झूठ बराबर तप नहीं / गोपालप्रसाद व्यास

 “शास्त्रों में लिखा है कि जब तक जान जाने का ख़तरा न हो, तब तक झूठ नहीं बोलना चाहिए !” अगर नई दुनिया का शास्त्र मुझे बनाने को कहा जाए तो उसका पहला वाक्य यह हो -”सच तभी बोलना चाहिए, जबकि जान जाती हो।” झूठ बोले और पकड़े गए तो धिक्कार है ऐसे दांत घिसने पर ! झूठ बोलने का मज़ा तो यह है, होशियारी तो इसमें है कि झूठ बोलो, मगर झूठ न दिखाई दे।


आप झूठ बोलिए और फिर बोलिए, लेकिन भाई मेरे, तनिक सफाई के साथ ! इसी को दुनियादारी कहते हैं, इसी में सफलता छिपी है ! आपका पता नहीं, मैंने तो यह सिद्धांत बना रखा है कि-

“झूठ बराबर तप नहीं,सांच बराबर पाप ।

जाके हिरदे झूठ है, ताके हिरदै आप ॥”

और यक़ीन मानिए अपने इसी सुनहरे सिद्धांत की बदौलत, दिन-पर-दिन गोल हुआ जाता हूं और नज़र न लग जाए किसी की, बस सब तरह से पौ-बारह है। झूठ बोलने का बड़ा माहात्म्य है। अगर आप आज के वैज्ञानिक तरीके से झूठ बोलना सीख जाएं तो विश्वास कीजिए कि फिर ज़िंदगी में आपको कभी मायूस होने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। शर्त लगाकर कह सकता हूं, चंद दिनों की ही कसरत के बाद आपके पास ठाठदार बंगला, शानदार कार, चहकता हुआ रेडियो, बहकता हुआ दूरदर्शन, झुकता हुआ अर्दली और उचकती हुई अप्सराएं खुद न आ जाएं, तो कसम आपकी, मैं आज से ही झूठ बोलना छोड़ सकता हूं।झूठ कौन नहीं बोलता ? हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि यह संसार मिथ्या है। माता-पिता,पुत्र-कलत्र सब रिश्ते झूठे हैं। जग-व्यवहार सब मिथ्याचार है। दो-चार संत, फकीर और गांधी-महात्माओं को छोड़ दीजिए, दुनिया में इनका होना-न-होना हम झूठों के प्रचंड बहुमत में कोई अर्थ नहीं रखता। मेरा तो दावा है कि झूठ और सच की बिना पर अगर इस देश में चुनाव लड़ लिए जाएं तो हिंदुस्तान की एक भी सीट पर कांग्रेसियों का अधिकार नहीं रह सकता, हिंदुस्तान क्या सारी दुनिया में हम झूठों का ही सिक्का चलता है और वह दिन दूर नहीं जब धरती के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक हर जगह हमारी मज़बूत सरकारें कायम हो जाएंगी।

दरअसल दुनिया में और है भी क्या ? खाने को तीन छंटाक गेहूं, पहनने को तीन गज कपड़ा और बोलने को जी भर झूठ ! राशन और कंट्रोल के इस पिछड़े जमाने में अगर कहीं झूठ भी चोर बाजार में चली गई होती तो झूठ न मानिए, दुनिया से निन्यानबे प्रतिशत आदमी उठ गए होते !

दुनिया का दस्तूर ही ऐसा है कि बिना झूठ के आपकी गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। जिस तरह चटनी के बिना भोजन में चटकारा नहीं आता, रूप भी बिना यौवन के किरकिरा होता है, इश्क बिना शायरी फीकी लगती है, उसी तरह बिना झूठ के भी कोई ज़िंदगी है ?

यह बिल्कुल झूठ है कि पहले ज़माने में झूठ बोलने वाले मर जाया करते थे। कम-से-कम मैं 80 साल से ऊपर का हो गया हूं। तबसे हजारों क्या लाखों बार झूठ बोलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा, पर क्या मज़ाल,

मरें तो मेरे दुश्मन, यहां तो सिर में दर्द तक नहीं हुआ ! सिर्फ आपसे कहता हूं कि 'बाहर' की तो क्या चली घर में यानी 'उनसे' मतलब अपने संतान की जन्मदात्री से शायद भूलकर भी कभी सच नहीं बोलता। लेकिन इस पर भी दावा यह है कि आज तक किसी ने मुझे सरेआम झूठा बताने का हौंसला नहीं किया।

आप झूठ बोलिए और फिर बोलिए, लेकिन भाई मेरे तनिक सफाई के साथ ! इसी को दुनियादारी कहते हैं, इसी में सफलता छिपी है। झूठ बोलना भी एक कला है-एक महान आर्ट ! इसकी महानता के आगे चित्रकारी के रंग फीके हैं, संगीत का स्वर बेसुरा है और कविता के छंद निरर्थक हैं।

लोग कहते हैं कि जिसने सत्य को पा लिया उसने परमेश्वर को पा लिया। एकदम ग़लत ! बात सही यह है कि जिसने झूठ को पा लिया उसे कुछ और पाना शेष नहीं रहा ! झूठ परम तत्त्व है ! अजरामर है। सनातन है। निर्विकल्प है। संपूर्ण जगत में व्याप्त है। यद्यपि यह भेदाभेद से परे है, फिर भी अभ्यास या साधना के लिए मैंने कुछ इसके भेद किए हैं, जैसे-(1) शुद्ध झूठ (2) अशुद्ध झूठ (3) सफेद झूठ (4) बे-सिर-पैर की (5) मनगढंत (6) गप्प और (7) चार-सौ-बीसी। देशकाल, अवस्था और समय-संयोग के अनुसार इनके फिर सैकड़ों प्रकार होते हैं। स्थान-संकोच से उनका वर्णन यहां नहीं किया जा सकता। फिर इस विषय पर हिंदुस्तान के तैंतीस करोड़ देवी-देवता घर-घर में नित्य नये अनुसंधान कर रहे हैं। इसलिए अभी से इस शास्त्र को लिपिबद्ध करना ठीक नहीं। ऐसा करना इसकी बढ़त को रोक देना है।

