घृणा का स्थान (हिन्दी निबंध) : मुंशी प्रेमचंद

Ghrina Ka Sthan (Hindi Nibandh) : Munshi Premchand
जीवन में घृणा का स्थान

निंदा, क्रोध और घृणा ये सभी दर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इन दर्गुणों को निकल दीजिए, तो संसार नरक हो जायेगा। यह निंदा का ही भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है। यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पाखंड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की धाक न हो तो जीवन विशृंखल हो जाएँ और समाज नष्ट हो जाएँ। इनका जब हम दुरुपयोग करते हैं, तभी ये दर्गुण हो जाते हैं, लेकिन दुरुपयोग तो अगर दया, करुणा, प्रशंसा और भक्ति का भी किया जाएँ, तो वह दर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थ-हीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त। प्रकृति जो कुछ करती है, जीवन की रक्षा ही के लिए करती है। आत्म-रक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी भावनाएँ और मनोवृत्तियाँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। कौन नहीं जानता कि वही विष, जो प्राणों का नाश कर सकता है, प्राणों का संकट भी दूर कर सकता है। अवसर और अवस्था का भेद है। मनुष्य को गंदगी से, दुर्गन्ध से, जघन्य वस्तुओं से क्यों स्वाभाविक घृणा होती है? केवल इसलिए कि गंदगी और दुर्गन्ध से बचे रहना उसकी आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक है। जिन प्राणियों में घृणा का भाव विकसित नहीं हुआ, उनकी रक्षा के लिए प्रकृति ने उनमें दुबकने, दम साध लेने या छिप जाने की शक्ति डाल दी है। मनुष्य विकास-क्षेत्र में उन्नति करते-करते इस पद को पहुँच गया है कि उसे हानिकर वस्तुओं से आप ही आप घृणा हो जाती है। घृणा का ही उग्र रूप भय है और परिष्कृत रूप विवेक। ये तीनों एक ही वस्तु के नाम हैं, उनमें केवल मात्रा का अंतर है।

तो घृणा स्वाभाविक मनोवृति है और प्रकृति द्वारा आत्म-रक्षा के लिए सिरजी गयी है। या यों कहो कि वह आत्म-रक्षा का ही एक रूप है। अगर हम उससे वंचित हो जाएँ, तो हमारा अस्तित्व बहुत दिन न रहे। जिस वस्तु का जीवन में इतना मूल्य है, उसे शिथिल होने देना, अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना है। हममें अगर भय न हो तो साहस का उदय कहाँ से हो। बल्कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप ही साहस है। जरूरत केवल इस बात की है कि घृणा का परित्याग करके उसे विवेक बना दें। इसका अर्थ यही है कि हम व्यक्तियों से घृणा न करके उनके बुरे आचरण से घृणा करें। धूर्त से हमें क्यों घृणा होती है? इसलिए कि उसमे धूर्तता है। अगर आज वह धूर्तता का परित्याग कर दे, तो हमारी घृणा भी जाती रहेगी। एक शराबी के मुँह से शराब की दुर्गन्ध आने के कारण हमें उससे घृणा होती है, लेकिन थोड़ी देर के बाद जब उसका नशा उतर जाता है और उसके मुँह से दुर्गन्ध आना बन्द हो जाती है, तो हमारी घृणा भी गायब हो जाती है। एक पाखंडी पुजारी को सरल ग्रामीणों को ठगते देखकर हमें उससे घृणा होती है, लेकिन कल उसी पुजारी को हम ग्रामीणों की सेवा करते देखें, तो हमें उससे भक्ति होगी। घृणा का उद्देश्य ही यह है कि उससे बुराइयों का परिष्कार हो। पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवृत्तियों के प्रति हमारे अंदर जितनी ही प्रचंड घृणा हो उतनी ही कल्याणकारी होगी। घृणा के शिथिल होने से ही हम बहुधा स्वयं उन्हीं बुराइयों में पड़ जाते हैं और स्वयं वैसा ही घृणित व्यवहार करने लगते हैं। जिसमे प्रचंड घृणा है, वह जान पर खेलकर भी उनसे अपनी रक्षा करेगा और तभी उनकी जड़ खोदकर फेंक देने में वह अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। महात्मा गाँधी इसलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछूतपन से प्रचंड घृणा है।

