जोगिया मोर जगत सुखदायक / Jogiya mor jagat sukhdayak Vidyapati

आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, दुःख ककरो नहिं देल

दुःख ककरो नहिं देल महादेव, दुःख ककरो नहिं देल
एही जोगिया के भाँग भुलैलक, धतुर खोआई धन लेल

आगे माई, कार्तिक गणपति दुई जन बालक, जन भरी के नहिं जान
तिनक अभरन किछओ न टिकइन, रतियक सन नहिं कान

आगे माई, सोना रूपा अनका सूत, अभरन अपने रुद्रक माल
अपना मँगलो किछ नै जुरलनी, अनका लै जंजाल

आगे माई, छन में हेरथी कोटिधन बकसथी, वाहि देवा नहिं थोर
भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि, इहो थिका दिगम्बर मोर

यहाँ पढ़ें – विद्यापति का साहित्य / जीवन परिचय एवं अन्य रचनाएं
 

 


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