मेरा मत है कि आजकल बिना झूठ के शरीर रूपी गाड़ी जीवन-दलदल को पार नहीं कर सकती। उदाहरण चाहिए ? तो मान लीजिए आप किसी दफ्तर में बाबू हैं। बाबू भी ऐसे कि नेक-नीयत के सबूत में फाइलों पर झुकते-झुकते आपकी गर्दन ख़म खा गई। लेकिन आपको चाहिए चार दिन की छुट्टी। निहायत ज़रूरी काम आ पड़ा है। काम भी ऐसा जिसे टाला न जा सके। आपकी पत्नी के भाई के लड़के को जु़काम हुआ है। वह बेचारा हरदम छींकता रहता है। आपकी 'उनके' भाई-भावज सब परेशान हैं। उनके आने वाले खत हमेशा छींकों से भरे रहते हैं। पत्नी का कहना है कि इस हालत में अगर हम बच्चे को देखने नहीं गए तो रिश्तेदारी में नाक कट जाएगी।

आदमी को अपनी नाक का खयाल नहीं तो वह आदमी नहीं। लेकिन आदमियत के इस सच्चे मसले को आप अपनी अर्ज़ी में लिखकर बड़े बाबू को भेजकर तो देखिए ? सत्य बोलने को आजन्म लाचार हो सकता हूं अगर इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्मों तक भी छुट्टी मंजू़र होकर आ जाए ! ऐसी जगह आपको फ़न खोलना ही पड़ेगा। जैसा कि अक्सर मैं और मेरे साथी बाबू करते हैं, पड़ोसी डॉक्टर की जेब में दस-दस रुपये के दो नोट डालते हुए कहा जाए-”डियर डाक्टर एक सर्टिफिकेट तो बना दो।” डॉक्टर भी इस फन में कम होशियार न निकलेगा। वह लिखेगा,” ऐसा मालूम होता है कि बाबू को ज़ोर से सर्दी का अटैक हुआ है। दोनों फेफड़े भरे हैं। इन्हें एक सप्ताह इलाज़ और आराम की सख्त ज़रूरत है।”

लीजिए आपने मैदान मार लिया। बस के लिए दो रुपये का नोट किसी लड़के को देकर अर्ज़ी दफ्तर रवाना कीजिए और आप ससुराल का टिकट कटाइए। अगर ससुराल का पानी लग जाए और 'श्वसुर गृह निवासम्‌ स्वर्गतुल्यम्‌ नृणानाम्‌' उक्ति सही साबित हो तो दस-दस रुपये के दो नोट डॉक्टर को और थमाइए, फिर लगाइए एक सप्ताह और गोता। कोई पनडुब्बी आपको नहीं खोज सकती और कोई अक्ल का कच्चा यानी सच्चा इस महान सच को झूठ साबित नहीं कर सकता।

मेरे अपने साथ घटी एक घटना लीजिए। पिछले जून के महीने में जब मैं बच्चों के साथ घर से वापस दिल्ली लौट रहा था तो मुझसे भी ज्य़ादा किसी होशियार ने मेरी जेब से मनीबैग साफ कर दिया। टिकट, रुपया सभी कुछ उसी में थे। नई दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो होश फाख्ता ! कुली सामान लेकर गेट की ओर चल रहा था, बीवी-बच्चे दिल्ली लौट आने से खुश थे, पर मेरी अंगुलियां जेबों को कुरेद रही थीं और चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं कि हाय राम, अब क्या होगा ? दो-तीन मिनट इस ग़म में डूबा रहा कि टिकट का चार्ज तो दूर, इस कुली को क्या दिया जाएगा ? लेकिन ज़िंदगी भर झूठ को गले लगाया था। आख़िर उसने उबार ही तो लिया। मैं आगे-आगे हो लिया। गेट पर आकर टिकट कलक्टर को सुनाते हुए श्रीमती से बा-अदब कहा, “आइए, इधर से आइए। क्यों भाई साहब साथ में नहीं आए ? मुझे तार तो तुम्हारा मिल गया था, रास्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई।”

श्रीमतीजी यह रंग-ढंग देखकर पहले तो अचकचाईं, लेकिन वे भी तो आख़िर मुझ प्रमाणित असत्य-भाषी की अधर्म-पत्नी थीं। फौरन संभलकर मुझसे भी सवाई होकर बोलीं, “उनके कोर्ट में जरूरी मुकदमा था। कहने लगे तार तो दे दिया है। स्टेशन पर जीजाजी आ ही जाएंगे, चली जाओ। पर गाड़ी में आजकल बड़ी भीड़ रहती है। फर्स्ट क्लास में भी आदमी का भुरता बन जाता है।” टिकट कलक्टर बेचारा रौब में आगया। उसने समझा किसी जज की बहन है और मुझ कांग्रेसी एम.पी. को ब्याही है। टिकट मांगना तो दूर , वह अदब से एक तरफ खड़ा होगया। जान बची और लाखों पाए। मेरा ख्य़ाल है कि अगर मैं सच्चाई से काम लेता तो कहीं का न रहता। यह झूठ बोलने का ही प्रताप था कि जान बच गई। इसीलिए तो कहता हूं कि “झूठ बराबर तप नहीं” और दावा ठोकता हूं उस गीत बनाने वाले पर, जिसने यह झूठ लिख मारा कि, “झूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो।”

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