहे एं। पै ऐसी बात है नाहिं।”

"तो वास्तविकता क्या है, सूरदासजी?”

"बात तो भइयाजी, बहुतेरी एं। पै संछेप में मोय इतनी ही कहनी ऐ के मैं वैष्णव हूं और महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी कौ सेवक हूं। मैंने जीवन-पर्यंत श्री गिरिराजधरण प्रभु की लीला गाई एं और मैं अंधौ नाहिं हतौ। मैंने दुनिया भली प्रकार सूं देखी हती।”

"फिर आपके विषय में यह सब प्रवाद कैसे फैला? कुछ-न-कुछ तो बात होगी ही।”हमने आश्चर्य से पूछा।

"बात तो केवल इतनी-सी हती, कै साठ बरस की उमर में मेरी एक आंख में मोतियाबिंद उतरि आयौ। वा जमाने में आजकल की नाईं, कहा कहें हैं वासो, आपरेसुन नाहिं होते हते। जा कारन मोहि कछु कम दीखबे लग्यौ। धीरै-धीरै दूसरी आंख हू पहली के वियोग में दूबरी होन लगी और दुष्ट लोग मोहे सूरदास कहिबे लगे।”

हमने सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा, "यह तो बहुत बुरा हुआ। मगर महाकवि, आज इस बात को कौन सच मानेगा?”

सूरदासजी ने तुरंत उत्तर दिया, "मैंने याही कारन तो आपकूं फोन कियो है। मैं आपकूं कछू प्रमान देऊं हूं, तिनकूं तुम जगत में उजागर करौ।”

हम सांस रोककर सुनने लगे और सूरदासजी ने कहना शुरू किया, "हमने अपने एकु पद में स्वाफ-स्वाफ लिख्यौ है-

सूरदास की एकु आंखि है, ताहू में कछु कानो ।

का जाते बढ़िकै कोऊ और अंतर-साच्छ की आवश्यकता रहि जाय है?>

"परंतु सूरदासजी, इसका अर्थ तो विद्वान लोग भक्ति-परंपरा में आपकी अतिशय विनय के रूप में लेते हैं। कहते हैं कि सूरदास तो ज्ञान और भक्ति की दो आंखों में से केवल एक भक्ति की आंख से ही दुनिया को देखते हैं और वह भी थोड़ा-थोड़ा।”

"जिही तौ झींकबौ है। कै पढ़े-लिखे लोग बिना मतलब के अर्थ कौ अनर्थ करि डारै हैं। पहले मेरी आंखन तैं पानी कौ ढरका बहन लग्यौ हौ। ताही समै मैंने श्रीनाथजी कूं यह पद गायकैं सुनायौ, "निसि दिन बरसत नैन हमारे!”

लंबी सांस भर सूरदासजी आगे कहने लगे, "पै टेढ़ी टांग बारे नैं हमारी कोई सुनवाई नाहीं करी। तब काहू नैं हम ते कही, सूरदासजी, मथुरा सहर में एक मदनगोपाल नाम कौ आदमी ऐ। बु आंखिन के चसमा अच्छौ बनाय के देय है। तुम वा पै जाऔ।”

थोड़ा दम लेकर सूरदासजी ने आगे बताया, "भइयाजी, हम वा पै गए। ता के चसमा ते हमें कछु लाभ हू भयौ। पै एक दिना श्रीनाथजी के मंदिर ते उतरते समय वा चसमा को कांच गिर के टूटि परौ। हम फिर मथुरा पहुंचे। पै मदनगोपाल वहां ते अपनी दुकान छोड़िकें कहूं अनत चल्यौ गयौ हतौ। हमने वा समैं की अपनी अवस्था कौ वर्णन हू एक पद में कियौ है।”

"क्या?”हमने पूछा। और सूरदासजी ने हमें वह सुनाया-

नैंना भए अनाथ हमारे !

मदन गुपाल वहां ते सजनी,

सुनियत दूर सिधारे !

"आप तौ खुद्द जा बात कूं भली प्रकार ते जानौ हौ कै चसमा बारी आंखि बिना चसमा के कैसी अनाथ है जाय है। मदनगुपाल के पाछे हमें कोऊ दूसरा चसमा बनायबे बारौ मिल्यौ नाहिं हतौ। जा ते हमें श्रीजी के दरसन करिबे में बड़ी अटक हैबे लगी। वा समै कौ हू एक पद हमारे सूरसागर में है, "अंखियां हरि-दरसन की प्यासी !”जा पद कूं तुम फिरि कैं पढ़ियों। हमारी व्यथा भली प्रकार सूं आपकी समझ में आय जाएगी।”

हम क्या कहें और क्या न कहें, यह सोचते ही थे कि सूरदासजी पुनः बोले,"लाला, तुम खुद्द अपनी अकल ते सोचौ कै जो हमारे आंखि नाहिं हती तौ हम गिरिराज पर्वत ते दो समै उतरि कै दो कोस पारासौली कैसे जाते हे। अंधौ आदमी कहूं अकेलौ पहाड़ पै रोज चढ़ि-उतरि सकै है? और 'वार्ता' को ई लिखौ प्रमान हौ तो वार्ता में तौ एकु स्थान पै ऐसौ हू लिख्यौ है कै सूरदास मंदिर के काम ते कबहु-कबहु मथुरा आयौ-जायौ करते हे। सो तुमही कहौ, अंधे आदमीन के सिपरद कबहू बारह कोस दूरि जाइके मंदिर के प्रबंध कौ काम सौंपो जाय ऐ?”

एकाएक हमारे ध्यान में सूरदास का प्रकृति-वर्णन, रंगों की छटा, बालकृष्ण की थिरकन, उनका 'हरि पालने झुलावै' वाला पद बिजली की तरह कौंध गया। निस्संदेह मानव के रूप-रंग का ऐसा सूक्ष्म वर्णन करने वाला कवि कहीं अंधा हो सकता है !

सूरदास ने कहा, "हमें अपने जीवन में ई जा बात कौ कछु-कछु आभास है गयौ हतौ कै लोग हमें सूझतौ नाहिं कहेंगे। जाते हमने देह छोड़िबे तें पहले हू गुसांईजी के सामनें आंखिन की ही चर्चा करी -

खंजन नैन रूप-रस माते !

चलि-चलि जात निकट स्रवननि के,

उलटि-पलटि ताटंक फंदाते।

'सूरदास' अंजन-गुन अटके,

नतरु अबहि उड़ि जाते !

"भइयाजी, जा कौ मतलब जि है कै एक समय हमारी रसिक आंखें खंजन के समान हतीं। वे इतेक लंबी हतीं कै कानन तक उनके कौने पहुंच्यौ करते हे। वह इतनी बड़ी और चंचल हतीं कै जो हम बिनु में काजर नांय लगाते तो निकस ही पडतीं। बस, जाते आगें हम आपते और का कहें? तुम खुद्द बहौत समझदार हौ। हिन्दी के काहू सोध करिबेवारे तक हमारी बात पहुंचाय दीजौ। आगे कौ काम तौ बु आपते ऊ चोखौ करि लेगौ। अच्छौ, अब जय श्रीकृष्ण करूं हूं।”

वार्तालाप के अंत में सूरदासजी ने बताया कि कबीरदास की राम की बहुरिया आपसे बातें करने को बहुत उत्सुक हैं। अगर उनका फोन आए तो सुन लीजिएगा।

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