धूप के रथ पर हफ़्त अफ़लाक / 'आशुफ़्ता' चंगेज़ी

धूप के रथ पर हफ़्त अफ़लाक
चौबारों के सर पर ख़ाक

शहर-ए-मलामत आ पहुँचा
सारे मनाज़िर इबरत-नाक

दरियाओं की नज़र हुए
धीरे धीरे सब तैराक

तेरी नज़र से बच पाएँ
ऐसे कहाँ के हम चालाक

दामन बचना मुश्किल है
रस्ते जुनूँ के आतिश-नाक

और कहाँ तक सब्र करें
करना पड़ेगा सीना चाक

श्रेणी: ग़ज़ल

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