हिन्दी राष्ट्रभाषा होगी (हिन्दी निबंध) : मुंशी प्रेमचंद

Hindi Rashtrabhasha Hogi (Hindi Nibandh) : Munshi Premchand
विधाता के घर में जिस समय वाणी बंट रही थी, उस समय मैं सो रहा था। इसलिए मैं उतनी अच्छी तरह बोल नहीं सकता। बोलना मेरे काबू के बाहर की बात है। हाँ, लिख जरूर लेता हूँ। यदि बोलने की कला मुझमें होती तो शायद मैं और अधिक आज आपको खुश कर सकता, परंतु अफसोस तो यही है कि न तो मुझे बोलने की कला का अभ्यास है और न कला का स्वांग भरना ही आता है। आपने मुझे आज जो इज्जत बख्शी है और जो कृपा दिखाई है, उसके योग्य तो मैं नहीं था, लेकिन कृपा जो मुफ्त ही मिल रही है तो क्यों न ली जाये?

साहित्य क्या है?

साहित्य क्या है? इस विषय पर थोड़ा कह लूँ। मुख्तलिफ लोगों की मुख्तलिफ राय है। कोई विशेषज्ञ कहते हैं कि साहित्य जीवन की आलोचना है, साहित्य बड़े मस्तिष्क की उपज है, साहित्य हृदय की उमंगों और भावों का दिग्दर्शन है। लेकिन मेरी राय में “जो दिल से निकले और दिलों पर असर करे, वास्तव में तो वही साहित्य है।”

साहित्य उपन्यास नहीं है, न इतिहास साहित्य है। भूगोल भी साहित्य नहीं है, क्योंकि वे सब एक निश्चित बात को निश्चित काल तक बताते हैं। भगवान् तिलक का ‘गीता-रहस्य’ साहित्य है। वह हमारे भावों को जाग्रत करके जीवन-शक्ति प्रदान करने में समर्थ है। साहित्य वह भी है, जिसमे हमारे भावों को जगाने की शक्ति हो।

साहित्य की सृष्टि क्यों होती है?

साहित्य आनदंदायिनी वस्तु है, लेकिन आनंद क्या है? अपनी वस्तु का खुद आनंद भोगने के बाद उसी से पढ़ने वालों को सुख पहुँचाना। यही साहित्य का आनंद है। आनंद दो तरह का होता है: एक आनंद ऊँचा और दूसरा नीचा। मंगल की भावना का प्रचार ऊँचे दर्जे का आनंद है। एक हिलोर उठती है जिसे लेखक खुद भोगता हैं, फिर अपने परिचितों को उस आनंद का परिचय कराता है। नीचे दर्जे का साहित्य इसके ठीक प्रतिकूल होता है।

साहित्य और जीवन का संबंध

आजकल साहित्य को दो भागों में बांट रखा है। एक तो आदर्श जीवन का चित्रण और दूसरे यथार्थ का चित्रण। इसी का नाम Idealism और Realism है। आधुनिकता यथार्थ जीवन की प्रेरक है। जीवन की नकल कर देना साहित्य नहीं, पर साहित्य वह है जो यथार्थ जीवन को सुंदर ढंग से लिख दे। इसके सिवा जीवन को स्वयं सुंदर बनाना चाहिए। रियलिज्म जीवन के अंधकारमय पहलुओं को उज्ज्वल कर देता है। अच्छी कला, अच्छा साहित्य वह है जिसे सर्वसाधारण बिना तकलीफ के समझ जाएँ- कुछ लोग ऐसा कहते हैं। दूसरे लोग यह कहते हैं कि साहित्य वह है, जिसे समझने में कुछ दिमाग खर्च करना पड़े। परंतु महात्मा टॉल्स्टॉय (Tolstoy) का कहना है कि कला विश्वव्यापी है, लेकिन इसके लिए रुचि का होना आवश्यक है। यदि हमें संगीत का ज्ञान नहीं है तो हम उसे समझ भी नहीं सकते। यदि नृत्य में हम रुचि नहीं रखते तो हम उसे दाद नहीं दे सकते। साहित्य में जब रसिकों और जन-साधारण दोनों के लिए स्थान है तो कोई कारण नहीं दिखता कि उसकी महत्ता को नीचे गिराया जाए। जहाँ रसिकों के लिए रामायण है, वहाँ जन-साधारण के लिए आल्हा भी तो है।

लोगों को शिकायत है कि हमारा साहित्य उन्नति नहीं कर रहा है। इसका कारण जनता ही है। जनमत और लोकमत साहित्य की उन्नति के आधार हैं। यदि जनता की रुचि अच्छी समालोचक (क्रिटिक) होती है, तो उसका साहित्य निरंतर तरक्की करता जाता है, किन्तु जनता ही जब उस ओर उदासीन हो बैठती है तो उसके साहित्य का आगे बढ़ना स्वभावत: ही बन्द हो जाता है। लेखक यदि यह चाहता है कि उसकी चीज की आलोचना हो तो उसे निष्पक्ष आलोचना मिलनी चाहिए, पर मुश्किल तो यह है कि आपका एप्रिसिएशन (मूल्यांकन) क्रियाशील नहीं होता।

हिन्दी-भाषा अब राष्ट्र-भाषा होने जा रही है। अपनी मंजिल पाँच-दस मील चल भी चुकी है। यह ठीक है कि उसे अभी बहुत दूर चलना है। हमारी इच्छा तो यह है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवहारों के अंदर हिन्दी का प्रयोग हो। मद्रास में तो हिन्दी का खूब प्रचार हो रहा है।

हम हिन्दी का रूप बनाकर चाहें कि उसका प्रचार हो तो नहीं हो सकता, पर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि कुछ कर जायें तो वह चल सकता है। हम यह प्रयत्न करेंगे कि महात्माजी राष्ट्र-भाषा का कोई बोर्ड बनावें, जिसमे एक केंद्र से एक केंद्र-स्थल तक सब एक हो जायें। अतः मैं आप लोगों से भी कहूँगा, चूंकि आपका भी इससे संबंध है, बोर्ड बनाने में आप लोग भी अपनी-अपनी राय दें।

मुझे इतने छोटे-से नगर में साहित्यिक रुचि के लोगों की इतनी तादाद देखकर बड़ा हर्ष हो रहा है।

[7 अप्रैल, 1935 को पं. माखनलाल चतुर्वेदी की अध्यक्षता में ‘तुलसी उत्सव कमेटी’ तथा ‘ललित साहित्य मंडल’ खंडवा द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में दिया गया भाषण। ‘धर्मवीर’, 13 अप्रैल 1935]

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