साहित्य और कला में घृणा का स्थान

जीवन में जब घृणा का इतना महत्व है, तो साहित्य कै से उसकी उपेक्षा कर सकता है, जो जीवन का ही प्रतिबिंब है? मानव-हृदय आदि से ही ‘सु’ और ‘कु’ का रंगस्थल रहा है और साहित्य की सृष्टि ही इसलिए हुई कि संसार में जो सु या सुंदर है और इसलिए कल्याणकर है, उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पन्न हो और ‘कु’ या असुंदर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा। साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है। ‘कु’ और ‘सु’ का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है। प्राचीन साहित्य धर्म और ईश्वर द्रोहियों के प्रति घृणा और उनके अनुयायियों के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भावों की सृष्टि करता रहा। नवीन साहित्य समाज का खून चूसने वालों, रंगे सियारों , हथकंडेबाजों और जनता के अज्ञान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों के विरुद्ध उतने ही जोर से आवाज उठा रहा है और दीनों, दलितों, अन्याय के हाथ सताये हुओं के लिए उतने ही जोर से सदानुभूति उत्पन्न करने का प्रयत्न कर रहा है। संभव है, वह भावनाओं की तरंग में और कठोर सत्य की ओर से आँखें बन्द करके संसार में क्रांति मचा देने का स्वप्न देख रहा हो, जिन्हें वह दरिद्रता के कारण सहानुभूति का पात्र समझ रहा है, उसकी सारी बुराइयों को दुरवस्था ओर दरिद्रता के सिर मढ़ रहा है। वे इतने भोले-भाले प्राणी न हों, पर वह नवयुग का स्वर्ग स्वप्न देखने में इतना मग्न हैं कि इस समय उसे किसी बाधा-विघ्न की और ध्यान देने का अवकाश नहीं है। लेकिन उन कलाकारों का उद्देश्य क्या यह था, कि वे किसी व्यक्ति या समाज के प्रति घृणा फैलायें? वे व्यक्तियों के शत्रु नहीं है, न वे द्वेष या ईर्ष्या के कारण साहित्य की रचना करते हैं। वे उन परिस्थितियों और प्रवृत्तियों के शत्रु हैं, जिनके हाथों ऐसे व्यक्ति उत्पन्न होते हैं। व्यक्तियों से उन्हें उतना ही प्रेम है, जितना अपने किसी भाई से हो सकता है। जिन सूदखोर महाजनों या मजूदरों के पसीने की कमाई पर मोटे होने वाले मिल-मालिकों के प्रति वह अपनी कृतियों में जहर उगलता है, उन्हीं को संकट में देखकर वह उनकी सेवा करता अपना अहोभाग्य समझेगा। वह जानता है कि यह गरीब खुद अपनी स्वार्थान्धता के हाथों दुखी है और अपनी धनलिप्सा के शिकार होकर गरीबों को सता रहे हैं। उसे उनसे सहानुभूति होती है, पर उन परिस्थितियों के साथ वे बिल्कुल समझौता नहीं कर सकते। हो सकता है, उनमें कुछ ऐसे भी हों, जिन्हें सूदखारों के हाथों कष्ट उठाने पड़े हों, संभव है, उन्हीं के हाथों उनका सर्वनाश हो गया हो, लेकिन अगर वह कलाकार है, तो उसमे वह व्यक्ति विशेष पर दिल का गुबार निकालने न बैठेगा। हाँ, यह हो सकता है कि सूदखोरी के प्रति उसकी लेखनी ज्यादा तीव्र और पैनी हो जाये। इन पंक्तियों के लेखक ही के विषय में एक कृपालु आलोचक ने यह आक्षेप किया है कि उसने अपनी रचनाओं में ब्राह्मणों के प्रति घृणा का प्रचार किया है। अव्वल तो उसे किसी ब्राह्मण के हाथों कोई कष्ट नहीं पहुँचा और मान लो किसी ब्राह्मण ने उस पर डिगरी करके उसका घर नीलाम करा लिया हो , या उसे सरे बाजार गाली दे दी हो तो इसलिए वह समस्त ब्राह्मण-समुदाय का दुश्मन क्यों हो जाएँगा? जीवन में आदमी को सभी तरह के अनुभव होते हैं। प्राय: सभी समुदायों में उसके मित्र हो सकते हैं और शत्रु भी, फिर वह किसी एक समुदाय को क्यों चुनकर उन्हीं के प्रति घृणा फैलायेगा? हाँ, चूँकि धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले, श्रद्धा की आड़ में श्रद्धालुओं का नोचने वाले, गया में मुसलमानों और चमारों तक से पिंडदान का संस्कार कराने वाले और नाना प्रकार से धर्म का पाखंड रचने वाले उस समुदाय के लोग हैं, जो दुर्भाग्यवश ब्राह्मण कह जाते हैं, पर जो ब्राह्मणत्व से उतना ही दूर हैं, जितना नरक से स्वर्ग, इसलिए कोई भी लेखक, जो समाज में सद्व्यवहार और सद्धर्म और राष्ट्रीय ऐक्य का राज देखना चाहता है, उनकी अपेक्षा नहीं कर सकता। कौन-सा इतना स्वाभिमानी भारतीय है, जो प्रातःकाल एक आदमी को अपने को ब्राह्मण बताकर भीख माँगते देखकर लज्जा से सिर झुका लेगा। यह उस समुदाय को बदनाम करने वाले लोग हैं जिन्होंने सच्चे जीवत और सच्चे विचारों की सरिता बहाई थी, जो हिन्दू समाज के पथ प्रदर्शक थे। उनका यह पतन! लेकिन यह कौन नहीं जानता कि वह गरीब ऐसी परिस्थितियों में पला है, जहाँ भिक्षा माँगना लज्जा नहीं। मेरा खयाल है कि समाज में जितनी अनीति है, उनमें सबसे घृणित धार्मिक पाखंड और धूर्तता है। चोरी बदमाशी, रिश्वत, दगा, झूठ इन दर्गुणों का किसी समाज विशेष से संबंध नहीं। एक जमाना था, जब अधिकतर कायस्थ, पटवारी और कानूनगो होते थे। यह भी बिहार और यू. पी. के पूर्वी भाग में, शायद बुंदेलखंड में भी, लेकिन अब वह बात नहीं रही। इसलिए केवल कानूनगो और पटवारी कह देने से कायस्थ का बोध नहीं होता, न बनिया कह देने से किसी विशेष समुदाय का बोध होता है। अब तो जो दौरी-दुकान करते थे, वह पटवारी हैं, जो पटवारी थे वह दौरी-दुकान करते हैं। केवल पंडित या पुजारी ही ऐसा शब्द है, जिससे दुर्भाग्यवश ब्राह्मण का बोध हो जाता है और यह कहना बड़ी दूर की कौड़ी लाना है कि जो इस पाखंडाचार के प्रति घृणा फैलाता है, वह ब्राह्मण जाति का द्रोही है। ब्राह्मणत्व की आड़ में यह पाखंडाचार देखकर जितनी ग्लानि इन पंक्तियों के लेखक को हो सकती है, उससे कहीं ज्यादा स्वयं उन्हें होती है, जो वास्तव में ब्राह्मण हैं। लेखक को अपने पचपन साला जीवन में ऐसा कोई ब्राह्मण नहीं मिला, जिसने इस पाखंडाचार को घृणा की दृष्टि से न देखा हो। लेखक की दृष्टि में ब्राह्मण कोई समुदाय नहीं , एक महान् पद है जिस पर आदमी बहुत त्याग, सेवा और सदाचरण से पहुँचता है। हरेक टके-पंथी पुजारी को ब्राह्मण कहकर मैं इस पद का अपमान नहीं कर सकता। इस विकृत धर्मोपजीवी आचरण के हाथों हमारा सामाजिक अहित ही नहीं, कितना राष्ट्रीय अहित हो रहा है, यह वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ के हथकंडों से जाहिर है। ऐसी असामाजिक, अराष्ट्रीय, अमानुषीय भावनाओं के प्रति जितनी ही घृणा फैलायी जाये, वह थोड़ी है, केवल भावनाओं के प्रति, व्यक्ति के प्रति नहीं, क्योंकि वर्णाश्रम धर्म के संचालक हमारे वैसे ही भाई हैं, जैसे आलोचक महोदय के । बस, इस विषय में कुछ और लिखने की जरूरत मैं नहीं समझता। मैंने अपनी पोजीशन बतला दी, अगर इस पर भी कोई सज्जन मुझे ब्राह्मण-द्रोही कहे जाएँ, तो मुझे परवाह नहीं है, मैं उसे दोष और दिल का गुबार समझ लूँगा।

