बिंत-ए-छिपकली / ख़्वाजा हसन निज़ामी Hasya Vyangya : Bint ae Chipkali


ख़ुदा के लिए रीज़लो जल्दी आओ। इस बिंत-ए-छिपकली को दीवार से हटाओ, यकसाँ परवानों को खाए चली जाती है।


गर्मी आई मैंने लैम्प जलाया। परवानों की आमद हुई। लिखना-पढ़ना ख़ाक नहीं, उनकी बेक़रारियाँ देख-देख कर जी बहलाता हूँ। शरीर छिपकली ज़ादी कहाँ से आ गई जो ग़रीब इश्क़बाज़ों को निगल रही है।


अभी तो मिस है, लेडी होगी तो ख़बर नहीं क्या ग़ज़ब ढाएगी। इसकी दुम काट लो बड़ी हराफ़ा है। क्यों री मुर्दार मेरे चहेते पतिंगों को क्यों खाती है। जला दूं तेरा मुँह भड़काऊ शोला। बुझाऊं तेरी ज़िंदगी।


हाय रीज़लो। तुम अब तक न आई, देखो इसने फिर एक तीतरी को पकड़ लिया। मुँह में दबाए बैठी है। गर्दन ऊंची करती है और निगलना चाहती है। बेचारी तीतरी कैसी बेकसी से उसके मुँह में गिरफ़्तार है।


भाई ये इश्क़ बुरी बला है। न रोशनी पर आती न जान गंवाती। शोला पर चिमनी थी। महबूब के रुख़ तक उसे रसाई न मिली तो छिपकली के आतिश-ए-शिकम की नज़र हुई।


अल्लाह एक ज़माना था जब अबादिया का शाना था। हर चीज़ साफ़ थी। न मच्छर आते थे। खटमल पिस्सुओं से भी निजात थी। छिपकलियों का भी गुज़र न हो सकता था। मगर जब से वीराने में घर बना है सब सताने आते हैं। तरह-तरह से चुटकियाँ लेकर रुलाते हैं।

�, यूंही रहने दिया। फिर मेरी निगाह उंगली की अँगूठी पर जा पड़ी, जो शकीला ने मुझे दी थी। जगमग-जगमग करता हुआ सफ़ेद नग। मुझे यूं लगा जैसे कोई आँसू जम गया हो। नग की झिलमिलाहट में आँसू की लर्ज़िश दिखाई दी। मैंने जल्दी से हाथ जेबों में डाल लिए।


शायद रफ़ू का अख़बार ख़त्म हो चुका था। उन्होंने फिर बातें शुरू कर दीं।

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