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Showing posts from August, 2025

हमेशा देर कर देता हूँ मुनीर नियाज़ी Hamesha Der Kar Detaa Huun Main Har Kaam Karne Men

 हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में..... नज़्म संग्रह से कुछ और नज़्में  कभी कभी साहिर लुधियानवी Kabhii Kabhii Kabhii Kabhii Mire Dil Men Sahir Ludhianvi Nazms ख़ूब-सूरत मोड़ साहिर लुधियानवी  Chalo Ik Baar Phir Se Ajnabii Ban Jaaen Ham Donon दस्तूर हबीब जालिब Dastuur Diip Jis Kaa Mahallaat Hii Men Jale Habib Jalib Nazms ज़िंदगी से डरते हो नून मीम राशिद Zindagii Se Darte Ho Zindagii Se Darte Ho Nazms ताज-महल साहिर लुधियानवी Taaj Mahal Taaj Tere Liye Ik Mazhar Sahir Ludhianvi Nazms औरत कैफ़ी आज़मी Aurat Uth Mirii Jaan Mire Saath Hii Chal...

कभी कभी साहिर लुधियानवी Kabhii Kabhii Kabhii Kabhii Mire Dil Men Sahir Ludhianvi Nazms

 कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है कि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर तिरे जमाल की रानाइयों में खो रहता तिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखें इन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहता पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की तिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता हयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैं घनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेता मगर ये हो न सका और अब ये आलम है कि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहीं गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले गुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों से मुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैं हयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों से न कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़ भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर मैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँही कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है नज़्म संग्रह से कुछ और नज़्में  हमेशा ...

ख़ूब-सूरत मोड़ साहिर लुधियानवी Khuub Suurat Mod Chalo Ik Baar Phir Se Ajnabii Ban Jaaen Ham Donon

 रोचक तथ्य Film: Gumrah (1963) चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर त'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों नज़्म संग्रह से कुछ और नज़्में  हमेशा देर कर देता हूँ मुनीर नियाज़ी Hamesha Der Kar Detaa Huun Main Har Kaam Karne Men कभी कभी साहिर लुधियानवी Kabhii Kabhii Kabhii Kabhii Mire Dil Men Sahir Ludhianvi Nazms दस्तूर हबीब जालिब Dastuur Diip Jis Kaa Mahallaat Hii Men Jale Habib Jalib Nazms ज़िंदगी से डरते हो नून मीम राशिद Zindagii Se Darte Ho Zindagii Se Darte Ho Nazms त...

दस्तूर हबीब जालिब Dastuur Diip Jis Kaa Mahallaat Hii Men Jale Habib Jalib Nazms

 दीप जिस का महल्लात ही में जले चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले वो जो साए में हर मस्लहत के पले ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से ज़ुल्म की बात को जहल की रात को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँ तुम नहीं चारागर कोई माने मगर मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता नज़्म संग्रह से कुछ और नज़्में  हमेशा देर कर देता हूँ मुनीर नियाज़ी Hamesha Der Kar Detaa Huun Main Har Kaam Karne Men कभी कभी साहिर लुधियानवी Kabhii Kabhii Kabhii Kabhii Mire Dil Men Sahir Ludhianvi Nazms ख़ूब-सूरत मोड़ साहिर लुधियानवी  Chalo Ik Baar Phir Se Ajnabii Ban Jaaen Ham Donon ज़िंदगी से डरते हो नून मीम राशिद Zindagii Se Darte Ho Zindagi...

ज़िंदगी से डरते हो नून मीम राशिद Zindagii Se Darte Ho Zindagii Se Darte Ho Nazms

 ज़िंदगी से डरते हो! ज़िंदगी तो तुम भी हो ज़िंदगी तो हम भी हैं! ज़िंदगी से डरते हो? आदमी से डरते हो आदमी तो तुम भी हो आदमी तो हम भी हैं आदमी ज़बाँ भी है आदमी बयाँ भी है उस से तुम नहीं डरते! हर्फ़ और मअनी के रिश्ता-हा-ए-आहन से आदमी है वाबस्ता आदमी के दामन से ज़िंदगी है वाबस्ता उस से तुम नहीं डरते ''अन-कही'' से डरते हो जो अभी नहीं आई उस घड़ी से डरते हो उस घड़ी की आमद की आगही से डरते हो पहले भी तो गुज़रे हैं दौर ना-रसाई के ''बे-रिया'' ख़ुदाई के फिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदी ये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदी तुम मगर ये क्या जानो लब अगर नहीं हिलते हाथ जाग उठते हैं हाथ जाग उठते हैं राह का निशाँ बन कर नूर की ज़बाँ बन कर हाथ बोल उठते हैं सुब्ह की अज़ाँ बन कर रौशनी से डरते हो रौशनी तो तुम भी हो रौशनी तो हम भी हैं रौशनी से डरते हो शहर की फ़सीलों पर देव का जो साया था पाक हो गया आख़िर रात का लिबादा भी चाक हो गया आख़िर ख़ाक हो गया आख़िर इज़्दिहाम-ए-इंसाँ से फ़र्द की नवा आई ज़ात की सदा आई राह-ए-शौक़ में जैसे राह-रौ का ख़ूँ लपके इक नया जुनूँ लपके आदमी छलक उट्ठे...

ताज-महल साहिर लुधियानवी Taaj Mahal Taaj Tere Liye Ik Mazhar Sahir Ludhianvi Nazms

 ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली अपने तारीक मकानों को तो देखा होता अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी जिन की सन्नाई ने बख़्शी है उसे शक्ल-ए-जमील उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नुमूद आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़िंदील ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़र...

औरत कैफ़ी आज़मी Aurat Uth Mirii Jaan Mire Saath Hii Chalnaa Kaifi Azmi Nazms

 उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है त...