इस आलोचना में आलोचक महोदय ने दो-एक और मजेदार बातें कही हैं, मसलन यह कि मैंने जो कुछ लिखा है, उसमे जो कुछ अच्छा है, वह माल मशरूका है जो कुछ बुरा है वह मेरा है, या यह कि मैंने दूसरों की खुशामद की है कि वे मुझे उपन्यास या औपन्यासिक-सम्राट कहें ( और संभव है इस तरह की मेरी कोई दरख्वास्त आलोचक महोदय की सेवा में भी पहुँची हो।) या यह कि मैं एक मित्र के आग्रह करने पर भी केवल इसलिए शान्तिनिकेतन नहीं गया कि मुझे स्वयं डा. रवीन्द्रनाथ ने नहीं बुलाया था और यह कि मुझे बंगाल का कोई कुत्ता भी नहीं जानता – यह सब बच्चों की-सी बातें हैं जिनका मेरे पास कोई जवाब नहीं है। हाँ, इतना निवेदन कर देना चाहता हूँ कि आलोचक महोदय, या उनके कोई अन्य मित्र सम्राटई का मुकुट धारण करना चाहें, तो मैं बड़ी खुशी से उसे उनको भेंट कर दूँगा। इसके लिए उन्हें विशेष आंदोलन और विद्रोह करने की जरूरत नहीं। मैं दिल से तो नहीं चाहता कि अपना बहुमूल्य मुकुट उन्हें या उनके मित्रों को दे दूँ लेकिन यदि मेरे पास इस तरह का कोई डेपुटेशन आवेगा, तो अनिच्छा से ही सही, पर ज्यादा हिचड़-पिचड़ न करूँगा, क्योंकि मैं समय की रफ्तार पहचानता हूँ और जानता हूँ कि इस डिक्टेटरशिप के जमाने में मुकुट कोई लुभावनी वस्तु नहीं है।

[‘हंस’, दिसंबर, 1933]

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