नक़ाब उस ने रूख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया / 'ज़फ़र' मुरादाबादी

नक़ाब उस ने रूख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया
के जैसे शब का अँधेरा सहर पे डाल दिया

समाअतें हुईं पुर-शौक हादसों के लिए
ज़रा सा रंग-ए-बयाँ जब ख़बर पे डाल दिया

तमाम उस ने महासिन में ऐब ढूँड लिए
जो बार-ए-नक़्द-ओ-नज़र दीदा-वर पे डाल दिया

अब इस को नफ़ा कहीं या ख़सारा-ए-उल्फ़त
जो दाग़ उस ने दिल-ए-मोतबर पे डाल दिया

क़रीब ओ दूर यहाँ हम-सफ़र नहीं कोई
तेरी तलब ने ये किस रह-गुज़र पे डाल दिया

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जानाँ से हाथ धो लेंगे
कुछ और बोझ जो पा-ए-सफ़र पे डाल दिया

जो हम अज़ाब था उस की ही छाँव में आ कर
ख़ुद अपनी धूप का लश्‍कर शजर पे डाल दिया

भटक रहा था जो असरार-ए-फ़न की वादी में
उरूज दे के फराज़-ए-हुनर पे डाल दिया

बे-एतदाल थे ख़ुद उन के खत्त-ओ-खाल ‘ज़फ़र’
हर इत्तिहाम मगर शीशा-गर पे डाल दिया

श्रेणी: ग़ज़ल

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

Amir Khusrow Dohe Kavita अमीर खुसरो के दोहे गीत कविता पहेलियाँ